Friday, April 7, 2023

नाद सौंदर्य के स्वर—सिद्ध गायक-पंडित कुमार गंधर्व

आज से पंडित कुमार गंधर्व की जन्मशती शुरू हो रही हैं। मुम्बई में कुमार गंधर्व प्रतिष्ठान, देवास और नेशनल सेंटर्स फॉर द परफोर्मिंग आर्ट्स द्वारा इसकी शुरूआत दो दिवसीय संगीत महोत्सव से आज सांझ ही हो रही है। शास्त्रीय संगीत के वह क्रांतिकारी गायक थे। किसी घराने विशेष से अपनी पहचान न बनाकर उन्होंने अपनी स्वतंत्र शैली, विचार—उजास की दृश्य गायकी ईजाद की। 

राजस्थान पत्रिका, 8 अप्रैल 2023

परम्परागत रूढ़ियां तोड़ते सदा उन्होंने संगीत में नया रचा।मुझे लगता है, नाद सौंदर्य के भी वह विरल अन्वेषक थे। ऐसे जिन्होंने गान में शब्दों को जीते हुए अर्थ छटाओं की गगन—घटा लहराई। सुनेंगे तो लगेगा वह स्वरों को फेंकते, उन्हें बिखराते, औचक ऊँचा करते, विराम देते और फिर अंतराल के मौन को भी जैसे व्याख्यायित करते थे। मिलन—विरह और भांत—भांत की जीवनानुभूतियों में उनका गायन सुना ही नहीं देखा जा सकता है। कबीर के निर्गुण को जो शास्त्रीय ओज उन्होंने दिया, किसी और के कहां बस की बात है! 'उड़ जाएगा हंस अकेला...,' में ‘गुरु  की करनी गुरु  जायेगा, चेले की करनी चेला...’ स्वर—निभाव पर ही गौर करें, लगेगा जीवन का मर्म जैसे हमें कोई समझा रहा है। ऐसे ही 'अवधूता, गगन घटा गहराई रे...' और 'हिरना समझ—बूझ चरना' जैसे गाए निगुर्ण में स्वरों का अनूठा फक्कड़पन है। सुनते मन वैरागी हो उठता है। संसार का सार—असार जैसे समझ आने लगता है।

कुमार गंधर्व का गान लोकोन्मुखी है। लोक का उजास वहां है। स्वयं वह कहते भी थे, सारा शास्त्रीय संगीत 'धुन उगम' माने लोक संगीत से उपजा है।  मीरा, सूरदास के पद हो, ऋतु संगीत हो, ठुमरी, ठप्पा, तराना, होरी या फिर मालवा का लोक—आलोक या फिर उनकी खुद की बंदिशे और स्वयं उनके बनाए रागों में प्रकृति की धुनें हममें जैसे बसती है।युवाओं के लिए उनका आत्मविश्वास कम प्रेरणास्पद नहीं है।  यह उनकी गहन जीवटता ही थी कि छय रोग से बाधित एक फेफड़े के काम का नहीं रहने के बावजूद उन्होंने दमदार गायकी को नए अर्थ दिए। वह तब बीमारी से बिस्तर पर थे कि एक दिन कमरे में चिड़िया की तीखी स्वर फेंक सुनी। बस तभी तय किया, वह गाएंगे। स्वर—सिद्ध करते उन्होंने सुनने वालों को गान की गहराई समझाई। श्वास उतार—चढाव और शब्दों के मध्य के मौन का जो अर्थभरा संगीत उन्होंने बाद में दिया, वह उनका अपना सिरजा गान—ध्यान ही तो था!

कुमार गंधर्व मूलत: केरल के थे। 'कोडवू' गांव के। नाम था, शिवपुत्रय्या यानी कुमार। कर्नाटक आने के बाद वह जब सात ही वर्ष के थे तभी उनके गायन की धूम मच गयी। वहीं उनका सार्वजनिक अभिनंदन हुआ। कन्नड़ मानपत्र में उन्हें संबोधित करते सहज, मनोहर गायन के लिए 'चिन्ह (सुवर्ण) गंधर्व' पदवी दी गयी। और इस तरह शिवरूद्रय्या बाद के हमारे पंडित कुमार गंधर्व हो गए।कुमार गंधर्व पर आरोप लगता रहा है, गायन में वह सिर्फ मध्यलय का ही विशेष प्रयोग करते रहे हैं। बकौल कुमार, 'सुरीली नादमयता का सुंदर प्रकटीकरण मध्यमलय से ही होता है।' पर यह भी तो सच है, मध्यमलय को वही निभा सकता है जो स्वर—विन्यास में अनूठी—अपूर्व कल्पना गान का स्थापत्य रचे। उसके महल खड़े करे।  कुमार ऐसे ही थे, स्वरों के गहन—ज्ञाता। एक दफा जयपुर में जौहरी राजमल सुराणा के यहां नक्काशीदार मीनाकारी के कंगनों का जोड़ा उन्होंने देखा और केदार राग की 'कंगनवा मोरा' बंदिश उन्हें याद आई। दु:ख भी हुआ कि अनमोल कंगनों की उस नजाकत को वह बस ​बंदिश में कभी ला नहीं सके। पर अलग—अलग ऋतुओं में होने वाली बरखा की झड़ियों, ऋतुओं और प्रकृति धुनों के साथ देखे दृश्यों को उन्होंने बाद में जैसे स्वर—सिद्ध कर लिया था। इसीलिए तो उनकी गायकी उपज सदा खिली—खिली हमें लुभाती है, लुभाती रहेगी।

Friday, January 27, 2023

अन्तर्मन अनुभूतियों की ताल—लय का सम्मान

गणतंत्र दिवस पर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान के अंतर्गत इस बार उस्ताद जाकिर हुसैन को 'पद्म विभूषण' देने की घोषणा महत्वपूर्ण है। उस्ताद जाकिर हुसैन इस दौर के अनूठे तबला वादक ही नहीं है बल्कि भारतीय संगीत परम्परा के ऐसे  मनी​षी हैं जिन्होंने अपनी मौलिक दृष्टि और प्रयोगधर्मिता से इस ताल वाद्य को निरंतर संपन्न करते उसे सर्वथा नया मुकाम दिया है।

 राजस्थान पत्रिका 28 जनवरी 2023

तबला एकल वाद्य नहीं है। प्राय: गायन और दूसरे वाद्यों की संगत से जोड़कर ही इसे देखा जाता रहा है पर जाकिर हुसैन ने इसे स्वतंत्र पहचान दी। बल्कि कहूं इस साज़ को लुभाने वाली ज़बान दी। ऐसी जिसमें जीवन से जुड़े भांत—भांत के अनुभवों को हम सुन सकते हैं, सुनते हुए निंरतर गुन सकते हैं। तबले में निहित उनकी ताल मानों काल से होड़ करती है। समय के अनंत प्रवाह से साक्षात् कराती। संगीत में लय की प्रतिष्ठा किससे है? ताल से ही तो! उस्ताद जाकिर हुसैन ने ताल की स्वतंत्र प्रतिष्ठा में इसे निरंतर जीवन की लय से जोड़ा है। उनका तबला सुनेंगे तो लगेगा, अन्तर्दृष्टि संवेदन में ध्वनि से भावों की अद्भुत व्यंजना वहां है।

याद पड़ता है, एक कार्यक्रम में तबले का उनका ‘कायदा’सुना था। तबले में परम्परागत शास्त्रीय संकेतो को न बिगाड़ते हुए इसमें तेज दौड़ते घोड़े की टापों के साथ कड़कती बिजली में झमाझम होती बारिश की वह जैसे अनुभूति करा रहे थे। ऐसा ही तब भी होता है जब वह अपने तबले पर डमरू के नाद का आभाष कराते हैं। तबले पर डमरू के नाद की अनुभूति से हम जुड़ते ही हैं कि औचक शंख ध्वनि से साक्षात् होने लगता है। ऐसे ही नदी की कल—कल, झरनों के झर—झर और भी बहुत सी  ध्वनियों के भांत—भांत के भावलोक में ले जाते वह लय और छंद में ताल का विरल आधार खड़ा करते है। उनके तबले में बंधे अंतराल की नियंत्रित अवधि यानी मात्राओं के छोटे—छोटे सुगठित गुच्छे भी लुभाते हैं। काल के अंतरालों का विशेष विन्यास! चुप्पी और फिर होले—होले होती गूंज!  छंदों के इस अन्तर्विन्यास में उनका तबला ध्वनि के विस्तार और उसकी सीमाओं को पहचानता सुनने वालों से संवाद करता है। तबले पर थिरकती उनकी अंगूलिया जैसे दृश्यभाषा रचती है। गत-फर्द और अद्भुत उठान के इस दौर के वह विलक्षण कलाकार हैं।

जाकिर हुसैन ने ताल वाद्य में पूर्व-पश्चिम के मेल के साथ अंतर्मन अनुभूतियों का अनूठा रूपान्तरण किया है। यह लिख रहा हूं और उनके एकल तबले की लय में ही मन जैसे रमने लगा है। होले होले तबले की उनकी थाप गति पकड़ती औचक थम जाती है! रह जाती है बस एक गूंज। आवृत्तियां...विलम्बित लय में मध्य और फिर द्रुत… प्रस्तार!  प्रस्तार माने विस्तार, फैलाव।  त्रिताल का ‘धिन’ और एकताल का ‘धिन’ भिन्न आघात पर अनूठी साम्यता! उनका एकल तबला वादन तो विरल है ही पर उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली, ओंकारनाथ ठाकुर, पं. रविशंकर, अली अकबर खाँ,प. हरि प्रसाद चौरसिया और उसके बाद की पीढी में शाहिद परवेज़, राहुल शर्मा, अमान-अयान  के साथ उन्हें सुनेंगे तो लगेगा वहां तबले की ‘संगत’ भर नहीं है लयात्मक गतियों में जीवन जैसे गुनगुना रहा है। पिता उस्ताद अल्ला रक्खा खां की विरासत में मिली तबला वादन परम्परा में उन्होंने निंरतर बढ़त ही नहीं की बल्कि उसे जीवंत करते जन—मन से जोड़ा है। उन्हें पद्म विभूषण का अर्थ है, संगीत की हमारी महान परम्परा का सम्मान।