Friday, March 19, 2010

कलाओं का अन्तर्सम्बन्ध

भारतीय दृष्टि जीवन को उसकी सम्पूर्णता में देखती है, उसमें जीवन के सभी पक्षों को समाहित किया जाता है। जाहिर सी बात है, कला के परिप्रेक्ष्य में उसमे संगीत है, नृत्य है, चित्रकला है और तमाम प्रकार की दूसरी कलाएं भी सम्मिलित हैं। दरअसल सभी कलाएं एक दूसरे से गूंथी हुई हैं। वे एक दूसरे को रूप देने का कार्य करती है। भरत मुनि के नाट्यषास्त्र का नाम भले नाटक से संबद्ध हो परन्तु उसमें सभी कलाओं के अर्न्तसंबंधों की परिणति में हर कला की अपनी स्वायत्ता को दर्षाया गया है। भरत मुनि का एक बेहद खूबसूरत श्लोक है जिसमें उन्होंने संगीत को नाट्य की शय्या कहा है। आर्जेन्टीनी लेखक खोर्खे लुइस बोर्खेस के कथन को इसी परिप्रेक्ष्य में लें जिसमें उन्होंने कहा है कि शब्द का जन्म कविता में हुआ होगा। सच भी क्या यही नहीं है! गान मे छन्द का स्थान केन्द्रीय है। यदि वहां छन्द नहीं बरता गया है तो वह गान का स्वांग भर होगा।संगीत में आलाप के अंतर्गत राग का हल्के हल्के विस्तार होता है। इस विस्तार में ही पूरा एक भाव लोक तैयार होता है। ठीक ऐसे ही रंगमंच के साथ है। वहां किसी पात्र सें संबंधित दृष्य में विस्तार होने के बाद ही अगला दृष्य मंचित होता है। नृत्य में दृष्टि, हाव-भाव आदि की भंगिमाएं ही उसका विस्तार करती है। यही बात चित्रकला के साथ भी है। रंग और रेखाएं बढ़त करती है। इस बढ़त में ही कैनवस पर मूर्त और अमूर्त चित्र की परिणति होती है। हर कला अपने रूप में सौन्दर्य और श्रेष्ठता का वरण दूसरी कला के मेल से ही करती है। सोचिए! यदि नाटक में नृत्य और सगीत नहीं हो, संगीत में चित्रात्मकता के दृष्य उभारने का भाव नहीं हो और चित्रकला में संगीत की लय नहीं हो तो क्या उसे जीवंत कहा जाएगा!
बहरहाल, यह जब लिख रहा हूं, जतिनदास का एक चित्र जेहन में कौंध रहा है। नृत्य की भाव भंगिमाओं में यह चित्र ऐसा है जिसमें कला की सम्पूर्णता को अनुभूत किया जा सकता है। इसमें चित्रात्मकता तो है ही, सांगीतिक आस्वाद है, नाट्य का भ्व है, कविता का छन्द है और कला की तमाम अनुभूतियों भी यहां सघन महसूस की जा सकती है। कहा जा सकता है कि सभी कलाएं एक दूसरे से मिली हुई है। एक दूसरे के बिना उनका काम नहीं चल सकता। संवाद और सहकार के जरिए कलाओं के परस्पर संबंधों को और अधिक सघन किया जा सकता है। अब जबकि बाजारवाद ने लगभग सभी कलाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया है और हर कला अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने में लगी है, क्या यह जरूरी नहीं है कि कलाओं के अन्तर्सम्बधों पर विचार करते हम उन्हें एक दूसरे के नजदीक लाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो क्या अपनी श्रेष्ठता की होड़ में एक कला का दूसरी कला से संवादहीनता और सहकारहीनता से उनके मूल अस्तित्व से संघर्ष की चुनौती ही क्या हम पैदा नहीं कर रहे?




‘‘डेली न्यूज’’ में प्रति शुक्रवार को प्रकशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ ‘‘कला तट’’ दिनांक 19।3।2010

Monday, March 15, 2010

सच करो रेत के सपने

अबोले शब्दों के
मौन में
संजोए हैं मैंने
रेत के सपने
पाल ली है मछलियां
मरूथल की मृगमरिचिका में
तुम-
सांस बन जीवन दो
मेरी मछलियों को
सच करो
रेत के सपनों को
मझदार भी किनारा बने
मेरी सोच का
खोलो, खोलो
तुम्हारे होने के सच का
अनावृत घेरा।

Thursday, March 11, 2010

स्मृतियों के दृष्यालेख



सैयद हैदर रज़ा के चित्र स्मृतियों के दृष्यालेख हैं। ऐसे जिन्हें आप देखकर सुकून पा सकते हैं, पढ़ सकते हैं और हां, यदि घूंट घूंट आस्वाद लंेगे तो अर्से तक आप उन्हें भुला भी नहीं पाएंगे। वे आपकी स्मृतियों को झंकृत करते रहेंगे। रजा दअरसल चित्रों से देखने वाले का रागात्मक संबंध स्थापित कराते हैं। बेषक, चित्रों में उभरी स्मृतियां उनकी वैयक्तिक हैं, उनके अपने संदर्भ है परन्तु वे देखने वाले की अंतर्मन भाव सत्ताओं को गहरे से छूती है। ड्राइंग के अंतर्गत रेखाओं का उनका सहज लयात्मक संतुलन और कोमलता हर देखने वाले को आत्मीयता का बोध कराती है। उनके चित्रों में जिस प्रकार की सफाई, रंग स्पर्ष से झलकने वाली कोमलता नजर आती है, वह अमूर्तन में इधर न के बराबर दिखायी देती है। यह रजा की कला के गंभीर आत्मसयंम की ही परिणति है, जिसमें वे कैनवस पर अनुभूति और संवेदनाओं के अपने आत्मकथ्य की खोज बाहर की ओर नहीं करके भीतर की ओर करते हैं, देखने वालों को करवाते हैं।बहरहाल, रज़ा के चित्रों पर पहले भी लिखा है, परन्तु इस बार जब जवाहर कला केन्द्र में लगे उनके चित्रों की प्रदर्षनी देखी तो लगा वे इस उम्र भी में भी निंरतर कला की बढ़त की ओर ही उन्मुख है। रंगों का तो वे अद्भुत लोक रचते हैं। रंग उनके चित्रांे का माहौल बनाते हैं। भावों के उद्वेग में रंग एक निर्मम तटस्थता भी प्रदान करते हैं। आंतरिक तन्मयता और आग्रहषीलता से रजा अपनी ऐन्द्रिकता को कैनवस पर रूपायित करते जैसे दृष्यों को लेख बंचवाते हैं। प्रकृति और जीवन के रहस्यों को कैनवस की भाषा में परोटते उनके चित्र अभिप्राय बहुत अधिक चर्चित भले नहीं हो परन्तु बौद्धिक आडम्बर उनमें नहीं है। मसलन पंचभुत तत्व का उनका चित्र ही लें या फिर बिन्दू के उनके चित्र या फिर उनके रेखांकन-सभी में ज्यामितिक आकारों के उभरते बिम्ब और प्रतीक अदम्य ऊर्जा लिए हैं। उनके चित्रों की बड़ी विषेषता यह भी है कि वे पावन शंांति का अहसास कराते हैं। ऐसे दौर में जब रंग और रेखाएं कैनवस में कला की सघनता की बजाय बाजार की संभावनाओं की दस्तक देती हों, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि रजा के चित्र कला के सच से हमंे रू-ब-रू कराते आषय की अर्थवत्ता की तलाष कराते हैं। उनके बरते रंग मन में उत्सवधर्मिता का जैसे आगाज करते हैं। कोलकाता की आकार-प्रकार आर्ट गैलरी के जरिए प्रदर्षित उनके चित्र हाल ही बनाए हैं और वे सभी ‘लिरिकल’ हैं, हॉं, कुछ में जबरदस्त दोहराव भी है परन्तु समग्रता में उनके चित्रों के रंग और रूपाकार एक अतीन्द्रिय सत्ता के संवाहक बनते, सूक्ष्म बौद्धिक संवेदनाओं का सांगीतिक आस्वाद लगभग सभी स्तरों पर कराते हैं।


"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक १२-३-१०

स्मृतियों के दृष्यालेख




सैयद हैदर रज़ा के चित्र स्मृतियों के दृष्यालेख हैं। ऐसे जिन्हें आप देखकर सुकून पा सकते हैं, पढ़ सकते हैं और हां, यदि घूंट घूंट आस्वाद लंेगे तो अर्से तक आप उन्हें भुला भी नहीं पाएंगे। वे आपकी स्मृतियों को झंकृत करते रहेंगे। रजा दअरसल चित्रों से देखने वाले का रागात्मक संबंध स्थापित कराते हैं। बेषक, चित्रों में उभरी स्मृतियां उनकी वैयक्तिक हैं, उनके अपने संदर्भ है परन्तु वे देखने वाले की अंतर्मन भाव सत्ताओं को गहरे से छूती है। ड्राइंग के अंतर्गत रेखाओं का उनका सहज लयात्मक संतुलन और कोमलता हर देखने वाले को आत्मीयता का बोध कराती है। उनके चित्रों में जिस प्रकार की सफाई, रंग स्पर्ष से झलकने वाली कोमलता नजर आती है, वह अमूर्तन में इधर न के बराबर दिखायी देती है। यह रजा की कला के गंभीर आत्मसयंम की ही परिणति है, जिसमें वे कैनवस पर अनुभूति और संवेदनाओं के अपने आत्मकथ्य की खोज बाहर की ओर नहीं करके भीतर की ओर करते हैं, देखने वालों को करवाते हैं।बहरहाल, रज़ा के चित्रों पर पहले भी लिखा है, परन्तु इस बार जब जवाहर कला केन्द्र में लगे उनके चित्रों की प्रदर्षनी देखी तो लगा वे इस उम्र भी में भी निंरतर कला की बढ़त की ओर ही उन्मुख है। रंगों का तो वे अद्भुत लोक रचते हैं। रंग उनके चित्रांे का माहौल बनाते हैं। भावों के उद्वेग में रंग एक निर्मम तटस्थता भी प्रदान करते हैं। आंतरिक तन्मयता और आग्रहषीलता से रजा अपनी ऐन्द्रिकता को कैनवस पर रूपायित करते जैसे दृष्यों को लेख बंचवाते हैं। प्रकृति और जीवन के रहस्यों को कैनवस की भाषा में परोटते उनके चित्र अभिप्राय बहुत अधिक चर्चित भले नहीं हो परन्तु बौद्धिक आडम्बर उनमें नहीं है। मसलन पंचभुत तत्व का उनका चित्र ही लें या फिर बिन्दू के उनके चित्र या फिर उनके रेखांकन-सभी में ज्यामितिक आकारों के उभरते बिम्ब और प्रतीक अदम्य ऊर्जा लिए हैं। उनके चित्रों की बड़ी विषेषता यह भी है कि वे पावन शंांति का अहसास कराते हैं। ऐसे दौर में जब रंग और रेखाएं कैनवस में कला की सघनता की बजाय बाजार की संभावनाओं की दस्तक देती हों, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि रजा के चित्र कला के सच से हमंे रू-ब-रू कराते आषय की अर्थवत्ता की तलाष कराते हैं। उनके बरते रंग मन में उत्सवधर्मिता का जैसे आगाज करते हैं। कोलकाता की आकार-प्रकार आर्ट गैलरी के जरिए प्रदर्षित उनके चित्र हाल ही बनाए हैं और वे सभी ‘लिरिकल’ हैं, हॉं, कुछ में जबरदस्त दोहराव भी है परन्तु समग्रता में उनके चित्रों के रंग और रूपाकार एक अतीन्द्रिय सत्ता के संवाहक बनते, सूक्ष्म बौद्धिक संवेदनाओं का सांगीतिक आस्वाद लगभग सभी स्तरों पर कराते हैं।

Sunday, March 7, 2010

पाषाण सौन्दर्य और सुरम्य झील...



यात्रा डायरी
‘बीकानेर में सुरम्य झील!॥ हिल स्टेषन जैसे दृष्य!’‘क्यों? विष्वास नहीं हो रहा?...’‘तुम कह रहे हो तो मान लेता हूं।...अच्छा कब ले जा रहे हो वहां?’‘तुम तो कल जा रहे हो नहीं तो कल ही ले चलता।’‘मेरा जाना कैंसिल...आज ही टिकट रद्द करवा देता हूं। मैं कल तुम्हारे साथ अब गजनेर चलूंगा।’ कोलकता से आए मित्र इन्द्र ने सच में गजनेर के लिए अपनी यात्रा स्थगित कर दी थी। उसे गजनेर की इतनी उतावली हो रही थी कि रात को वह ठीक से सो भी नहीं पाया। वह बीकानेर में तब इन्टनेषनल कैमल फेस्टिवल में भाग लेने वह आया था। तय यह हुआ कि इन्द्र के साथ मोटरसाईकिल पर ही गजनेर जाया जाए। दिन में सूबह 9 बजे ही हम लोग मोटर साईकल पर रवाना हो गए थे। बीकानेर से कोई 30 किलोमीटर दूर स्थित गांव गजनेर के लिए। मोटर साईकिल में हवाओं के सर्द झोंकों का अहसास लेते हम बीकानेर शहर के अंतिम छोर स्थित मुरलीधर व्यास कॉलोनी को क्रॉस करके रेलवे फाटक के पास पहुंच गए थे। सामने छोटा सा बोर्ड लगा हुआ था, ‘नाल बड़ी।’ इन्द्र अपने आपको रोक नहीं पाया, बोला, ‘अरे! ये क्या नाम है?’ ‘इसमें अचरज क्यों हो रहा है, गांव का नाम है भाई।’ ‘अजीब नाम है।’ ‘यह जानकर और भी अजीब लगेगा कि भारतीय सेना के मिग ट्वन्टीवनों का बड़ा कारवां यहीं से गुजरता है। भारतीय सेना का बड़ा हवाई अड्डा है यहां।’ ‘अच्छा। तब तो पहले हम वहीं चलते हैं।’ ‘वहां प्रवेष निषेध है।’ ‘ओह!’ मोटर साईकिल 50 की स्पीड में आगे बढ़ रही थी। रास्ते में सड़क के किनारे किंकर के पेड़ और उड़ती रेत के अलावा दूर तक नजर दौड़ाएं तो सपाट रेत के मैदान, कुछ अन्तराल पर रेत के धोरों के अलावा उजाड़ ही उजाड़ था। मरूस्थल में विरानगी के इन नजारों में गजनेर के जिस सौन्दर्य का मैंने बखान किया था, उसको लेकर उसे अभी भी संदेह था। कोई एक घंटे में हम गजनेर पहुंच गए। मरूस्थल के गांव जैसा गांव। सामने एक छोटा सा तालाब। गंदा, मटमेला पानी। कुछ गायें और भैंसे उस पानी में नहा रही थी तो कुछ औरतें दूसरे किनारे से उसी पानी को पीने के लिए मटकों में भर रही थी। आस-पास किंकर के अलावा कुछ नहीं। ‘यह है झील!...इसमें क्या नया है।...तुम तो कह रहे थे बहुत खूबसूरत स्थान ले जा रहा हूं। यहां क्या खास है? यह तालाब (गजनेर झील) और और गांवो जैसा गांव! क्या यही है तुम्हारा खूबसूरत गजनेर।’‘अभी तुमने देखा ही क्या है? आओ आगे चलते हैं।’कहते हुए मैं मोटर साईकिल को अंदर संकरे रास्ते की ओर घुमा ले जाता हूं। किल,े महलों की शानदार विरासत की कड़ी के नायाब नमूने गजनेर पैलेस के प्रवेष द्वार तक पहुंचते-पहुंचते दृष्य जैसे परिवर्तित होने लगते हैं। मैं इन्द्र की ओर देखता हूं। उसे भी हैरानी है। चहुं ओर हरियाली। रेत के टिले। पत्थरों का सौन्दर्य और...यह विषाल प्रवेष द्वार। हम दुलमेरा के लाल पत्थरों से निर्मित राजस्थान के शानदार महल गजनेर पैलेस में है। मोर अपनी मीठी आवाज में जैसे स्वागत कर रहे हैं। मरूस्थल में विषाल पेड़। उन पर चहचहाते पक्षी। ठंडी हवाएं अवर्णनीय शांति का अहसास करा रही है।‘खमाघणी हुकूम। म्हूं आपरी काईं खिदमत कर सकूं हू।’पारम्परिक पगड़ी और वेषभुषा में बड़ी-बड़ी मूंछो में सहज मुस्कान के साथ चौड़ी कद काठी का रोब वाला एक व्यक्ति झुक कर स्वागत करते हुए जब यह कहता है तो राजस्थान की संस्कृति जैसे मेरे पर्यटक मित्र की आंखों के सामने साकार हो उठती है। इन्द्र गजनेर पैलेस के अप्रतिम सौन्दर्य को ही निहारने मंे लगा है। लाल पत्थरों से निर्मित प्रकृति की गोद में बसे पैलेस के आस-पास के क्षेत्र को देखकर भी उसे घोर अचरज हो रहा है। मैं उसे बताता हूं, ‘अब यह हैरिटेज होटल है। कभी बीकानेर के पूर्व महाराजा गजसिंह ने विक्रम संवत् 1803 में यह गांव बसाया था।’ एचआरएच ग्रूप के हेरिटेज होटल का मैनेजर पूर्व परिचित है, उसे दूरभाष पर सूचित कर दिया था इसलिए वह हमारा इन्तजार ही कर रहा था।’ इन्द्र पैलेस की हरियाली को देखकर हैरत में है। सामने पैलेस से सटी झील का नजारा देखकर तो चौंक ही पड़ता है। उसे विष्वास नहीं हो रहा, गांव में ऐसा दृष्य दिखायी देगा। एक छोटी सी बोट तैर रही है पानी में। साफ पानी। थोड़े थोड़े अन्तराल में पैलेस के पत्थरों से टकराकर मधुर ध्वनित करता मन को जैसे आंदोलित कर रहा है। ‘तुम्हें यहां सब जानते हैं!’‘हां, जब भी बीकानेर आता हूं। यहां आता ही हूं। बचपन से ही आता रहा हूं। तब यह हैरिटेज होटल नहीं था। मित्रों के साथ पिकनिक मनाने का यही गंतव्य था।’‘सच में, मन करता है, यहीं बस जाऊं।’‘हैरिटेज वाले लूट लेंगे, सोच लो।’ मैं जब यह कहता हूं तो इन्द्र जोर से हंस पड़ता है। सुन्दरता को होटल वालों ने ही सहेज लिया है...नहीं तो यहां भी उजाड़ होता। कितने किले, महल ऐसे ही तो उजाड़ होते चले गए हैं।...सोचते हुए ही मैं इन्द्र के साथ झील के किनारे टहल रहा हूं। हैरिटेज होटल मैनेजर मल्होत्रा हमारे पास आकर चाय की मनुहार करता है। हम ना नहीं करते। वह इसके लिए आदेष दे देता है, फिर इन्द्र की ओर देखते हुए बताने लगता है, ‘यह जो झील आप देख रहे है, उसके जल ग्रहण हेतु बीकानेर के महाराजा ने कभी ब्रिटिश इंजीनियरों को बुलाया था। ब्रिटिष इंजीनियरों ने इस तकनीक से इस कृत्रिम झील का निर्माण किया कि गांव के किसी भी कोने से इस झील को देखें, आपको यह वैसी दिखायी नहीं देगी जैसी गजनेर के शानदार पैलेस से दिखायी देती है।’‘तो क्या यह वही झील है जो गांव में आते ही हमने देखी थी?’‘हां, यही झील गजनेर गांव में आगे चलकर तालाब का रूप ले लेती है। वहां उस तालाब में नहाने वाला कोई सोच नहीं सकता कि वह गजनेर पैलेस की शानदार झील के एक हिस्से में नहा रहा है। दरअसल पैलेस में रहने वालों और आने वाले मेहमानों के लिए इस मनोरम झील में जल प्रबंधन की व्यवस्था कुछ इस तरह से की हुई है कि भले ही गांव के तालाब का पानी सूख जाए परन्तु पैलेस की झील कभी नहीं सूखती। सदा भरी रहती है यह झील। यही नहीं झील में जीव-जन्तु भी हैं और प्रति वर्ष यहां विदेषी प्रजातियों के पक्षी भी विचरण करने लाखों मिलों की दूरियां तय कर आते हैं। प्रति वर्ष यहां इम्पीरियन ग्राण्डस विदेशी पक्षी भी आते हैं। झील में आठ ‘वाटर चैनेल्स’ एवं स्थान-स्थान पर ‘रूल्स गेट’ और बांध आदि बने हुए है।’...हम गजनेर झील के सौन्दर्य में ही खोए हुए हैं।...अरे! दूर वह पक्षियों का जोड़ा भी झील में सूस्ता रहा है।...रमणिक। जल महल से झील का ऐसा दृष्य। सोचकर ही अचरज होता है। रेगिस्तान में अद्भुत है झील का ऐसा सुहावना दृष्य। सच! गजनेर के ऐतिहासिक पैलेस में चार चांद लगाती है यह कृत्रिम झील। लाल पत्थरों से निर्मित गजनेर के ऐतिहासिक पैलेस का महत्व इसलिए भी है कि इसमें प्राचीन और आधुनिक शैली की स्थापत्य कला का सांगोपांग मेल है। गजनेर पैलेस आजादी के बाद वर्षों तक उपेक्षित पड़ा रहा।...1994 में उदयपुर के महाराणा और हिस्टोरिक रिसोर्ट एंड होटल्स यानी एचआरएच ग्रूप के अध्यक्ष अरविंद सिंह मेवाड़ ने इसे होटल में परिवर्तित करते इसके जिर्णोद्धार का बीड़ा उठाने की पहल की।...अब इस हेरिटेज होटल के महल सूइट बन गए हैं। पश्चिमी शैली में स्थानीयता का पुट लिए इस ऐतिहासिक पैलेस की स्थापत्य कला, शिल्पकला इतनी भव्य है कि मन करता है इसे निहारते रहें। बस जाएं यहीं। यहां के डूंगर निवास, मंदिर चौक, गुलाब निवास ओर चंपा निवास में लाल पत्थरों का स्थापत्य सौन्दर्य अवर्णनीय है। पैलेस में महाराजा गजसिंह द्वारा बनाए सभी महल एक से बढ़कर एक हैं। यहीं एक सुन्दर कालीन भी है। इन्द्र सहज प्रष्न करता है, किसने बनायी?...’पता चलता है, बीकानेर के केन्द्रीय कारागृह में कैदियों द्वारा निर्मित है यह कालीन। महल के किसी भी कोने से इस कालीन को देखें। आपको हर कोने से यह अलग रंग में दिखायी देगा। है, न आष्चर्यजनक। गलीचे की बुनाई इतनी शानदार कि इसके बारे में हमारे पास कुछ कहने को शब्द कम पड़ रहे हैं।गजनेर पैलेस में ही हम लंच लेते हैं।...कुछ पल सुस्ताकर वहीं आस-पास घूम लेते हैं।...पूरा दिन गजनेर पैलेस में ही बिताते हैं।...पाषाण सौन्दर्य में रेगिस्तानी की सुन्दरता और ढ़ेरों बाते...पता ही नहीं चलता दिन बीत जाता है। ...सांझ गहरा रही है। पैलेस की छतों पर रियासत काल में बने कांच के झुमरों में बल्ब की रोषनी बेहद भली-भली लग रही है। इस रोषनी में डीनर का आनंद लेते प्रकृति के इस सुरम्य स्थल पर पसरी रेत की शांति मन में जो अहसास करा रही है, उसे बंया नहीं किया जा सकता। अपने पर्यटक मित्र के साथ गजनेर पैलेस से लौटे इतने दिन हो गए परन्तु अभी भी पैलेस के जल महल के किनारों से टकराते झील के पानी की मधुर आवाज कानों में प्रकृति के अद्भुत दृष्य की अनुभूति कराती जैसे हमे फिर से बुला रही है ‘पधारो म्हारे देस’...।



डेली न्यूज़ के रविवारीय "हम लोग" में प्रकाशित, दिनांक ७-३-१०

Thursday, March 4, 2010

संस्कृति के अंतर्द्वन्द की पुनर्रचना

सिनेमा का कला से सीधा ही नहीं बल्कि निकट का रिष्ता है। इसलिए कि दोनों ही एक दूसरे के लिए अनंत संभावनाओं के द्वार खोलते हैं और बेशक व्यावहारिक रूप में सामाजिक सरोकारों से जुड़े भी हैं। बहरहाल, कला की सभी विधाएं अंततः अपने माध्यमों से कोई न कोई कथा कहने का ही प्रयास करती है। मुझे लगता है कला के विभिन्न रूपों का पारस्परिक संतुलित समन्वय करना कला को एक प्रकार से अभिजात्य वर्ग की सीमाओं से बाहर निकाल उसे जन सामान्य तक पहुंचाने की प्रक्रिया ही है और फिल्म में इसकी सर्वाधिक संभावनाएं हैं। पिछले दिनों जयपुर के नमन गोयल की बनायी ‘एन अफेयर विद न्यूयॉर्क’ देखते इसे जैसे और गहरे से अनुभूत किया। नमन न्यूयॉर्क फिल्म एकेडमी में फिल्म निर्माण और निर्देषन की बारीकियां सीख रहा है। यहां रहते उसने अपने वतन के संस्कारों की स्मृतियों में न्यूयॉर्क की जीवन शैली, संस्कृति को फिल्म में जैसे गूंथ दिया है। दैनंदिन जीवन की साधारण घटनाओं से विषेष उद्दीपन में मन और दैहिक संबंधों के साथ संस्कारों से मुक्ति के घटनाक्रमों में तेजी से बदलते फिल्म के दृष्य घनीभूत नाटकीय रूप धारण कर देखने वाले को आंदोलित करते हैं। रचनात्मक अर्थों में कहानी के बिखरे कोलाज की एक बड़ी विषेषता यह भी है कि इसमें कमेन्ट्री, परस्पर संवाद और सब टाईटल्स की मदद से कथा के बड़े सूत्रों को अल्पअवधि में सहज संप्रेष्य किया गया है। खुद के संस्कारों के बरक्स अपने तई सामाजिकि संहिताओं का एक प्रकार से विरेचन करते नमन ने फिल्म में यथार्थ के विकृत को ट्रिटमेंट में कला की सौन्दर्यानुभूति भी दी है। स्क्रिन पर ताजमहल, खजूराहों की मूर्तियों के बहाने न्यूयार्क और भारतीय दर्शन की गहराईयों को भी जिया गया है। यथार्थ जीवन के कटू सत्यों के साथ उनके संघर्ष में नमन ने अपनी फिल्म में संस्कृतियांे के अंतर्द्वन्द को सैलुलाइड पर जैसे पुनर्सृजित किया है। नमन ने इससे पहले ‘अदर देन राइट ऑर रोंग’, ‘सस्पेक्ट लिस्ट’, बिगनिंग टू गेट बाल्ड’ जैसी लघु फिल्में भी बनायी है। कथ्य की मौलिकता और भाव बोध को अधिकाधिक सुगम करती उसकी बनायी फिल्में मन और मस्तिष्क को झंकृत करती कुछ सोचने को विवष करती है। मुझे लगता है, वास्तविकता की पुनर्रचना की सिनेमा की आभासी क्षमता ही उसके कला सरोकारों को और अधिक प्रमाणित करती है।
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक ५-३-१०

Friday, February 26, 2010

दृश्य की गति का नयी दीठ से पुनराविष्कार



जीवन मे जो कुछ हो रहा है, उसे हम नंगी आंख से बहुतेरी बार शायद ठीक से देख और समझ नहीं पाते। शायद इसका कारण यह भी है कि चीजें और दृश्य इस तेजी से बदलते हैं कि उनकी गति को हमारी आंख चाह कर भी पकड़ नहीं पाती। वस्तुओं के रूप, टैक्सचर, आकार जैसी चक्षुगम्य लाक्षणिकता के स्थान पर उनकी अनुभूत गति को कैमरा पकड़ सकता है, बशर्तें उसे बरतने वाला कला की संवेदनशील आंख रखता हो। हिमांशु व्यास के छायाचित्रो में कला की बारीकियों को सहज अनुभूत किया जा सकता है। उसके चित्र देखते लगता है, वह दृश्य की प्रतिकृति ही नहीं करता बल्कि उसमें अपने तई संवेदना जोड़ता दिख रहे दृश्य की गति का नयी दीठ से पुनराविष्कार भी करता है। उसके कैमरे से निकले चित्रों में प्रकृति और जीवन के रंग अपने शास्वत स्वरूप में तो हैं परन्तु खुद उसकी आंतरिक संवेदना में वे अपनी पृथक स्वायत्ता लिए भी अलग से लुभाते हैं। मसलन उसका एक बेहद खूबसूरत छायाचित्र है पानी मंे विसर्जित प्रतिमा का। प्रतिमा के बहाने जल में उभरते दूसरे बिम्ब यहां छायाचित्र की कला सर्जना के संवाहक हैं। एक छायाचित्र है जिसमें चिड़िया उड़ रही है। एक गमले से दूसरे गमले में फूदक कर पहुंचती चिड़िया की गति और पाश्र्व की हरितिमा में यहां संवेदनशीलता का जैसे काव्यात्मक सृजन किया गया है। एक कला दूसरी कला को कैसे आलोकित करती है, उसे इस दृश्य में गहरे से समझा जा सकता है।बहरहाल, हिमांशु के संवेदना चक्षु में टूटती इमारत की पानी में पड़ती स्पष्ट परछाई, रात्रि में स्ट्रीट लाईट की रोशनी में साईकिल चलाते साधु का अद्भुत अक्स, श्वेत-श्याम छायाचित्र में बादलों की लुकाछिपी में होले से निकलता सूरज और झोपड़ी की मुंडेर पर इस दृश्य का आस्वाद लेती चिड़िया और बरसात में चलते पथिक के बहाने झरते पानी की संगीत की सुर लहरियां में जैसे दर्शन लोक और जीवन की अद्भुत लय का विस्तार है। मुझे लगता है हिमांशु के छायाचित्रों में अर्थ बहुल ध्वनियां है। ये ध्वनियां कैमरे के उसके एंगल, कोण के साथ ही औचक उत्पन्न ऐसे दृश्य जिसकी पुनरावृति उसी रूप में फिर से संभव नहीं है, में विशिष्ट रूप में सुनी जा सकती है। स्मृति को सघन और उत्कट करते कैमरे से लिए हिमांशु के दृश्य इसी कारण अप्रत्याशित और अद्वितीय रूपों की सर्जना करते हैं। हर कला की अपनी स्वायत्ता होती है और वह समाज निरपेक्ष होती है, हिमांशु का कैमरा इसे और अधिक सघन और संवेदनशील अर्थों में समझाता है। उसके छायाचित्रो को देखकर कला के दूसरी कलाओं से अंतःसबंधों को भी समझा जा सकता है।



प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक २६-२-10

Friday, February 19, 2010

जड़त्व तोड़ती कथक नृत्यांगना का सम्मान


घरानों की परम्पराओं के बावजूद संगीत और नृत्य परिवर्तनषील है। घराने नृत्य और संगीत की पारम्परिक शास्त्रीयता का पोषण तो करते हैं परन्तु यदि कोई कलाकार घरानों की परम्परा में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ता है, तो फिर उसकी कोई सार्थकता भी नहीं है। व्यक्तिगत मुझे लगता है संगीत और नृत्य परिवर्तनषील यानी क्षितिज-विहीन हैं। यदि परम्परा मंे वे चलते रहें तो फिर उनमें जड़त्व आ जाता है। इस जड़त्व को वे ही कलाकार तोड़ते हैं जो खुद अपनी ओर से उसमें कुछ जोड़ते हैं। ऐसा जिसमें पारम्परिक कला और भी निखर निखर जाती आनंदानुभूति कराती है। मुझे लगता है, कथक के जयपुर घराने की नृत्यांगना प्रेरणा श्रीमाली ऐसी ही कलाकार हैं। इस बार जब सगीत नाटक अकादमी अवार्ड उनहें देने की घोषणा हुई तो लगा कविता की लय को उसका हक दिया गया है। उनकी नृत्य प्रस्तुतियों को बहुतेरी बार देखा है और हर बार यूं भी लगा जैसे वे पहले की ही अपनी प्रस्तुति का फिर से पुनराविष्कार कर रही हैं। परम्परागत कथक में प्रेरणा की तत्कार बेजोड़ है। वें जब नृत्य करती हैं तो घुंघरू ताल का विलक्षण चमत्कार दिखाते हैं और उनके गत और भावों का तो कहना ही क्या! यह जब लिख रहा हूं, जयुपर लिटरेरी फेस्टीवल में अषोक वाजपेयी की पढ़ी, कविता जेहन मेें कौंध रही है,- वह अपने एकान्त को भरती है/अपने शरीर की लय से,/लालित्य से/उसकी आत्मा/उसे अपलक निहारती है...’। प्रेरणा के नृत्य में कोमल कल्पनाओं, सूक्ष्म विचारों, उल्लास, प्रेम, हृदय की पीड़ा आदि मनोभावों के साथ ही दारूण दुख, स्वकीया, परकीया, नदी, समुद्र, त्याग, सन्यास आदि बहुतेरे विषयों के भाव प्रदर्षन उसकी आंख, भौहें, पलकोें और मुस्कान से सदा विषिष्ट अंदाज में जीवन्त होती है। इसमें परम्परा भर नहीं है, खुद उसके नृत्य की रची भाषा की भावाभिव्यक्ति है। गुरू कुंदनलाल गंगानी की दी परम्परा को आगे बढ़ाते प्रेरणा ने दर्षन की गहराईयों में संगीत के भावों को अपनी विषिष्ट अदाओं के संस्कार दिए हैं। वह कहती भी है, ‘मैं नृत्यांगना हूं। नृत्य मेरी भाषा है। नृत्य ने मेरे जीवन का मार्गदर्षन किया है।’सच ही तो है यह संगीत और नृत्य ही तो है जो हमारा मार्गदर्षन करते भीतर के हमारे खालीपन को भरते हैं। इस लिहाज से ताल और लयकारी की गूढ़ता के साथ भावों और कल्पनाओं के सच्चे और सूक्ष्म प्रदर्षन को जीती प्रेरणा का सम्मान परम्परा के जड़त्व को तोड़ती कथक को समृद्ध करती कलाकार का सम्मान नही है!
डेली न्यूज़ में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक १९-२-२०१०

Thursday, February 11, 2010

नृत्य, संगीत, नाट्य के आदि प्रवर्तक आचार्य

भारतीय कला-सृष्टि, सृष्टि का पुनःस्थापन है। सृष्टि का अनुकरण है। नव सृष्टि है। जब भी कला के ये भाव मन मंे आते हैं, भगवान षिव की नटराज मूर्ति आंखों के सामने घुमने लगती है। षिव ही तो हैं जो नृत्य, संगीत, नाट्य के आदि प्रवत्र्तक आचार्य हैं। संगीत को अधिक सूक्ष्मता प्रदान करने के लिए भगवान षिव ने ही सुर सप्तक की रचना की। इसी से वे नादतनु कहलाए। षिव सूत्र में कहा गया है ‘नर्तक आत्मा’ अर्थात् आत्मा नर्तक है। षिव का नृत्य आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक इन तीनों ही स्तरों पर हो रहा है। नृत्य का जहां जन्म होता है, वहीं गति होती है। षिव नर्तक हैं, नटराज हैं। नृत्य सम्राट है। यह संपूर्ण विष्व षिव का लगातार नाच ही है। सृजन के नृत्य और जीवन चक्र की नियमितता की मनोहर अभिव्यक्ति षिव की नटराज मूर्ति में ही दिखायी पड़ती है। नटराज में सृष्टि के लयात्मक विकास तत्व का दर्षन है। अपने नृत्य रस में मस्त चिदंबर षिव के आनंदमय नृत्य से ही सृष्टि का जन्म और विकास साथ साथ होता रहता है। नटराज की मूर्ति को इस बार जब देखें तो जरा गौर करें, उनके ऊपर वाले दाहिने हाथ में डमरू है। काल के डमरू के ताल पर ही कला थिरकती है। डमरू सृष्टि के उद्भव का प्रतीक है। कहते हैं, सृष्टि का उद्भव विष्फोट से, शब्द से हुआ। नटराज ने एक बार नाच के अंत में चैदह बार डमरू बजाया। इसी से चैदह षिवसूत्रों का जन्म हुआ। यही वस्तुतः उनके शब्द रूप का पूर्ण विस्तार है। इन चैदह सूत्रों के आधार पर ही पाणिनी ने व्याकरण की रचना की। आकाषवाणी में अस्थायी उद्घोषक की सेवाओं के दौरान स्टूडियो में जब भी प्रवेष करता, षिव की नटराज मूर्ति से ही सामना होता। षिव के इस नृत्य स्वरूप ने मन को झंकृत करते सदा ही विचारों की जाग का नया भव दिया। ऐसा जिसमें डूब-डूब आज भी आनंद से सराबोर हो जाता हूं। मुझे लगता है सृष्टि के लयात्मक विकास का समग्र दर्षन षिव के नटराज स्वरूप में ही है। षिव का यह नृत्य स्वरूप अमृतमय और मंलकारक है। षिव जब नृत्य करते हैं तो सभी देवता उसमें सम्मिलित होते हैं। सरस्वती वीणावादन करती है, इन्द्र बांसूरी बजाते हैं, भगवती रमा गायन करती है, विष्णु ताल वाद्य मृदंग बजाते हें, देवता उन्हें घेरकर खड़े हैं। यही तो है षिव का महादेवत्व स्वरूप। सृष्टि विद्या समाहित षिव स्वरूप। कुमार स्वामी ने षिव ताण्डव को सृष्टि के रहस्य के उन्मीलन के रूप में देखा है। और मैं, नटराज की मूर्ति जब भी देखता हूं सृष्टि विद्या का रहस्य उसी में पाने लगता हूं। महाषिवरात्रि....नृत्य गीत की रात्रि ही तो है। षिव को याद करते झूमें और गाएं।
प्रति शुक्रवार को "डेली न्यूज़" में प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट"

प्रति शुक्रवार को "डेली न्यूज़" में प्रकाशित लेखक डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" से

संगीत, नाट्य के आदि प्रवर्तक आचार्य

भारतीय कला-सृष्टि, सृष्टि का पुनःस्थापन है। सृष्टि का अनुकरण है। नव सृष्टि है। जब भी कला के ये भाव मन मंे आते हैं, भगवान षिव की नटराज मूर्ति आंखों के सामने घुमने लगती है। षिव ही तो हैं जो नृत्य, संगीत, नाट्य के आदि प्रवत्र्तक आचार्य हैं। संगीत को अधिक सूक्ष्मता प्रदान करने के लिए भगवान षिव ने ही सुर सप्तक की रचना की। इसी से वे नादतनु कहलाए। षिव सूत्र में कहा गया है ‘नर्तक आत्मा’ अर्थात् आत्मा नर्तक है। षिव का नृत्य आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक इन तीनों ही स्तरों पर हो रहा है। नृत्य का जहां जन्म होता है, वहीं गति होती है। षिव नर्तक हैं, नटराज हैं। नृत्य सम्राट है। यह संपूर्ण विष्व षिव का लगातार नाच ही है। सृजन के नृत्य और जीवन चक्र की नियमितता की मनोहर अभिव्यक्ति षिव की नटराज मूर्ति में ही दिखायी पड़ती है। नटराज में सृष्टि के लयात्मक विकास तत्व का दर्षन है। अपने नृत्य रस में मस्त चिदंबर षिव के आनंदमय नृत्य से ही सृष्टि का जन्म और विकास साथ साथ होता रहता है। नटराज की मूर्ति को इस बार जब देखें तो जरा गौर करें, उनके ऊपर वाले दाहिने हाथ में डमरू है। काल के डमरू के ताल पर ही कला थिरकती है। डमरू सृष्टि के उद्भव का प्रतीक है। कहते हैं, सृष्टि का उद्भव विष्फोट से, शब्द से हुआ। नटराज ने एक बार नाच के अंत में चैदह बार डमरू बजाया। इसी से चैदह षिवसूत्रों का जन्म हुआ। यही वस्तुतः उनके शब्द रूप का पूर्ण विस्तार है। इन चैदह सूत्रों के आधार पर ही पाणिनी ने व्याकरण की रचना की। आकाषवाणी में अस्थायी उद्घोषक की सेवाओं के दौरान स्टूडियो में जब भी प्रवेष करता, षिव की नटराज मूर्ति से ही सामना होता। षिव के इस नृत्य स्वरूप ने मन को झंकृत करते सदा ही विचारों की जाग का नया भव दिया। ऐसा जिसमें डूब-डूब आज भी आनंद से सराबोर हो जाता हूं। मुझे लगता है सृष्टि के लयात्मक विकास का समग्र दर्षन षिव के नटराज स्वरूप में ही है। षिव का यह नृत्य स्वरूप अमृतमय और मंलकारक है। षिव जब नृत्य करते हैं तो सभी देवता उसमें सम्मिलित होते हैं। सरस्वती वीणावादन करती है, इन्द्र बांसूरी बजाते हैं, भगवती रमा गायन करती है, विष्णु ताल वाद्य मृदंग बजाते हें, देवता उन्हें घेरकर खड़े हैं। यही तो है षिव का महादेवत्व स्वरूप। सृष्टि विद्या समाहित षिव स्वरूप। कुमार स्वामी ने षिव ताण्डव को सृष्टि के रहस्य के उन्मीलन के रूप में देखा है। और मैं, नटराज की मूर्ति जब भी देखता हूं सृष्टि विद्या का रहस्य उसी में पाने लगता हूं। महाषिवरात्रि....नृत्य गीत की रात्रि ही तो है। षिव को याद करते झूमें और गाएं।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित लेखक का स्तम्भ "कला तट"

नृत्य, संगीत, नाट्य के आदि प्रवर्तक आचार्य
भारतीय कला-सृष्टि, सृष्टि का पुनःस्थापन है। सृष्टि का अनुकरण है। नव सृष्टि है। जब भी कला के ये भाव मन मंे आते हैं, भगवान षिव की नटराज मूर्ति आंखों के सामने घुमने लगती है। षिव ही तो हैं जो नृत्य, संगीत, नाट्य के आदि प्रवत्र्तक आचार्य हैं। संगीत को अधिक सूक्ष्मता प्रदान करने के लिए भगवान षिव ने ही सुर सप्तक की रचना की। इसी से वे नादतनु कहलाए। षिव सूत्र में कहा गया है ‘नर्तक आत्मा’ अर्थात् आत्मा नर्तक है। षिव का नृत्य आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक इन तीनों ही स्तरों पर हो रहा है। नृत्य का जहां जन्म होता है, वहीं गति होती है। षिव नर्तक हैं, नटराज हैं। नृत्य सम्राट है। यह संपूर्ण विष्व षिव का लगातार नाच ही है। सृजन के नृत्य और जीवन चक्र की नियमितता की मनोहर अभिव्यक्ति षिव की नटराज मूर्ति में ही दिखायी पड़ती है। नटराज में सृष्टि के लयात्मक विकास तत्व का दर्षन है। अपने नृत्य रस में मस्त चिदंबर षिव के आनंदमय नृत्य से ही सृष्टि का जन्म और विकास साथ साथ होता रहता है। नटराज की मूर्ति को इस बार जब देखें तो जरा गौर करें, उनके ऊपर वाले दाहिने हाथ में डमरू है। काल के डमरू के ताल पर ही कला थिरकती है। डमरू सृष्टि के उद्भव का प्रतीक है। कहते हैं, सृष्टि का उद्भव विष्फोट से, शब्द से हुआ। नटराज ने एक बार नाच के अंत में चैदह बार डमरू बजाया। इसी से चैदह षिवसूत्रों का जन्म हुआ। यही वस्तुतः उनके शब्द रूप का पूर्ण विस्तार है। इन चैदह सूत्रों के आधार पर ही पाणिनी ने व्याकरण की रचना की। आकाषवाणी में अस्थायी उद्घोषक की सेवाओं के दौरान स्टूडियो में जब भी प्रवेष करता, षिव की नटराज मूर्ति से ही सामना होता। षिव के इस नृत्य स्वरूप ने मन को झंकृत करते सदा ही विचारों की जाग का नया भव दिया। ऐसा जिसमें डूब-डूब आज भी आनंद से सराबोर हो जाता हूं। मुझे लगता है सृष्टि के लयात्मक विकास का समग्र दर्षन षिव के नटराज स्वरूप में ही है। षिव का यह नृत्य स्वरूप अमृतमय और मंलकारक है। षिव जब नृत्य करते हैं तो सभी देवता उसमें सम्मिलित होते हैं। सरस्वती वीणावादन करती है, इन्द्र बांसूरी बजाते हैं, भगवती रमा गायन करती है, विष्णु ताल वाद्य मृदंग बजाते हें, देवता उन्हें घेरकर खड़े हैं। यही तो है षिव का महादेवत्व स्वरूप। सृष्टि विद्या समाहित षिव स्वरूप। कुमार स्वामी ने षिव ताण्डव को सृष्टि के रहस्य के उन्मीलन के रूप में देखा है। और मैं, नटराज की मूर्ति जब भी देखता हूं सृष्टि विद्या का रहस्य उसी में पाने लगता हूं। महाषिवरात्रि....नृत्य गीत की रात्रि ही तो है। षिव को याद करते झूमें और गाएं।

Saturday, February 6, 2010

कुछ कविताए

शब्दों के घाव
चुन-चुन कर
फेंक दिए हमने
सभी अक्षर
अंधे कुओं में।
भाषा के चेहरे पर
इसी से लगे हैं
शब्दों के घाव।

शब्द-एक
शब्दों की नहीं होती
कोई अंतिम यात्रा
अलिखित और मौन में भी
शास्वत है
चरैवेति, चरैवेति।


शब्द-दो
नाप लेते हैं
शब्द
अरबों-खरबों
मीलो की दूरियां
पाट देते हैं
मन की
गहरी खुदी खाइयां।
औचक
भौचक करते
सप्रयास न बन सकने वाला
बना देते हैं
जब वे कोई वाक्यांश
अहसास कराने लगते हैं वे
बूझ ली हो जैसे उन्होंने
मन के भीतर की
अनसूलझी
हजारों-हजार पहेलियां।
शब्द सेतु है
जीवन का।

डेली न्यूज़ में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित लेखक का स्तम्भ कला तट



५ फ़रवरी २०१०


शब्दों का सांगीतिक आस्वाद

हमारे यहां संगीत को इतना शास्त्रगत और अनुष्ठानगत कर दिया गया है कि आम जन की उससे सहज ही दूरी होती चली गयी है। ऐसे मंे यदि किसी पुस्तक में संगीत साधक और सुनने वाले दोनों के भावों की मिठास हो तो वह क्या हमारे अनुभाव-प्रकाष की भाषा नही होगी! यतीन्द्र मिश्र की ‘सुर की बारादरी’ यही आभाष कराती है। पिछले दिनों वह जब जयपुर आए तो यह पुस्तक भेंट कर गए। पढ़ी तो लगा सांगीतिक अनुभवों को सर्वथा नये अंदाज में इसमें जिया गया है। अर्सा पहले बिस्मिल्ला खां से भेंट हुई थी। जितनी मिठास उनकी शहनाई मंे है, उतनी ही मिठास उनके व्यक्तित्व में भी थी, यह पहली बार तभी अनुभूत किया था...और यतीन्द्र ने तो अपनी पुस्तक में शब्द और सुरों की भाषा के जरिए भाव की भाषा का मुहावरा ही जैसे पाठकों को दे दिया है। यह ऐसा है जिसमें शहनाई के सुर ही नहीं झरते बल्कि खुद खां साहब का भोलापन और खुद को कुछ नहीं समझने का वह भाव भी है जो उनकी महानता को दर्षाता है। खां साहब कहते हैं, ‘अभी भी मेरा काम कच्चा है। षडज (स) ही ठीक से कायम नहीं हो सका, तो बाकी के छह सुूरों के लिए अभी छह जन्म और चाहिए।’ यतीन्द्र इस पर टिप्पणी करते हैं, ‘यह बिस्मिल्ला खां की कला प्रज्ञा के प्रति कहन आभार व जन्म की निरर्थकता का वही बोध है, जो निजामुद्दीन औलिया के पास है, जहां सोना-चांदी, घोड़े-हाथी सभी अपनी उपस्थिति में ऐष्वर्यहीन है।’ यतीन्द्र एक जगह अपने लिखने की शुरूआत करते हैं, ‘...अस्सी बरस से वे सुर मांग रहे हैं।’ भाषा का यह सांगीतिक छन्द नहीं है! इस छन्द में खां साहब की सुर साधना के बहुतेरे अनछुए पहलू भी पहली बार पाठकांे के सामने आए हैं। मसलन खां साहब का बचपन का नाम कमरूद्दीन नहीं बल्कि अमरूद्दीन था। उनका जन्म उस डूमगांव मंे हुआ वही जहां की सोन नदी के किनारों पर पाई जाने वाली घास से शहनाई बजाने की रीड बनाई जाती है। यह भी कि उन्हें भारत रत्न सम्मान मिला परन्तु उनकी फटी तहमद नहीं बदली। उनकी षिष्या ने टोका, ‘बाबा!...अब तो आपको भारत रत्न भी मिल चुका है, यह फटा तहमद ना पहना करें।...’ खां साहब लाड़ से भरकर बोले-‘धत्! पगली ई भारत रत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।...मालिक से यही दुआ है-फटा सुर न बख्शे।’ ऐसे ही बहुतेरे प्रसंगों में यतीन्द्र बिस्मिल्ला खां से करीबी नाता कराते हैं। सांगीतिक आस्वाद में आस्वाद में ‘सुर की बारादरी’ मंे बिस्मिल्ला खां से किया संवाद है, बिसरा दी गई लोकधुनें और बेहद पुरानी ठुमरियों के बोल हैं तो काषी की संगीत परम्परा का गान भी हैं। यतीन्द्र लिखते हैं, ‘कजरी के बोलों के साथ अगर आपको घुलना हो और शहनाई की अलबेली लय पर बहुत दूर तक बहते चले जाना हो तो खां साहब के दरवाजे आपके लिए खुले हुए हैं।’ मैं इसमें यह जोड़ देता हूं, शब्दांे में सांगीतिक आस्वाद करना हो और उसमें डूब-डूब जाने का मन हो तो ‘सुर की बारादरी’ मंे आपका स्वागत है।

२९ जनवरी २०१० को प्रकाशित

विचार स्वरूप की संगीत दृष्टि
पद्म पुरस्कारों की इस बार की सूची में पं. जसराज के षिष्य कला मर्मज्ञ मुकुन्द लाठ का नाम पढ़कर सुखद प्रतिती हुई। अर्सा पहले उनकी ‘संगीत एवं चिन्तन’ पुस्तक पढ़ी थी। दर्षन और संस्कृति के संगीत परक विमर्ष की यह अनूठी कृति है। विचार के स्वरूप को संगीत की दृष्टि से देखते वे इसमें कहते हैं, ‘दूसरी कलाओं की तरह राग-संगीत में भी व्युत्पति की रूढ़ियां हमें नये से एक सीमा तक रोकती है। राग-संगीत जैसी परम्पराओं में रूढ़ि-षास्त्र नहीं बांधता-गुरू, सम्प्रदाय, घराने बांधते हैं।’लाठ जब यह कहते हैं तो कलाओं के इतिहास को, उनके अतीत को, उनके संघर्षों को सहज जाना जा सकता है। विचार के स्वरूप को पहले पहल संगीत की दृष्टि से देखते वह बेहद महतवपूर्ण अवधारणाएं भी औचक देेते हैं। मसलन ‘संगीत संस्कृति विषेष की परिधि के भीतर ही बनता और पनपता है क्योंकि शब्द का अनुवाद हो सकता है, पर स्वर का नहीं।’ यह भी कि चिंतन भाषा के माध्यम से होता है, संगीत स्वर के माध्यम से।’ और यह भी कि संगीत की हर समृद्ध परम्परा अपना अलग ‘आधुनिक’ बनाती है जिसमें दूसरे का प्रवेष कु-साध्य होता है।’ लाठ से जब संवाद होता है तो भारतीय संगीत के संबंध में बने बहुत से पूर्वाग्रह टूटते भी हैं। वे कहते हैं, ‘चिन्तन में सृजन की संभावनाओं का वैसा ही सहज विस्तार है जैसा रागदारी में। वैसी ही बहुलता भी है।’ कलाओं के अपने गहरे सरोकारों में लाठ दर्षन की गहराईयां लिए है। लाठ ने दत्तिल मुनि के ढाई सौ श्लोकों के संस्कृत के प्राचीन संगीत ग्रंथ ‘दत्तिलम’ का अनुवाद और विवेचन किया है। जैन व्यापारी और अध्यात्म कवि बनारसीदास की आत्मकथा ‘अर्द्धकथानक: हाफ ए टेल’ के नाम से अनुवाद करते भारत में आत्मकथा लेखन का सूक्ष्म अध्ययन और विवेचन किया है। वीनांद कालावर्त के साथ निर्गुण कवि नामदेव के मूलपाठ का विस्तृत शोध एवं अनुवाद करते प्राचीनतम पाठ की गेय परम्पराओं का महीन विष्लेषण भी किया है। उनका मौलिक चिन्तन मन को झंकृत करता है। जरा देखें उनकी लिखी ये पंक्तियां, ‘चिंतन के साथ संगीत बज नहीं सकता लेकिन इसका यह अर्थ नहीं हे कि इनकी किसी भी तरह जुगलबन्दी नहीं हो सकती।’ बहरहाल, राग, धुन, आलाप जैसी शब्दावली के अपने चिन्तन में मुकुन्द लाठ का संगीत चिन्तन सर्वथा नयी दीठ लिए है। इस दीठ का सम्मान क्या हम सबका सम्मान नहीं है?

डेली न्यूज़ में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित लेखक का स्तम्भ कला तट

२२ जनवरी २०१० को प्रकाशित
झरने लगते हैं शब्द
एक कलाकृति से जब कभी किसी भी रीति से हम प्रतिकृत होते हैं, उससे हमारी एक प्रकार की अंतरंगता बनने लगती हैं। वह हमें अपने नजदीक लगने लगती है। उसके रहस्य को भी तब हम छूने लगते हैं परन्तु कलाकृति को देखते समय की हुई हमारी ढे़रो अनुभूतियों को क्या हम ठीक वैसे ही व्यक्त कर सकते है? दरअसल कलाकृति को देखना और उसके बारे में कुछ कहना दोनों ही अलग है। देखना हमारी एक क्रिया है जबकि उसकी व्याख्या प्रतिक्रिया। देखना अन्तर्मन अनुभव है। देखने के समय हम कलाकृति की तात्कालिक संवेदना से जुड़ते हैं परन्तु लिखने बैठते हैं तो अन्तराल का गैप कुछ और अर्थ ध्वनित करने लगता है। मुझे लगता है हर कलाकृति में कलाकार कला का अपना स्वयं का व्याकरण रचता है। यह जब लिख रहा हूं, अवधेष मिश्र की एक कलाकृति जेहन में कौंध रही है। सूर्य के गोले में प्रकृति की अद्भुत सृष्टि में रंगो के लोक की उनकी चित्रकृति में परम्परा के साथ आधुनिकता का सर्वथा नया व्याकरण है। इस चित्र में अनुभव हैं। स्मृतियां है और परम्पराओं को भी परोटा गया है। अवधेष के लगभग सभी चित्रों में कला की इसी प्रकार की दीठ है। यही कारण है वे मन को आंदोलित करते हैं।दरअसल किसी भी कलाकृति के व्याकरण में समय की संवेदनाओ ंऔर कला की परम्पराओ को जोड़ते हुए लिखते वक्त कलाकृति के अंदर प्रवेष करना होता है। उसमें रचना और बसना पड़ता है। तब शब्द नहीं ढूंढने पड़ते। शब्द अपने आप ही झरने लगते हैं। यदि कोई कलाकृति किसी देखने वाले में चैकन्नी विचारषीलता और अपार रसिकता जगाती है तो स्वतः ही उसका विष्लेषण देखने वाला करने लगता है। यही किसी कलाकृति की सहज आलोचना है। कलाकृति में महत्वपूर्ण यह नहीं है कि वह किस वाद से प्रेरित है या फिर यह कि वह किन सिद्धान्तों पर आधारित है। महत्वपूर्ण यह है कि उसे देखकर मन को कितना सुकून मिल रहा है और वह संवेदना के स्तर पर कितना हमें जगाती है और जिस समय में हम जी रहे हैं, उस समय में उसकी प्रासंगिकता क्या है। कलाकृति को देखते हुए उसके आस्वाद का यह अहसास ही तब मूल्यांकन का हमारा सहारा बनता है। इस सहारे से प्राप्त मंजिल ही क्या किसी कलाकृति की सहज आलोचना नहीं है?