Friday, May 8, 2020

‘रामायण’ धारावाहिक की लोकप्रियता के मायने


दूरदर्शन द्वारा प्रसारित किये गये धारावाहिक ‘रामायण’ ने हाल ही में दुनिया में सर्वाधिक देखे जाने वाले धारावाहिक के रूप में विश्व रिकॉर्ड बनाया है। दूरदर्शन चैनल के आधिकारिक अकाउंट से जारी एक ट्वीट में बताया गया कि दुनियाभर में रिकॉर्ड व्यूअरशिप के साथ रामायण 7.7 करोड़ दर्शकों के साथ दुनिया का सबसे ज्यादा देखा जाने वाला मनोरंजन शो बन गया। दर्शकों के मामले में इस धारावाहिक ने विश्वभर  में सर्वाधिक लोकप्रिय टीवी शो ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ को भी पीछे छोड़ दिया। सवाल यह है कि यह कैसे संभव हुआ? 

इसमें कुछ योगदान कोरोना के चलते घरों में रहने की हमारी मजबूरी कही जा सकती है परन्तु अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि  दर्शक  संवेदना से लबरेज ऐसे धारावाहिक अभी भी अधिक पंसद करते हैं, जिन्हें बगैर किसी घालमेल के बनाया गया हो। जिनमें व्यावसायिक हितों की अपेक्षा मानवीय मूल्य केन्द्र में हो और जिनमें भव्यता के नाम पर दिव्यता को बिसराया नहीं गया हो। आज से कोई 33 साल पहले जब यह धारावाहिक दूरदर्शन  से प्रसारित हुआ तब भी यह इतना ही लोकप्रिय था। याद पड़ता है, यह उन दिनों की बात है जब 10 वीं में पढ़ता था और उन्हीं दिनों शिमला जाना हुआ था। रविवार के दिन की बात है, पर्यटक घूमना-फिरना छोड़ माल रोड़ पर उस एक दुकान पर ही लम्बी कतार में  खड़े हो गये थे, जिसमे टीवी से यह धारावाहिक प्रसारित हो रहा था । कह सकते हैं, उन दिनों लोगांे के पास विकल्प नहीं थे इसलिए यह धारावाहिक इतना लोकप्रिय हुआ होगा परन्तु इन दिनों तो ऐसी कोई स्थिति नहीं है। बहुत से चैनल हैं, चकाचौंध भरे धारावाहिकों के भी कम विकल्प नहीं है फिर भी सर्वाधिक दर्शक इसे  मिले हैं तो इसका अर्थ स्पष्ट है कि अच्छेपन को हर कोई चाहता है। डरावने, आपराधिक मसलों के नाटकीय रूपान्तरण, नाग-नागिनों, सास-बहुओं आदि के बेसिरपैर की कथाओं के अंतहीन चलने वाले धारावाहिकों के प्रसारक चैनलों ने असल में इधर दर्शकों  की रूचियों को मोड़ा नहीं है बल्कि बाजार की ताकतों के चलते उन्हें नशीले  पदार्थों के सेवन की मानिंद अपना आदि बनाने का एक तरह से चक्रव्यूह रचा है। दर्शकों  को इस कदर असहाय भी किया है कि वे चाहकर भी उनके रचे जाल से इसलिए मुक्त नहीं हो पाते कि कथित ऐसे मनोरंजन धारावाहिकों में ऐसे पेच, दृष्य डाले जाते हैं  कि अगली कड़ी देखने की चरम उत्सुकता पैदा होती है। देखने वाला जानता है, जो कुछ वह आंखो से ग्रहण कर रहा है, उसमें सब कुछ बेसिरपैर का है परन्तु फिर भी इसलिए देखता है कि कहीं और अच्छा कुछ प्रसारित ही नहीं होता है।
व्यक्ति एकान्त तो चाहता है परन्तु अकेलापन उसे नहीं भाता। आपा-धापी नहीं हो, कहीं जाने की उतावली नहीं हो और इस बात की फिक्र नहीं हो कि सब भाग रहे हैं, मैं कहीं पीछे नहीं रह जाऊं तभी ठहरकर अपने भीतर झांकने का वक्त मिलता है। अनर्गल कुछ भी सहने से तब वह बचने का भी उपाय तलाशता  है। कोरोना में कुछ-कुछ ऐसा ही समय हरेक को मिला है। यह यदि नहीं मिलता तो संभव है, दूदर्शन  प्रसारित ‘रामायण’ भी विश्व रिकाॅर्ड नहीं बना पाता। पर अनचाहे ही सही, घरों में ठहर सोचने के इस वक्त से व्यक्ति में संस्कृति की जड़ों को परखने का अवकाश मिला है। और फिर यह बात भी सच है कि ‘रामायण’ ने भारतीय जन-मानस को सदा ही अपनी ओर आकृष्ट किया है। मुझे लगता है, रामानन्द सागर की बनायी ‘रामायण’ इसलिए भी अधिक चावी-ठावी बनी कि इसमें उन्होंने दर्शकों  को खींचने के लिए अपनी ओर से तामझाम में अनर्गल कुछ गढ़ा नहीं। वाल्मीकि, तुलसी और कंब की लिखी रामायण के तथ्यों से इतर, चाहे जो दिखाने का प्रयास नहीं किया।  बल्कि मूल के कारण ही दर्शकों के बहुत से भ्रमों का भी इस प्रसारण से निवारण हुआ। 
‘रामायण’ असल में भारतीय जीवन मूल्यों के गहरे तत्वों का अर्थाेद्घाटन है। रोचक, विस्मित करते इसके प्रसंग अद्भुत तो हैं पर कथा में जीवन जीने के हम-सबके भीतर संजोए अर्थ बसे हुए  हैं और इसी कारण इस कथा को जितनी बार देखें, सुनें और पढ़ें ऊब नहीं होती।  ‘रामायण’ भारतीय जन-मानस के आंतरिक मनोभाावों को ध्यान में रखते हुए सिरजी गयी है। मानव जीवन का अंतरसत्य  यहां है। कर्तव्य -अकर्तव्य , न्याय-अन्याय के मध्य विवेक के साथ कैसा आचरण होना चाहिए, यह कथा एक तरह से सिखाती है। दूरदर्शन   ने इसके प्रसारण से इस मिथक को भी तोड़ दिया कि सरकारी माध्यमों के प्रसारण उम्दा नहीं होते।
यह सच है, कोरोना काल ने बहुत से और मिथकों को भी तोड़ा है। इसमें सबसे बड़ा यह मिथक भी है जो सुनियोजित तरीके से गढ़ा गया है कि सरकारी क्षेत्र में काम नहीं होता। गौर करें, इस समय कोरोना से बचाव की पूरी बागडोर देशभर  में सरकारी क्षेत्र ने ही संभाल रखी है। बगैर किसी अतिरिक्त लाभ के विचार के चाहे वह पुलिस हो, प्रसाशन  हो, चिकित्सकीय सेवाएं हो या फिर सूचना एवं संचार की राजकीय सेवाएं। सदा पार्श्व  में रह कार्य करने वाली जनसम्पर्क सेवा ने इस दौरान तथ्यपरक सूचनाओं के प्रसार में अपना विरल योगदान दिया है, दे रही है। यह बात दिगर है कि इस सेवा के कार्य का श्रेय सदा ही अन्य सेवाओं के खाते में जाता है। पर सोचिए, कोई कहे-जंगल में मोर नाचा पर सवाल तो यही होगा ना कि, किसने देखा?
बहरहाल, ‘रामायण’ की लोकप्रियता के पार्श्व में  जाएंगे तो पाएंगे जन-मानस को यह इसलिए अधिक सुहाती है कि इसमें सामूहिक अवचेतन के अंतर्निहित  भारतीय संस्कारों की अभिव्यक्ति है। प्रकृति की मानवीय व्यंजना है। नैतिकता में यह कथा दरअसल आम आदमी में ईश्वरत्व  के वास का अनूठा उदाहरण है। भारतीय इतिहास पौराणिक कथाओं में ही प्रस्तुत हुआ है और यह कथाएं हर आम और खास के अंतर्मनों की ही एक तरह से व्यंजना है। ‘रामायण’ के राम इसीलिए पुरूषोतम यानी पुरूषों में सबसे उत्तम हैं कि वह जीवन पर्यन्त त्याग के साथ आदर्ष जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। हालाकि बहुत से स्थानों पर अतिरंजना भी होती दिखती है परन्तु व्यक्ति के भावों को परिस्कृत करते मनुष्यता का विकास यह कथा करती है। राम की कथा इसलिए हमारी अपनी, हरेक को भाती हुई है कि वहां राम चमत्कार नहीं करते। मुनष्य की भांति रहते दुःख सहन करते हैं, जटिल से जटिल परिस्थितियों का सामना करते हुए संघर्ष करते हुए दुरूह स्थितियों को निंरतर अपने पुरूषार्थ से संभव करते चले जाते हैं। मर्यादा में रहते वह हर कार्य करते हैं, इसीलिए मर्यादा पुरूष कहाते हैं।..और आप देखिए, यह राम का ही चरित्र था जिसने गाॅंधीजी को इतना अधिक प्रभावित किया कि उन्होंने तमाम अपना जीवन उनके आदर्शों को ध्यान में रखते हुए ही जिया और अंत समय में भी ‘हे राम!’ को ही उच्चारित किया।
मुझे लगता है, हम-सब में कुछ-कुछ राम बसता है। इसीलिए तो जब कहीं कुछ बुरा होता है, कोई कुछ गलत करता है तो औचक मुंह से निकलता है, ‘राम निसरग्यो!’ माने इसके भीतर का राम चला गया है। बात ‘रामायण’ धारावाहिक की चल रही है और इसी संदर्भ में यह कहने में हमें कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि जन-मानस को वह सुहाता है जो आदर्श की स्थापना करता है पर इसके लिए ठहरकर सोचने, देखने की घड़ी होनी चाहिए। कोरोना ने शायद यह घड़ी दर्शकों को प्रदान की है इसीलिए सास-बहु, नाग-नागिन, क्राईम अलर्ट, हाॅरर और फुहड़ हास्य धारावाहिकों और ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ जैसे कथित मनोरंजक कहे जाने वाले प्रसारणों को छोड़ दर्शकों ने रूढ़, बोदी कही जाने वाली कथा को भी निरंतर देखा और इसे सर्वाधिक पंसद किया। मुझे लगता है, यह वक्त मनोरंजन शब्द के वास्तविक अर्थों को समझने का भी है। मनोरंजन  माने वह जिससे मन रंजित हो। षडयंत्रों, डरावने, अश्लीलता  परोसने वाली कथाओं से मन रंजित नहीं होता बल्कि त्रासदियों, अपराधबोध और अंततः अवसाद से ही घिरता है। स्वस्थ मनोरंजन अंतर्मन संवेदनाओं को अर्थ प्रदान करने वाला, भीतर से संपन्न करने वाला होता है। ‘रामायण’ धारावाहिक की लोकप्रियता को क्या इसी अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए!
--'राष्ट्रदूत', 9 मई, 2020 

Tuesday, February 20, 2018

संविधान की आठवी अनुसूची में सम्मिलित हो मातृभाषा राजस्थानी

यूनेस्को ने 21 फरवरी का दिन अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की हुई है। उद्देष्य है, विष्व मे भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा मिले। पर विडम्बना है, संविधान की 8 वीं अनुसूची मंे सम्मिलत भाषाओं में हमारी अपनी मातृभाषा राजस्थानी नहीं है। बावजूद इसके कि इसका समृद्ध प्राचीन साहित्य है, विष्व की  किसी भी भाषा से कही अधिक समृद्ध शब्द कोष है, देष के बड़े भु-भाग पर रहने वालों की यह भाषा है। दुनियाभर में राजस्थानी के अपने लिखे से पहुंचने वाले ‘ंधरती धोरा री’ के महाकवि कन्हैयालाल सेठिया, साहित्य के नोबल पुरस्कार के लिए नामांकित हुए प्रख्यात कथाकार विजयदान देथा ‘बिज्जी’ आदि अपनी मातृभाषा की संवैधानिक मान्यता की उम्मीद में ही इस लोक से विदा हो गए पर मान्यता है कि अभी तक नहीं मिली।
बहरहाल, जनहित के विषयों के पैरोकार, अभिभाषक मित्र सूर्यप्रताप सिह राजावत ने हाल ही प्रधानमंत्री कार्यालय में सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी चाही है कि राजस्थान विधानसभा में 2003 में राजस्थानी को मान्यता दिए जाने के प्रस्ताव को पारित कर भिजवाए जाने और इसके बाद 24 जुलाई 2014 को केन्द्रीय संस्कृति मंत्री चन्द्रकुमारी कटोच द्वारा राजस्थानी को आठवी सूची मे सम्मिलित करने के लिए प्रधानमंत्री को लिखे पत्र पर क्या कार्यवाही की गयी है। आरटीआई का जवाब तो खैर, देर-सवेद आयेगा ही परन्तु महत्वपूर्ण यह है कि करोड़ों राजस्थानियों की मातृभाषा को आखिर क्योंकर मान्यता के अपने सांस्कृतिक अधिकार की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है।
मुझे लगता है, संस्कृति की विविधता की हमारी थाती तभी बची रह सकती है जब हम अपनी आंचलिक भाषाओं को बचा लें। केन्या के उपन्यासकार, भाषाविद् न्गुगीवा थ्योगो की किताब ‘डिकोलाइजिंग द माइंड’ में भाषा की राजनीति पर विषद् विमर्ष है। पुस्तक हमें बताती है कि कैसे भाषा के जरिए गुलाम बनाया जाता हैे। भाषा व्यापक जन-समुदाय की सामुहिक स्मृति होती है। यदि वह आपकी अपनी नहीं है तो आप एक समय के बाद अपने अतीत के गौरव को सदा के लिए खों देंगे। मुझे लगता है, राजस्थानी को यदि समय रहते संवैधानि मान्यता नही मिलती है तो  राजस्थान की संस्कृति की स्मृति से भी हम वंचित हो सकते हैं। तब हो सकता है, स्मृति वंचित समाज में जीने को हम मजबूर हो जायें। उपनिषदों में कहा गया है कि अपनी भाषा के बगैर न सत्य को, न असत्य को, न पाप को, न पुण्य को , न अच्छे और न बुरे को, न सद्गुण, न अवगुण को-किसी को नहीं पहचाना जा सकता है। अपनी भाषा में ही हम अपने आत्म को पहचान सकते है। जान सकते हैं। इसलिए जरूरी है हम अपनी बोलियों, मातृभाषाओं और उसकी विविधता को सहेंजे। 
मैं हिंदी के साथ-साथ राजस्थानी में भी लिखता हूं। याद पड़ता है एक दफा कमलेष्वर जब बीकानेर आए तो उनसे लम्बा संवाद बोलियांे पर हुआ। बाद में उनके साथ को सहेजते मैने संस्मरणनुमा कुछ उन पर लिखा।  सहज ही वह अपनी मातृभाषा राजस्थानी में लिखा गया। राजस्थानी भाषा अकादमी की पत्रिका में जब वह प्रकाषित हुआ तो मैने हिंदी में उसका कुछ अनुवाद और मुल छपा उन्हें डाक से भेज दिया। थोड़े दिनों बाद कमलेष्वर का पत्र हस्तगत हुआ, उन्होंने लिखा था, ‘तुम्हारे द्वारा ‘‘जागती जोत’’ में छपा-लिखा हुआ बहुत आत्मीय आलेख-संस्मरण मिला।  पढ़ता हूं तो राजस्थानी समझ में आती है। आखिर हिंदी को रक्त- संस्कार तो राजस्थानी , शौर सैनी और ब्रज ने ही दिया है। हिंदी तो भाषा नहीं, भाषा मण्डल है! मैं स्वयं ब्रजभाषी हूं - मैनें वृहद शुभ और भविष्य के लिए अपनी मातृभाषा को खड़ी बोली हिंदी के लिए समर्पित किया है...सांस्कृतिक समन्वय के लिए, देष और राष्ट्र के उत्थान के लिए यह बलिदान जरूरी होते हैं...पर अपनी मातृ-भाषाओं -बोलियों के विसर्जन से हिंदी प्रगाढ़ और शक्तिषाली नहीं होगी, हमें अपनी मातृभाषाओं को जीवित रखना पड़ेगा, जहां से हिंदी की शब्द संपदा सम्पन्न होगी। यह बिटिया- बेटे को ब्याहने वाला रिष्ता है- जो नाती- पोतों में हमें अपनी निरंतरता देता है।’ उनके इस कहन के आलोक में ही यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि हिंदी की संपन्नता बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं से है। जो लोग राजस्थानी की मान्यता के विरोधी हैं, उन्हें इस बात को समझ लेना चाहिए कि राजस्थानी की मान्यता से किसी और भाषा का अहित नहीं होने वाला है और जो लोग बोलियों के नाम पर राजस्थानी की मान्यता पर प्रष्न उठाते हैं, उन्हें भी भी भाषाविद्ों की इस बात को नहीं भुलना चाहिए कि किसी भी भाषा की जितनी अधिक बोलियां होती है, वह भाषा उतनी ही अधिक समृद्ध मानी जाती है। राजस्थानी के साथ यही है। 
विष्वकवि रवीन्द्र नाथ टैगौर ने राजस्थानी के दूहे सुनकर कभी कहा था, ‘‘रवीन्द्र गीतांजली लिख सकता है, डिंगल जैसे दूहे नहीं।’ भाषाषास्त्री सुनीति कुमार चटर्जी, आषुतोष मुखर्जी राजस्थानी भाषा के समृद्ध कोष और इसकी शानदार परम्परा के कायल होते समय-समय पर राजस्थानी की मान्यता की हिमायत करते रहे हैं। यही नहीं भाषाओ के विकास क्रम के अंतर्गत राजस्थानी का प्रार्दुभाव अपभ्रंष में, अपभ्रंष की उत्पत्ति प्राकृत तथा प्राकृत का प्रारंभ संस्कृत और वैदिक संस्कृत की कोख में परिलक्षित होता है। इन सबके बावजूद राजस्थानी को मान्यता नहीं मिलना क्या समय की भारी विडंबना नहीं है?
राजस्थान विधानसभा में वर्ष 1956 से ही राजस्थानी को राज-काज और षिक्षा की भाषा के रूप में मान्यता के प्रयास हो रहे हैं परन्तु इन प्रयासों को अमलीजामा पहनाने की दिषा में कोई समर्थ स्वर नहीं होने के कारण यह भाषा राजनीति की निरंतर षिकार होती रही है। राज्य विधानसभा में पहली बार 16 मई 1956 को विधायक सम्भुसिंह सहाड़ा ने राजस्थानी भाषा प्रोत्साहन के लिए जो अषासकीय संकल्प रखा उसमें राजस्थान की पाठषालाओं में राजस्थानी भाषा और तत्संबंधी बोलियों की षिक्षा देने पर जोर देने हेतु तकड़ा तर्क दिया गया था। संकल्प में कहा गया था कि बच्चे घरों मंे अपने माता-पिता के साथ जिस भाषा में बात करते हैं, उसी मंे षिक्षा दी जानी चाहिए, इसी से वे पाठ्यपुस्तकों में वर्णित बातों को प्रभावी रूप में ग्रहण कर पांएगे। इसके बाद 2003 में राज्य विधानसभा ने राजस्थान की मान्यता का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार को भिजवा दिया। तब से आज इतने वर्ष हो गए हैं, राजस्थानी मान्यता की बाट ही जो रही है। यह कितनी विडम्बना की बात है कि लगभग 1 हजार ई. से 1 हजार 500 ई. के समय के परिपे्रक्ष्य को ध्यान में रखकर जिस भाषा के बारे में गुजराती भाषा एवं साहित्य के मर्मज्ञ स्व. झवेरचन्द मेघाणी ने यह लिखा कि व्यापक बोलचाल की भाषा राजस्थानी है और इसी की पुत्रियां फिर ब्रजभाषा, गुजराती और आधुनिक राजस्थानी का नाम धारण कर स्वतंत्र भाषाएं बनी। उस भाषा की संवैधानिक स्वीकृति के बारे में निरंतर प्रष्न उठाए जा रहे हैं।
एक प्रष्न यह हो सकता है कि संविधान की मान्यता के बगैर क्या कोई भाषा अपना अस्तित्व बनाकर नहीं रह सकती। यह सच है कि भाषा सरकारें नहीं बनाती, वे लोग बनाते हैं जो इसका प्रयोग करते हैं परन्तु इसका व्यवहार में प्रयोग तो तब होगा न जब यह षिक्षा का माध्यम बनेगी, जब राजकाज, विधानसभाओं, अदालतों में इस भाषा का प्रयोग उचित समझाा जाएगा। और यह सब तब होगा जब सरकार इसे मान्यता प्रदान करेगी। इन पंक्तियों के लेखक जैसे बहुत से हैं जिनका आरंभिक परिवेष राजस्थानी का रहा है, आज भी घर में हम राजस्थानी में बात करते हैं परन्तु बच्चों से हिन्दी में बात करने के लिए मजबूर हैं। कारण यह है कि वे ठीक से विद्यालय में हिन्दी या अंग्रेजी यदि नहीं बोल पाएंगे तो जिस भाषा में वे षिक्षा ले रहे हैं, उन्हें बोलने वाले दूसरे बच्चों के साथ उन्हें हीन भावना जो महसूस होगी। राजस्थान में ही गांवो, छोटे शहरों से राजधानियां और बड़े शहरों में आए अधिकाषं राजस्थानी बोलने वालों के साथ यही हो रहा है। उन्हें अपनी भाषा से लगाव है, प्यार है परन्तु इस बात की लगातार गम भी है कि उनके बाद इस भाषा को उनके बच्चे नहीं बोलंेगे, व्यवहार में नहीं लंेगे। क्या ऐसा तब संभव होता जब उन बच्चों को भी राजस्थानी में ही पढ़ने का मौका मिलता?
भाषा निरंतर प्रयोग से समृद्ध होती है परन्तु राजस्थानी का यह दुर्भाग्य है कि प्रतिवर्ष गांवों, सुदूर ढ़ाणियों से अपनी मेहनत से पढ़-लिखकर शहर में आकर नौकरी करने वाले राजस्थानी भाषी मजबूरन अपनी दूसरी पीढ़ी के साथ राजस्थानी में संवाद नहीं कर पाते हैं, ऐसे दौर में कब तक राजस्थानी गांवो के अलावा शहरों में बची रहेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। राजस्थानी की मान्यता को क्यों इस नजरिए से नहीं देखा जा रहा? क्यों राजस्थानी भाषा के बाद जो भाषाएं विकसित हुई उन्हें मान्यता मिल गयी परन्तु राजस्थानी आज भी मान्यता की बाट जो रही है? क्यों बोलियों के नाम पर राजस्थानी के साथ यह अन्याय हो रहा है? हकीकत यह है कि राजस्थानी की मान्यता इसके अधिकाधिक लोक प्रयोग के लिए जरूरी है, इसलिए भी कि इसी से मुद्रण और प्रकाषन, पठन-पाठन और बोलने की आदत का इसका अधिक विकास होगा और यही इस भाषा की आज की जरूरत है। इसी से राजस्थानी के समृद्ध प्राचीन साहित्य को भी अंवेरा जा सकेगा।
बहरहाल, संविधान की मूल अवधारणा लोकतांत्रिक प्रस्थापना में है। संविधान में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि अगर एक हिस्से की भाषा कोई है तो उसको बचाया जाए। राजस्थानी 9 करोड़ लोगों की भाषा है, इसे बचाना, इसकी मान्यता, संरक्षण इसलिए जरूरी है। वर्ष 1959 में भाषाविद् जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने ‘भारत का भाषा सर्वेक्षण’ पुस्तक में राजस्थान की भाषा राजस्थानी बताते स्पष्ट कहा है-‘‘मारवाड़ी के रूप में, राजस्थानी का व्यवहार समस्त भारतवर्ष में पाया जाता है। ‘पंजाबी के ठीक दक्षिण में लगभग 1 करोड़ साढ़े बयासी लाख राजस्थानी भाषा-भाषियों का क्षेत्र है जो इंगलैण्ड तथा वेल्स की आधाी जनसंख्या के बराबर है। जिस प्रकार पंजाबी उत्तर-पष्चिम में मध्य देष की प्रसारित भाषा का प्रतिनिधित्व करती है, उसी प्रकार राजस्थानी उसके दक्षिण-पष्चिम में प्रसारित भाषा का प्रतिनिधित्व करती है।’’
ग्रियर्सन ने भाषा सर्वेक्षण का यह कार्य तब किया था जब भारतीय संविधान बना भी नहीं था, बाद में अंग्रेजी से यह पुस्तक हिन्दी में अनुवादित होकर प्रकाषित हुई। वर्ष  1967 से लेकर अब तक बहुत सारी भाषाएं संविधान की 8 वीं अनुसूची में जोड़ी गयी है। यह सच में विडम्बना की बात है कि जिस भाषा की लिपि से आधुनिक देवनागरी और दूसरी अन्य भाषाओं की लिपियां बनी है और जिसका अपना व्याकरण और विष्व के विषालतम शब्दकोषों में से एक जिसका शब्दकोष है, ऐसी भाषा को संविधान की 8 वीं अनुसूची में जुड़ने का अभी भी इन्तजार है।
राजस्थानी की मान्यता में किसी का कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है। इसका अर्थ इतना ही है कि इससे वर्षो पुरानी इस भाषा का संरक्षण हो सकेगा। ऐसे दौर में जब मातृभाषाओं पर विष्वभर में संकट चल रहा है, इस दिषा में गंभीर चिंतन कर त्वरित कार्यवाही की जानी समय की आवष्यकता भी है। इसलिए भी कि भाषा, साहित्य और संस्कृति से व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है। राजस्थानी की मान्यता भाषा के प्रयोग को व्यापक स्तर पर प्रयोग की स्वीकृति देती है। इसी दीठ से क्या हमारी मातृभाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलनी चाहिए!

Friday, October 6, 2017

संस्कृति से अपनापा कराती केलीग्राफी कलाकृतियां

विनय शर्मा का स्टू​डियो पुरा वस्तुओं का
अनूठा कला संग्रहालय सरीखा है।
यह तस्वीर उनके उस स्टूडियो की।
कैलीग्राफी यानी अक्षरांकन लिखने की दृष्यात्मक दीठ। आमतौर पर यही माना जाता है कि कैलीग्राफी के अंतर्गत अक्षरों को ही उकेरा जाता है परन्तु कलाकृतियों के सृजन का आधार भी यह है। 
यह सही है, मूलतः कैलीग्राफी में सुंदर अक्षरों को ही उकेरा जाता है परन्तु इससे महत्ती कलाकृतियों भी इधर सृजित हो रही है। संकतो का अर्थपूर्ण, सुव्यवस्थित आकार ही तो है कैलीग्राफी।...और यह जब है तो स्वाभाविक ही है कि इसके जरिए अर्थगर्भित कलाकृतियां भी आरंभ से ही सृृजित की जाती रही है।
अर्थ के आग्रह से मुक्त ऐसी ही कलाकृतियां के लिए कोरिया में बाकायदा प्रतिवर्ष आर्ट बिनाले भी होता है। पिछले दो दषको ंसे कोरिया में ‘द वर्ल्ड कैलीग्राफी बिनाले’ का आयोजन हो रहा है। इस बार यह बिनाले 21 अक्टूबर से 19 नवम्बर के दौरान होगा। यह महत्वपूर्ण है कि इस बिनाले में इस बार राजस्थान मूल के सुप्रसिद्ध कलाकार विनय शर्मा की कैलीग्राफी कलाकृतियां भारत का प्रतिनिधित्व करेगी। 
विनय शर्मा अपनी कलाकृतियों में अतीत का एक तरह से पुनराविष्कार करते हैं। पुरानी बहियां, ताड़पत्र, जन्मपत्रियां और तमाम जो हमारी संस्कृति सं संबद्ध पुराना रहा है, उसे वह अपनी कलाकृतियो ंमें बड़े जतन से सहेजते हैं। इधर उन्होंने कैलीग्राफी कलाकृतियों का भी जो संसार रचा है, उसमें अतीत से अपनापा कराते भारतीय षोडस संस्कारों  के साथ ही संस्कृति से जुड़े बारीक तत्वों को अंवेरा है। प्राचीन अभिलेखों, सुसज्जति पांडुलिपियों, संग्रहालय में संग्रहित पुरावस्तुओं के साथ ही उन्होंने जीवन से जुड़े सांस्कृतिक सरोकारों को अपनी कैलीग्राफी कलाकृतियों में एक तरह से जिया है। उनकी ऐसी कलाकृतियां में भारतीय नृत्य, संगीत, नाट्य और वास्तुकला से संबद्ध संकेताक्षरों में कलाओं के ंअंतःसंबंधों को भी गहरे से जिया गया है।
विनय ने प्राचीन लिपियों की अपनी कैलिग्राफी कलाकृतियों में अतीत का आधुनिकता में एक तरह से पुनराविष्कार किया हैं। उनकी कलाकृतियों में अक्षरांकन के अनूठे दृष्यालेख उभरते हैं। उन्होंने प्रकृति और जीवन से जुड़ी कैलिग्राफी पेंटिंग श्रृंखला बनाई है। इसमें पेड़-पौधों और जीवन से जुड़े सरोकारों की मनोरम व्यंजना हुई है। इसी प्रकार उन्होंने लघु कैनवस पर कुछ समय पहले  कैलिग्राफी पेंटिंग में ही गणेष के बहुविध रूपों को भी प्रदर्षित किया था। षिव के आदि, अनादि स्वरूप, भगवान श्री कृष्ण के पौराणिक आख्यानों को भी उन्होंने कैलीग्राफी की अपनी कला में गहरे से जिया है। 
कोरिया में आयोजित होने जा रहे ‘द वर्ल्ड कैलिग्राफी बिनाले’ में विनय शर्मा भारतीय संस्कृति से जुड़े इसी तरह के आख्यानों आधारित अपनी कैलिग्राफी पेंटिंग का प्रदर्षन करेंगे। विनय शर्मा बताते हैं, ‘कैलीग्राफी अथवा अक्षरांकन लिखने की ही नहीं कलाकृतियों रचने की भी दृश्यात्मक शैली है। प्राचीन काल में कैलीग्राफी के जरिए ही इतिहास का चित्रात्मक प्रदर्षन किया जाता था। अतीत से जुड़े संदर्भों की कैलिग्राफी दृष्य कहन है। ‘द वर्ल्ड कैलिग्राफी बिनाले’ विष्वभर के कैलिग्राफी कलाकारों का साझा मंच है।’
कतर में दोहा एशियाई खेलों के दौरान आयोजित एशियन आर्ट प्रदर्शनी में भी विनय ने इससे पहले भारतीय कला का प्रतिनिधित्व किया था। इंग्लेण्ड, पोलेण्ड, साउथवेल्स सहित देश विदेश में उनकी अनेकों एकल चित्र प्रदर्शिनियां आयोजित होती रही है। यह महत्वूर्ण है कि कोरिया में आयोजित होने जा रहे वर्ल्ड कैलीग्राफी बिनाले में भारतीय संस्कृति से जुड़ी कला विनय के जरिए विष्वभर में पहुंचेंगी।

Sunday, January 1, 2017

बचेगा वही जो रचेगा

भोर का उजास मन को गढ़ता है, कुछ रचने के लिए। पक्षियों की चहचहाट से मन उल्लसित होता बहुतेरी बार आकाष बन जाता है।...और धीरे-धीरे फैलता उजास प्रेरित करता है-नया कुछ करने के लिए। इसीलिए कहूं प्रकृति को सुनें और मन ही  मन गुनें। लगेगा आपके भीतर कोई गा रहा है। यह जो गान है, वही तो अनाहत नाद है। अंर्तध्वनि का प्रतीक! यह बजाया नहीं जाता फिर भी परमानंद के रूप में बज पड़ता है। अनाहद नाद का मूल स्त्रोत हमारी अनुभूति ही तो है। प्रकृति को महसूस करने की हमारी दृष्टि। भावात्मक होने से अव्यक्त यानी अविगत है यह। इसीलिए यह अव्यक्त है। कहा भी तो गया है, ‘अविगत गति कछु कहति न आवै।...’
संगीत के इतिहास लेखक सांबमूर्ति कहते हैं, ‘अनाहत नाद से ही निनादित है यह विष्व।’ सच ही तो कहते हैं सांब! बारिश जब होती है तो मोर बोलते हैं। कोयल गाती है। चिड़ियाएं चहचहाती हैं। प्रकृति तब बहुतेरी बार मौन में भी संगीत का आस्वाद कराती है। साहित्य, संगीत, नृत्य की कलाएं प्रकृति के इन गुणों से ही तो पल्लवित-पुष्पित होती है।
कोई कह रहा था, एकांत नहीं सुहाता। अकेलापन काटने को दौड़ता है। इसका अर्थ उसने एकांत को जाना ही नहीं। एकांत माने एक-आप। अपने से संवाद। पर विचारेें, कभी अपने से संवाद का एकांत होता है! नही ंना? इस तकनीक आक्रांत समय में तो हम अपने से दूर और दूर हुए जा रहे हैं।...और इसी से सर्जना से भी हो रहे हैं विलग। साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकलाओं का जन्म आपके भीतर के एकांत से होता है। एकांत प्रकृति से प्रेरणा ग्रहण करता है। इसीलिए कभी यह भी जरूरी है कि आप अपने आप से भी मिलें। 
हमारे यहां कलाएं शरण्य ही नहीं हैं, आश्रय भी हैं। अपने आपको अभिव्यक्त करने का माध्यम। इनमें तैरा जा सकता है। सच्ची कला आपको वहां ले जाती है जहां आप पहले कभी न गए हों।...भले कईं बार वह जानी-पहचानी जगह पर भी ले जाती है परन्तु तब उस स्थान को अप्रत्याशित ढंग से देखने के लिए वह आपको विचलित भी करती है। 
लो वह जो पुराना था, बीत रहा है। नया साल प्रारंभ हो गया है। अनवरत चलती है समय की घड़ी। काल चक्र के पहियों पर किसका जोर! समय घड़ी के सूईयों पर नजर डालते हैं तो पाते हैं बीते ने बहुत कुछ दिया है तो हमसे बहुत कुछ लिया भी है। इस नये वर्ष में संकल्प लें कि भीतर के मौन को स्वर देंगे। विचारेंगे, जो आज है वह कल नहीं होगा। तब क्या यह जो आज है वह क्या हमारी परम्परा नहीं बन जाएगा! मन इस परम्परा में ही है। चित्रकारों की चित्रकृतियों की परम्परा में, नृत्य की, नाट्य की, संगीत की हमारी परम्परा में। हम जितना उन परम्पराओं में जाते हैं, उतना ही पुनर्नवा होते हैं। अंदर का हमारा जो रीता है, वह भरता है। यह परम्परा ही है जो अतीत को वर्तमान और वर्तमान को भविष्य से जोड़ती है। सामाजिक जीवन को इसी से तो निरंतरता मिलती है। 
रोज नया सूर्य उगता है। एमिली डिकिन्सन की बेहद खूबसूरत सी एक कविता है, ‘दिस इज माई लेटर टू दी वल्र्ड..’। वह कहती हैं मैं कविता नहीं कर रही। यह तो बहुत जरूरी, निहायत जरूरी चिट्ठी है मेरी-दुनिया के नाम...जिसे लिखे बिना मैं रह नहीं सकती-भले दुनिया उसे समझे न समझे, भले दुनिया को उसे पढ़ने की फुरसत हो, न हो।’ एमिली कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कह रही है। कह क्या रही है, हममें जैसे प्रवेश कर रही है। यही तो संप्रेषण की उसकी कला है। सच्ची कला कल्पना और अनुभूति का ही तो संयोजन है। एक तरह से कल्पना प्रवण भावुकता के दौर में आए एक संवेदनशील मस्तिष्क की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति। 
इस मूल्यमूढ़ समय में नए माध्यमों में हमारी अपनी पहचान और भीतर की खोज का उन्मेष जगाती हैं कलाएं। इसलिए कि वे समयातीत हैं। यह कलाएं ही हैं जिनके सरोकार उत्तरोतर विराट् और व्यापक होने की सामथ्र्य रखते हैं। परम्परा के पोषण और परस्परता में वे निरंतर फलती है, सांमजस्य भाव पैदा करते। विग्रह के लिए वहां कोई अवकाष नहीं है। आत्म को व्यक्त करने का माध्यम हैं कलाएं। 
आईए, बीते वक्त की तमाम कड़वाहटों को भुलाते, अच्छाईयों को याद करते साहित्य, संगीत, नृत्य और चित्र कृतियों की कलाओं मे रमें। उन्हें अपने भीतर की सर्जना से रचें। हर दिन नया आसमान छूएं। अपना नया आकाश बनाएं।...बचेगा वही जो रचेगा। यह आकाश ही तो है जिसमें कुछ नहीं रहता और सब भरा रहता है।

Thursday, December 20, 2012

परम्परा का कलानुराग


लोक कलाएं निर्बन्ध हैं। माने वहां किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं है। चित्र है तो वहां कथा भी है। नृत्य है तो गान भी है। कहें, हर कला से थोड़ा कुछ लेते ही लोककलाएं बढ़त करती है। कथोपकथनों को गेय में व्यक्त करती। जीवन की उत्सवधर्मिता का नाद लिए। मनोरंजन के साधन जब नहीं थे, तब लोकलाओं का यह उजास ही तो मानव मन के रीतेपन को हरता था। 
बहरहाल, पिछले दिनों शहर के एक पांच सितारा होटल में लोक परम्पराओं के उजास को अनुभूत कर अजीब सा सुकून मिला। होटल में आधुनिक चकाचौंध और तड़क-भड़क के बावजूद छत का एक कोना जयपुर की परम्परा का संवाहक बना हुआ था। आंग्ल भाषा में इस आयोजन को नाम दिया गया था, ‘जयपुर टेल्स’। माने जयपुर बता रहा है। आमंत्रित आस्वादक भी हिन्दी बोलने, समझने के बावजूद अंग्रेजी दां थे। सो बताने वालों के बारे में घोषणा अंग्रेजी में ही हुई। सुखद यह था कि विरासत को बांचने वाले या कहें सुनाने वाले हिन्दी में बोले। लोकानुरंजन के तब के दौर को याद करते हुए जयपुर की कलाओं और वस्त्र परम्परा पर डॉ. चन्द्रमणीसिंह ने कुछ अनछुए पहलू बताए तो वास्तुकला से संबंधित जानकारियां गोपालसिंह नंदीवाल ने साझा की। स्वाभाविक ही था, इस दौरान राजा-महाराजाओं के कलानुराग का गान भी हुआ। जयपुर की मूर्तिकला से जुड़े पहलू तो खैर परम्परा की बात में आए ही परन्तु खाने के बाद पान का शौक फरमाने और लोकनाट्य की तमाशा परम्परा की बात चली तो लगा कुछ और भी था जो बंया किया जाना चाहिए था। एक साथ विरासत से जुड़ी बहुत सी परम्पराओं के पोषण को एक साथ रखे जाने की बड़ी सीमा आखिर यह तो होती ही है कि वक्त कम पड़ जाता है। जब तक कहने वाले की भूमिका बनती है, तब तक उसका समय समाप्त हो जाता है। सो रोचक कहन को सुनते यह बात अखरी। 
खैर...। पान खाने की जयपुर की परम्परा पर विरासत से जुड़ी दुकान के जुगलकिशोर ने पान के शौक से जुड़े लागों के बहुत से रोचक किस्से सुनाए। उनके इस सुनाने में लोकानुरंजन तो था ही, वह किस्सागोई भी थी जो अब धीरे-धीरे लोप हो रही है। वह सुना रहे थे, पान लेने आने वाले के साथ यदि कोई बच्चा आता तो उनके वालिद माधो उसे भी अपनी ओर से पान खिलाते। और ऐसे कब वह बच्चों में ‘माधोबाबा’ बन गए पता ही नहीं चला। उनकी दुकान भी फिर इसी नाम से जानी जाने लगी। यह सब सुनते पान का पारम्परिक स्वाद भी सुनने वालों को माधोबाबा की दुकान से चखवाया गया। इस दौरान संयोजक विनोद जोशी ने भी जयपुर की परम्परा को शिद्दत से बंया किया।
आयोजन में किस्से, कहानियां और भी थी। परन्तु भट्ट परिवार की परम्परा को निभाते आ रहे दिलीप भट्ट जब तमाशा के बारे में बताने लगे तो लगा वक्त थम गया है। लोकनाट्य की तमाशा शैली को भट्ट परिवार ने सींचा है। गोपीजी और  उनके पुरखों की परम्परा को दिलीप भट्ट के मुंह से सुना और तमाशा की उनकी प्रस्तुति से उसे गुना भी। पारम्परिक वेशभूषा में हारमोनियम, सारंगी और तबले की थाप पर भट्ट ने तमाशा किया। उनका पद संचालन और बुलंद आवाज मन में गहरे से जैसे बस गई है। 
तमाशा मूलतः लौकिक नाट्य है। वहां लोककथाएं हैं, पौराणिक आख्यान है, प्रेमाख्यान है और वर्तमान हालात का सांगीतिक चितराम भी है। दिलीप भट्ट इस आधुनिक दौर में भी तमाशा का निर्वहन और उसमें रेखांकित की जाने वाली भाववस्तु को अपने तई जीते हैं। उन्हें सुनते, भावाभिव्यक्ति करते देखते और अपनी कला में खोते हुए पाते व्यक्ति और समूह के अंतःसंबंधों की पहचान होती है। सोचता हूं, लोकानुरंजन के अंतर्गत एक प्रकार से लोक का यह वह अनुष्ठान ही है जिसमें परम्पराओं का पोषण हेाता है। हमारी विरासत में बहुत कुछ अभी भी ऐसा है, जो हममें से बहुतों के लिए नया है। जिसे सुना जा सकता है। गुना जा सकता है। बशर्ते, वक्त हो!

Friday, November 30, 2012

इक्कीसवीं सदी में कला


कलाओं को हमारे यहां रूप की सृष्टि कहा गया है। वहां दृश्य का ही नहीं जो कुछ अदृश्य है, उसका भी अनुकरण करते रूप को उभारा जाता है। पार्कर ने इसीलिए कभी कला को इच्छा के काल्पनिक व्यक्तिकरण की संज्ञा दी थी। और अब तो कला कैनवस तक ही सीमित नहीं रह गयी है, उसके अभिव्यक्ति सरोकार भी बदल गए हैं।  किसी स्थान विशेष की संवाहक होने की बजाय वह बाजार जनित मूल्यों में संवेदना से परे बहुत से स्तरों पर जीवन से दूर भी हुए जा रही है। कैनवस हासिए पर है। रंग और रेखाओं की सर्जना में ब्रश-प्लेट गायब है। डिजिटल तकनीक के साथ संस्थापन में जो चाहे किया जाने लगा है। संभवतः इसी से कला-अकला का द्वन्द भी इधर तेजी से उभरा है।
राजस्थान हिन्दी गं्रथ अकादमी के पुस्तक पर्व में  ‘इक्कीसवीं सदी में कला का अंत’ सत्र शायद यही सोचकर रखा गया था। कला में उभरी नवीनतम प्रवृतियों के एक प्रकार से निश्कर्षनुमा इस षीर्शक विमर्श में प्रयाग शुक्ल, विनोद भारद्वाज के साथ इस नाचीज से संवाद किया गया था। ‘कला के अंत’ पर भला कोई सहमत होगा? सो इस बाबत जब ममता चतुर्वेदी ने सवाल किया तो आनंद कुमार स्वामी के कहे पर ही गया, ‘नवीनता नवीन बनाने में नहीं नवीन होने में है।’ नवीन जो बनाया जा रहा है, उसमें कलाकार और हम स्वयं कितना नवीन होते हैं। असल मुद्दा यह है। यूं भी कला माने जिसका कलन होता हो। काल में जिसकी गणना की जा सके। काल से जुड़े का भी अंत हो सकता है! मुझे लगता है, यह कला ही तो है जो अपनी व्यापक सांस्कृतिक प्रतिक्रिया के तहत समाज में तमाम अपनी स्मृतियां, विस्मृतियां, विशेषताओं और बेशक खामियों के साथ हर दौर में मौजूद रहती है। इसलिए उसमें नवीनता जब-जब होती है, पुराने को न छोड़ पाने के मोह के कारण ऐसे सवाल भी उठते रहते हैं।
विनोद भारद्वाज ने इसीलिए ‘कला के अंत’ की बजाय कैनवस के अंत के प्रश्न को मौजूं बताते कहा कि सत्र का शीर्षक कुछ ऐसा ही होना चाहिए था। इसके बहाने उन्होंने बदलते समय में कलाकार के जीवन मूल्यों में आए बदलाव की ओर ईषारा किया। उनका कहना था, पहले कलाकार के पास कैनवस था तो समय था अब जब माध्यम बदल गया है तो बाजार भी प्रमुख हो गया है। कैनवस छूटने के साथ ही कलाकार के पास अब समय ही नहीं है। वह बाजार की दौड़ में इस कदर भाग रहा है कि अपने और अपनोें से ही दूर हुए जा रहा है। हुसैन की हर अदा मीडिया में साया होती तो गायतोण्डे और अम्बादास जैसे महत्वपूर्ण कलाकारों के अंत से भी मीडिया अनजान बना रहा। प्रयाग शुक्ल ने कला में आए बदलावों के साथ छीजती संवेदनाओं पर गहराई से रोशनी डाली।
बहरहाल, ‘इक्कीसवीं सदी में कला का अंत’ पर विमर्श के बहाने कला में उभरती नवीनतम प्रवृतियां और बाजार मूल्यों की गहरे से पड़ताल हुई। संवाद में इन पंक्तियों के लेखक ने टाईम मैगजीन में 1923 में प्रकाशित मशहूर कला आलोचक क्रिस्टल के उस लेख की भी याद दिलाई जिसमें कलाकारों के पागल हुए जाने की बात कही गयी थी। अप्रत्यक्षतः कला के अंत का ही प्रश्न उसमें उठाया गया था। माने हर दौर में जब भी कुछ नया होता है, लीक से हटकर कुछ किया जाता है तो उसमें इसी तरह के प्रश्न शायद उठते हैं। ‘कला के अंत’ की बात बहुत से लोगों को भले अखरी होगी परन्तु यह वह सांस्कृतिक प्रतिक्रिया है जिसमें बदलते रूप माध्यमों में कला नए आयाम ले रही है। बेशक आयाम के इस सफर में बहुत कुछ खराब भी हो रहा है परन्तु खराब की डर से क्या कला अभिव्यक्ति की बेहतरीन संभावनाओं को नकारा जा सकता है! 

Saturday, November 24, 2012

सुर की अद्भुत लय


ध्वनि माने नाद। संगीत की बात करें तो नाद वहां ध्वनि भर नहीं है। वहां लय है, ताल है और है जीवन का राग। सोचता हूं, संगीत की लय यदि जीवन मंे नहीं हो तो क्या यह संसार असार नहीं हो जाएगा! राग ही तो कराता है जीवन से अनुराग। 
बहरहाल, नाद से स्वर और स्वरों से है सप्तक। संस्कृत की धातु रंज् से बना है ‘राग’। माने रंगना। कल की ही बात है। पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर को सुना। लगा, उनके गाये में पूरी तरह से रंग गया हूं। मीराबाई का जो भजन उन्होंने गाया है, उसके बोल हैं, ‘मत जा मत जा रे जोगी, पांव पड़ुंगी मैं तेरे’। गाया इसे ओरों ने भी है पर मल्लिकार्जुन मंसूर के स्वरों में यह सुनंेगे तो लगेगा तन-मन झंकृत हो उठा है। शब्दों की कोरी ताल निबद्धता ही वहां नहीं है, एक-एक गाये शब्द का अर्थ जैसे स्वर दर स्वर खुलता है। राग भैरवी में इसे गाते पंडित जी मीरा की भावना के सारतत्व की गहन अनुभूति कराते हैं। आरोह, अवरोह में किसी एक स्थान पर ले जाकर औचक जब वह ‘मत जा मत जा’ शब्दों के स्वर छोड़ते हैं तो अद्भुत सौन्दर्य रचाव होता हैं। यह अध्यात्म का सौन्दर्य है। लगता है, उनकी अंवेरी लय सदा के लिए मन में बस गयी है। भैरवी प्रातःकाल का राग है परन्तु पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर के स्वरों में ‘मत जा जोगी’ को किसी भी समय सुनेंगे, मन करेगा उसे गुनें। एक-एक शब्द की गहराई मंे ले जाते वह स्वरों की अद्भुत पकड़ करते हैं। 
मल्लिकार्जुन मंसूर के आलमप्रभु, चैन्नबसव, अक्कामहादेवी जैसे संतों के वचनों का गान भी अंतर अकथ से हुलसित करता है। बसवन्ना की विनय-पत्रिका ‘हे प्रभु,/देह की डंडी बनाओ/तुम्बा हो सर का/नाड़ियों की तंत्री बने/अंगुलियों का मिजराब/साधकर अपने दो और तीस राग/मेरे हृदय को छेड़ो...’ सुनेंगे तो लगेगा आप किसी ओर जहां में चले गए हैं। सच! यह मसंूर ही हैं जिनका गान अर्थनिरपेक्ष होता सूक्ष्म से सूक्ष्मतर समाधि भंगिमा की ओर बढ़ता है। वह अपना सारा गान भगवान शिव को समर्पित करते हैं। मुझे लगता है, अन्तः और बाह्य जगत के तमाम संदर्भ उनके गान में समाहित हैं। धुन लगते ही हम जैसे उसमें रमने लग जाएंगे। 
बीकानेर के ऊर्जावान और समझ वाले अपेक्षाकृत युवा प्रकाशक प्रशान्त बिस्सा ने इधर सूर्य प्रकाशन मंदिर के तहत पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर की आत्मकथा ‘रसयात्रा’ का प्रकाशन किया है। मूल कन्नड़ में लिखी ‘रसयात्रा’ बकौल अशोक वाजपेयी ‘तीर्थगायक की रसयात्रा’ है। मंसूर इसमें लिखते हैं, ‘ताल और राग के सटीक मिलाप से ही धीरे-धीरे राग-पुष्पित होते हैं।’  उन्हें सुनते हुए इसे गहरे से अनुभूत भी किया जा सकता है। 
‘रसयात्रा’ में एक जगह वह संगीत की मौलिकता पर कहते हैं, ‘परम्परा के सारतत्व पर अधिकार के बाद ही मौलिकता को प्रवाहित होना चाहिए।’ स्वयं पंडितजी ने तमाम अपने गान में यही तो किया है! वहां परम्परा के सारत्व पर अधिकार है परन्तु स्वयं उनकी सिरजी मौलिकता भी है। उनके गुरू मांजी खान साहब कहते, ‘हर कुजे नियामत’। माने हर पात्र में कुछ न कुछ प्रसाद जरूर होता है। इसकी गांठ बांधते उन्होंने संगीत में सबसे कुछ न कुछ ग्रहण किया परन्तु उसमें अपना मिलाते सहज आलाप के अद्भुत सुरीलेपन की सौगात हमें दी। ‘रसयात्रा’ में अपने गायन के बारे में बताते वह लिखते हैं, ‘तानपुरे पर स्वर सुनते ही मैं इस सांसारिकता से दूर एक अलग दुनिया में प्रवेश करता हूं। भौतिक उपस्थिति को भुलाकर मेरे मन की आंखे केवल सुर की लय को देखती है....मेरे लिए तो जिन्दगी खुद सुरों से सजी एक महफिल है।’ उन्हें सुनते, ‘रसयात्रा’ को पढ़ते औचक मुंह से यही तो निकलेगा ‘सच ही तो है!’

Friday, November 16, 2012

काशी और एलिस बोनर



काशी  मंदिरों की नगरी ही नहीं कला भूमि भी है। ललित कला अकादेमी और जे.कृष्णमूर्ति फाउण्डेशन के आमंत्रण पर कुछ दिन पहले एक व्याख्यान देने वाराणसी जाना हुआ था। बनारस हिन्दू विश्वविध्यालय  स्थित कला भवन भी गया। लगा, संगीत, नृत्य, चित्रकला और संस्कृति की हमारी परम्पराएं अभी भी वहां जीवंत है। कलाविद् ‘एलिस बोनर’ के बारे में  काशी   जाने से पहले भी पढ़ा था परन्तु बनारस में उनकी दृष्टि से जैसे अपनापा हुआ। उनकी कला दीठ में काषी के घाटों से साक्षात् हुआ, एलोरा के गुफा चित्रों के बारे में जैसे नई समझ मिली और सुप्रसिद्ध नर्तक उदयशकर की नृत्य भंगिमाओं के बहाने संगीत, नृत्य, शिल्प, वास्तु और अध्यात्म के भारतीय सरोकारों को पश्चिम के किसी कलाकार की मौलिक दृष्टि से फिर से जाना।
अचरज भी हुआ। किसी भारतीय ने नहीं, पाष्चात्य कलाकार ने भारतीय कला और संस्कृति को अपनी कला में इस गहरे से जिया है! फिर सोचता हूं, कला का यही तो वह परम सत्य है जिसमें सर्जक जीवन की अपने तई तलाष करता है। एलिस ने यही किया। अपनी अनुभवी दृष्टि से भारतीय कला के रहस्यों में प्रवेश  करते उसने चित्रों में, मूर्ति में, नृत्य में अर्न्तनिहित को अपने तई समझा। कला की अपनी दीठ दी। उसने संसार की दृष्टिगत होने वाली वस्तुओं प्रकृति, मनुष्य, पषु तथा पेड़-पौधों को अपनी कला में मूर्त रूप ही नहीं दिया बल्कि भारतीय नृत्य की भंगिमाओं को आत्मसात करते रेखाओं, रंगों के साथ ही मूर्तियों में उन्हें जिया भी। 
विष्वास नहीं होता! भारतीय नृत्य के आस्वाद में कोई इतना खो जाए कि तमाम अपना जीवन ही उसके लिए समर्पित कर दे। पर सच यही है! एलिस इसी का उदाहरण है। ज्यूरिख में वर्ष 1926 में एलिस ने प्रख्यात नर्तक उदयषंकर का नृत्य देखा। नृत्य की उनकी भंगिमाएं और लालित्य की सुंदरता ने उसे जैसे मोहित कर दिया। एलिस को लगा, मंदिरों पर उत्कीर्ण होने वाली मूर्तियां उदयषंकर के नृत्य में जीवंत हो उठी है। बस, यहीं से एलिस का भारतीय कलाओं में रूझान बढ़ा और अगले पांच वर्षों तक वह उदयषंकर के कलाकर्म के साथ ही जीवन के उनके तमाम आयामों से जैसे एकाकार हो गयी। उनके नाट्य प्रदर्षन, पत्राचार, वेषभूषा के साथ ही योरोप और अमेरिका की उनकी यात्राओं की व्यवस्थाएं उसने की।एलिस के अनुसार, ‘यह वास्तव में भारत के बहुरंगीय जीवन का मेरे लिए एक सजीव चित्र था।’
बहरहाल, बाद में वाराणसी को एलिस ने अपना घर भी बनाया। वह बनारस के अस्सी घाट में रही। यहां रहते उसने काषी की महिमा को गुना और और उसे अपने चित्रकर्म, मूर्तिषिल्प में गुना भी। यहीं से बाद में वह उत्कल भूमि भी गयी। उड़िसा  में बिखरे षिल्प की तलाष करते ही उसने  ताड़पत्रों की अप्रकाषित पाण्डुलिपियां खोज निकाली। पण्डितों और षिल्पियों का सहयोग लिया और 12 वीं सदी में लिखे गये उड़िसा के तंत्र युग ग्रंथ ‘षिल्प प्रकाष’ का अनुवाद भी किया। प्रतिमा के सिद्धान्त का विधिवत एवं प्रतिकात्मक ज्ञान जैसे इससे उन्हें मिला। एलिस ने कहा भी, ‘कलाएं सौन्दर्य आस्वाद के लिए ही नहीं है, उनके जरिए आत्मा को एकाग्रचित किया जा सकता है। इसलिए कि वे सत्य हैं।’
 एलोरा पर एलिस ने जो लिखा है, वह विरल है। गुफा षिल्प पर लिखी उनकी सूक्ष्म कला दृष्टि पर जाता हूं तो यह भी लगता है कि यह एलिस ही थी जिसने एलोरा की गुफाओं के अर्थ संकेतों को पकड़ते प्रतिमाओं के अर्न्तनिहित को अपनी दीठ दी। इस दीठ मंे बाह्य सौन्दर्य के आकर्षण से प्रभावित होना ही कला की समझ की संपूर्णता नहीं है बल्कि जीवन के आंतरिक भाव को व्यक्त करना भी है। कहें, उसने कला और जीवन की गतिषीलता की आत्मा को पहचाना। इसीलिए बाद में जब एलिस  ने नर्तक, संगीतकारों के चित्र, मूर्तियां बनायी तो उनमें भारतीय संस्कृति जीवंत हो उठी। 
काषी से लौटे इतने दिन हो गये परन्तु एलिस की कला, उसकी भारतीय कला दृष्टि का प्रकाष अभी भी जेहन में रह-रह कर कौंध रहा है। एलिस ही क्यों, काषी की दूसरी कला अनुभूतियां भी तो इतनी है कि उन पर लिखूं तो कई सौ पृष्ठ भी कम नहीं पड़ जाएंगे! यही सब सोच रहा हूं कि मन में विचार आ रहा है, काषी का अर्थ भी तो प्रकाष ही है। काष् धातु है। अर्थ है-ज्योतित करना।  दृष्टि में जो ज्योतित है, उन्हें क्या शब्दांे में व्यक्त किया जा सकता है!  


Thursday, November 8, 2012

दीपक ज्योति नमोस्तुते


पर्व-त्योंहार आखिर किसलिए मनते हैं! इसीलिए ना कि जीवन का उजास, उत्सवधर्मिता का नाद उनमें है। और दीपावली तो है ही उजाले की प्रतीक। सोचिए! अमावस्या के अंधकार को हरने ही तो जलता है, नन्हा सा एक दीप। 
दीप पर्व दीपावली अंतर्मन उजास का संवाहक है। मुझे लगता है भारतीय संस्कृति का यह अनूठा कला पर्व है। इस पर्व पर भीतर का हमारा सर्जक जाग उठता है। दीपावली इसीलिए तो हरेक के मन को भाती है कि इस एक पर्व में कलात्मक सृजन के भांत-भांत आयामों को हम अनायास छू लेते हैं। रंग-रोगन कराते कलाकार नहीं होते हुए भी घर के किसी कोने को अपने भीतर के कलामन से संवारने की दीठ आप मंे अनायास जगती है। गांवों मंे तो दीप पर्व से पहले ही घरों को गोबर से लिपने-पोतने का कला कर्म शुरू हो जाता है। मिट्टी और गोबर का मेल। उसमें हिरमिच और हल्दी का घोल। घर-आंगन में मंडते कलात्मक मांडणे।...और यही क्यों लक्ष्मी पूजा स्थल तक कुकुंम से लक्ष्मी के अलंकारिक पगलियों भी तो मांडे जाते हैं।...दीपकों की जो रोशनी घर-परिवार में होती है वह भी तो मिट्टी के आकर्षक दियों से ही होती है। कुम्हार की चाक से ढले मिट्टी के दीपक पानी से धोकर साफ करते हैं और फिर उनकी खूशबू के साथ यत्र-तत्र सर्वत्र उजास फैलता है।
दीप पर्व में जीवन को आलोकित करने का मंतव्य गहरे से निहित है। आज से नहीं। युग-युगों से। मुअन-जो-दड़ो की खुदाई से इंटो के घरों में दीपक जलाने की परम्परा ज्ञात हुई है और अंधेरी गुफाओं में निर्मित बारीक चित्रों को देखकर भी सहज यह अनुमान होता है कि दीपक तब भी थे। मुझे लगता है, सभ्यता और संस्कृति के अनहद नाद हैं दीपक। पंचतत्वों से एक अग्नि का प्रतीक दीपक। जन्म से लेकर मृत्य के बाद तक की रश्में निभाता दीपक। अंधकार से मुक्ति का आह्वान करता। मर्त्य में अमर्त्य दीपक। 
दीपक अंतर्मन प्रकाश की खिड़की खोलने का संदेश देते हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुए, वाराणसी जाना हुआ था। काशी की एक सांझ गंगा में नाव में विचरते दीपमालिकाओं से साक्षात् हुआ। लगा, एक साथ पंक्तिबद्ध जलते दीपकों में जीवन की लय को गहरे से अंवेरा गया है। तभी मन में खयाल यह भी आया...अंधेरा नहीं हो तो इस रोशनी को क्या हम इस रूप मंे देख पाते! माने अंधकार में ही प्रकाश की शोभा है।...तो सृजन के लिए जरूरी है अंधकार। दिन के बाद रात न हो तो! यह दीपक ही है जो रात्रि के अंधेरे में अपने होने को जताता जैसे हमें अपने भीतर झांकने का यूं अवसर देता है। बनारस में गंगा आरती के अद्भुत दृश्य में रमते जैसे हम अपने होने की ही तलाश कर रहे थे। नाव पर बैठे गंगा आरती की दिव्यता और भव्यता में ही डूबे थे कि पास ही आ लगी एक और छोटी सी नाव। हाथ में मिट्टी के दीपक और घी से सनी बाती के साथ छोटे-छोटे बच्चे उन्हें खरीद गंगा मंे प्रवाहित करने का आग्रह कर रहे थे। हमने दीपक ले, बाती को प्रकाशित किया। जगमग दीपकों को जब गंगा में प्रवाहित किया तो लगा कुछ अनूठा अनायास ही हो गया है। पंक्तिबद्ध रोशनी बिखरते दीपक थोड़ी देर में ही पानी की एक लहर के साथ हमसे दूर चले गये।...परन्तु उनका उजास!  मन में जैसे अभी भी बसा हुआ है। 
कहीं पढ़ा हुआ, औचक जेहन में कौंध रहा है। निर्वाण समय बुद्ध शांत लेटे हुए हैं। उनका शिष्य आनंद विलाप कर रहा है, ‘हमें छोड़कर क्यों जा रहे हैं! अब कौन करेगा हमारा पथ प्रशस्त?’ बुद्ध के मुंह से निकलता है, ‘अप्प दीपो भव’ माने स्वयं अपना प्रकाश बनो। जलो ताकि आलोकित हो रूप। दीपावली में हम सब यही संकल्प लें। अपनी ज्योति आप बनें। ‘दीपक ज्योति नमोस्तुते।’ 


Friday, November 2, 2012

...और चले गए साखलकर जी



कला मर्मज्ञ रत्नाकर विनायक साखलकरजी नहीं रहे! यह सूचना आहत करने वाली थी। ललित कला अकादेमी के निमंत्रण पर कला के एक व्याखान कार्यक्रम के अंतर्गत तब वाराणसी में था। सुनकर विश्वास ही नहीं हुआ। कल की ही तो बात है, इसी स्तम्भ में उनके कला चिंतन पर लिखा था। लगा, कलाओं में रमने, उन्हीं में बसने वाला हमसे यूं दूर कैसे जा सकता है! देह से भले वह चले गये परन्तु उनका कलाकर्म, चिन्तन तो सदा हमारे साथ रहेगा ही।
बहरहाल, भारतीय कला के अर्न्तनिहित में जाते यह साखलकरजी ही थे जिन्होंने कला चिन्तन में सदा ही बढ़त की। भारतीय चित्रकला, मूर्तिकला और तमाम हमारी लोककलाओं को समझ की अपनी दृष्टि दी। पाठ्यपुस्तकों के जरिए शिक्षार्थियों तक कला के सरोकार पहुंचाने का भी बड़ा  उपक्रम किया। हिन्दी में कला की पाठ्यपुस्तकों की बड़ी सीमा यह है कि उनमें अधिकतर पाश्चात्य कला दर्शन का ही रूपान्तरण है। ऐसे में यह साखकरजी ही थे जिन्होंने आधुनिक भारतीय कला को हिन्दी में मौलिक दृष्टि से लिखा परन्तु इस लिखे की कूंत कभी शायद हो ही नहीं पायी। साखलकरजी के साथ तो विडम्बना यह भी रही कि उनका चित्रकार और पाठ्यपुस्तक लेखक उनके कला आलोचक पर सदा भारी रहा। राज्य ललित कला अकादेमी ने चित्रकार के रूप में उन्हें कलाविद् की उपाधि से सम्मानित किया परन्तु कला आलोचना की उनकी दृष्टि का मूल्यांकन शायद सही ढंग से किसी स्तर पर नहीं हुआ। 
याद पड़ता है, हुसैन की भारतीय देवी-देवताओं को लेकर बनायी गयी कुछ आपत्तिजनक कलाकृतियांे को लेकर जब पूरे देश में बवाल मचा हुआ था, साखलकरजी ने उनकी कलाकृतियों के निहितार्थ में जाते तर्क सहित प्रचार की उनकी भूख को पाठकों के समक्ष रखा था। यही नहीं उन्हें पढंेगे तो पाठकों को बार-बार यह अहसास भी होता है कि जो उन्होंने लिखा उसमें कला के भारतीय दर्शन को गहरे से छुआ है। मसलन अजन्ता के कला वैभव, खजुराहो की नग्न प्रतिमाओं पर लिखते हुए उन्होंने शास्त्र, पुराणों के शिल्प मंतव्य भी गहरे से उद्घाटित किए हैं। मंदिरों पर यौन प्रतिमाओं को लेकर उनके भारतीय दर्शन पर जब भी जाता हूं, आनंदकुमार स्वामी का कला चिन्तन भी गहरे से मन में कौंधता है। मंदिरों में नग्न प्रतिमाओं, मिथुन आकृतियों को भारतीय कला में कभी गलत नहीं माना गया, इसलिये कि यह व्यक्ति को कुंठाओं से मुक्त करता है, पवित्रता से पहले कुंठाओं से मुक्ति जरूरी है। साखलकरजी कला के भारतीय दर्शन में जाते विष्णुधर्मोत्तर पुराण, भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के साथ ही शिल्पशास्त्र और तमाम दूसरे कला आख्यानों की गहराई को अपने लिखे में जीते। इसी से उन्होंने पाश्चात्य और भारतीय कला का अपने तई सांगोपांग मूल्यांकन किया और भारतीय कलाकारों पर जो लिखा उसमें रंग और रेखाओं की गहराई में जाते कला की सोच को व्यापक परिप्रेक्ष्य में हमारे समक्ष रखा। 
अज्ञेय के कला चिन्तन पर कभी प्रभात प्रकाशन ने वत्सल निधि के तहत हुए व्याख्यानों को संजोते एक पुस्तक का प्रकाशन किया था। परन्तु हाल ही सस्ता साहित्य मंडल ने सुप्रसिद्ध आलोचक कृष्णदत्त पालीवाल के संपादन मंे कला पर समय-समय पर लिखी अज्ञेय की टिप्पणियों को प्रकाशित किया है। उससे पता चलता है कि भारतीय कला पर अज्ञेय कितनी गहराई से सोचते थे। निर्मल वर्मा को पढते हैं तो उनके बरते शब्दों में कला ही कला बिखरी दिखाई देती है। क्या ही अच्छा हो, रत्नाकर विनायक साखलकरजी के कला चिन्तन पर एक संपादित पुस्तक ही कोई बड़ा प्रकाशक प्रकाशित करे। हिन्दी में कला आलोचना नहीं होने का रोना रोने वाले आखिर जाने तो सही कि हिन्दी कला आलोचना किस मुकाम पर है! 


Thursday, November 1, 2012

नया कुछ रचने की कला दीठ


कलाओं का आस्वाद मन को भीतर से भरता है। लगता है, कहीं कुछ रीता हरेक के भीतर होता है। कलाएं उसकी पूर्ति करती मन को उल्लसित करती है। पिछले सप्ताह जवाहर कला केन्द्र में बहुतेरी कला प्रदर्शनियांे का आस्वाद करते एक कलादीर्घा में पांव औचक ठिठक से गये। जयपुर के साथ हैदराबाद, भोपाल, इन्दौर, मुम्बई, दिल्ली, अजमेर आदि स्थानों के उभरते हुए कलाकारों की प्रदर्शित चित्रकृतियां में बहुत कुछ खास था। एक चित्र में वीणा पर विराजते गणेश की भंगिमा या कहूं उसका आभाष मन में घर कर गया। 
यह एब्सट्रेक्ट गणेश थे। पार्श्व के ग्रे रंग में उभरती यंत्र मानिंद सधी रेखाएं। सिंदूरी, काला, भूरा, सफेद और दूसरे बहुतेरे रगों के मिश्रण से उभरी रंग आभाओं में गणेश की कलम और कागज पर उभरी रचनाओं का उजास। सब कुछ वही नहीं जो लिखा गया है, कहूं उस सरीखा ही कुछ जेहन में उभरा। कैनवस के इस एब्सट्रेक्ट पर न जाने कितनी ही देर आंखे ठहरी  रही। पता चला, कला अध्ययन से जुड़ी जयपुर की पूजा शर्मा का बनाया है यह चित्र। रंग-रेखाओं के उजास में माइकल एंजेलो, पिकासो, राफेल और हुसैन सरीखे कलाकारों की कला को बांचते नया कुछ रचने की आधुनिक दीठ से जैसे साक्षात्कार हुआ। वह दीठ जिसमें कलाकार भीतर की अपनी आस्था को गहरे से स्वर देते हुए अपने समय से भी कहीं कटा नहीं है।
बहरहाल, राजधानी दिल्ली की ऑनलाईन आर्ट गैलरी ‘आर्टइन्फो’ के तहत लगी हुई थी यह महत्ती कला प्रदर्शनी-‘बोनहुमी’। बोनहुमी! माने? ‘आर्टइन्फो’ के सतेन्द्र गुप्ता से संवाद हुआ तो कहने लगे, यह फ्रंेच शब्द है। अर्थ है, साथ-साथ। मुझे लगता है, किसी शब्द का यही कला संस्कार है। विभिन्न देशों में और बल्कि भारत के बहुत से प्रांतों की भाषाओं में बहुतेरे ऐसे शब्द हैं जिनमें अद्भुत कला बोध है। इन्हें बरतते हुए सांगीतिक लय की अनुभूति की जा सकती है। अज्ञेयजी के डायरी लेखन में बरते ‘तितली’ शब्द और भिन्न भाषाओं में इसके कहन की याद ताजा हो रही है। इस्पानी में तितली को मारिपोजा और ग्रीक में पेतालूदिस कहा जाता है। शब्द को सुनकर जो कला बोध होता है, उसी में रमते अज्ञेय लिखते हैं, ‘...मानो अभी पंखुरी झरी।...और झरते-झरते हाइकू बन गयी।’ सोचता हूं, क्या ही अच्छा हो तमाम भाषाओं में लय अंवेरते ऐसे शब्दों को एकत्र कर कलाभिव्यक्ति का कोई अन्तर्राष्ट्रीय कोश तैयार किया जाए। अभी कल ही की तो बात है। राजस्थानी रचनाकार मित्र राज बिजारणिया ने फेशबुक में ‘चाळ भतूळिया रेत रमां’ अभिव्यक्ति की। शब्द की अद्भुत लय दीठ यहां नहीं है! यही तो है कला! आप कुछ पढें, सुनें, देखें तो भीतर की आपकी संवेदना जगे। मन को पंख लगे। कहीं और क्यों जाएं। हमारे आस-पास बहुत कुछ ऐसा है जिसमें कलात्मक बोध है। बस उसे पहचानें। उसमें रमें। पाएंगे, कुछ अद्भुत अनुभूत हुआ है। जो उसे गुनेगा, वही तो कुछ बुनेगा!
‘बोनहुमी’ कला प्रदर्शनी से गुजरते मैं भी जैसे यह सब गुन गया हूं। बहुतेरी बार यह होता है कि आप कुछ देखने जाते हैं और वहां और भी बहुत कुछ महत्वपूर्ण मिल जाता है। ‘आर्टइन्फो’ की कला प्रदर्शनी में प्रदर्शित चित्रांे के साथ उसकी ऑनलाईन कलादीर्घा की भी आभाषी यात्रा वहीं करने को मिल गयी। सुखद लगा, यह जानकर भी कि कोई ऑनलाईन गैलरी भिन्न माध्यमों मंे काम करने वाले 5 हजार के करीब कलाकारों की कला की वर्चुअल सैर करा रही है। कला में संवाद के साथ कला आयोजनों के श्रव्य-दृश्य चितराम भी वहां उपलब्ध है और भविष्य की योजना में संचार की इस तकनीक के जरिये हिन्दी में भी इसी तरह से कलाओं को आम जन से साझा करने की योजना है। 

Friday, October 19, 2012

साखलकर की सूक्ष्म कला दीठ


कलाएं किसी भी समाज या सभ्यता की परख की एक प्रकार से दीठ देती है। यह कलाएं ही हैं जिनसे समाज में सृजन की अनंत संभावनाए सदा बनी रहती है। इसलिये कि कला और कलाकार समाज व्यवस्था के कर्मचारी नहीं निर्माता होते हैं। रत्नायक विनायक साखलकर ऐसे ही समाज निर्माता हैं, जिन्होंने कलाओं के जरिए समाज को समझने की दृष्टि हमें दी है। यह बात अलग है कि उनकी कला और कलाओं की परख की पैनी दीठ के प्रति एक प्रकार से हम-सबकी नुगराई ही रही है।
बहरहाल, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी की ओर से इस सोमवार उन्हें प्रज्ञा पुरस्कार दिया गया है। प्रज्ञा पुरस्कार किसी भी उस लेखक को दिया जाता है, जिसकी पुस्तकों के 15 संस्करण राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी ने प्रकाशित कर बेचे हों परन्तु इस दीठ से तो साखलकरजी वैसे भी बहुत आगे निकल गये थे। उनकी कला पर लिखी बेहतरीन पुस्तक ‘आधुनिक चित्रकला का इतिहास’ के तो 23 संस्करण अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। महत्वपूर्ण यह नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि कला पर मौलिक चिन्तन रखने वाले किसी लेखक की प्रज्ञा का सम्मान किया गया है। और वैसे भी रत्नायक विनायक साखलकर चित्रकार होने के साथ ही कलाओं पर मौलिक समझ से लिखने वाले उन भारतीय लेखकों में से है जिन्होंने कलाओं पर लिखे के अनुसरण की बजाय अपने तई कला मंे चिन्तन की सदा ही नई स्थापनाएं की है। पाश्चात्य और भारतीय कलाकारों और कलादृष्टि पर उन्होंने जो लिखा है, उसमें स्वयं उनकी मौलिक सोच हर ओर, हर छोर है।
ऐसे दौर मंे जब उच्च शिक्षा पाठ्यपुस्तकों के अंतर्गत पांच-दस पुस्तकें एकत्र कर उनसे कोई नई पुस्तक निर्माण की परिपाटी ही चल निकली हो, यह सोच कर संतोष होता है कि कला की शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों के पास साखलकरजी जैसे लेखकों की पुस्तकें भी हैं। उनके कला लेखन की बड़ी विशेषता है कलाओं की स्वयं उनकी समझ और उस पर उनकी सूक्ष्म अंतःप्रवृति। उनकी लगभग सभी प्रकाशित कला पुस्तकों का आस्वाद किया है। पाश्चात्य और भारतीय कलाकारों की कला पर, कला में सौन्दर्य पर, कला के अन्तःअनुशासन पर, रूपांकन के अर्न्तनिहित पर, बिम्ब और रूपकों के साथ ही परम्परा और आधुनिकता पर तमाम उनके लिखे में भारतीयता का अपनापन गहरे से मन में पैठता है। माने योरोपीय कलाकारों और उनकी कला पर लिखते हुए भी वह भारतीय दृष्टि से उन पर अपनी सूक्ष्म समझ से पाठक को एक प्रकार से संस्कारित करते हैं।  हिन्दी में कलाओं पर पर यूं भी बहुत अधिक लिखा नहीं गया है और जो थोड़ा बहुत लिखा गया है, उसमें प्रायः अंग्रेजी की बू आती है। परन्तु साखलकरजी हिन्दी के अनन्य कला लेखक है। कला संबंधी लिखे में अंग्रेजी शब्दों की बहुतायत के घोर विरोधी भी। इसीलिये अपने कला शब्दकोश में उन्होंने भारतीय जीवनदर्शन के अनुरूप ड्राइंग, कम्पोजिशन, प्रपोर्शन, टोन, बैलन्स जैसे आंगल शब्दों के लिए हिन्दी में उपयुक्त शब्द भी दिये।  कला के अपने तमाम लिखे में स्वनिर्मित भाषिक परनिर्भरता से मुक्त होने की राह सुझाते यह साखलकरजी ही हैं जिन्होंने हिन्दी में कला शब्दावली को संपन्न किया। कलाओं पर चिन्तन की नयी दीठ दी है और भारतीयता में रची-बसी बेहद सुन्दर कलाकृतियां भी सृजित की। उनकी कलाकृतियों से रू-ब-रू होते रंगों की मिठास, रेखाओं का उजास और भावों की गहराई भीतर से जैसे हमें भरती है। रवीन्द्रनाथ टैगोर की कलाकृतियों की मानिंद उनकी कलाकृतियों में भावों की गहरी अर्थ अभिव्यंजनाए हैं।
बहरहाल, कलाओं में रमते, उनमें बसते रत्नायक विनायक साखलकर ने अपने तई हिन्दी कला आलोचना को निरंतर समृद्ध किया है। क्या ही अच्छा हो, उनके नाम पर ललित कला अकादमी या कला-संस्कृति विभाग उनके जीतेजी कला आलोचना पुरस्कार की शुरूआत करे। कलाकारों, कलाओं की चर्चा समाज में आखिर उन पर सूक्ष्म अंर्तदृष्टि से लिखने वालों से ही क्या नहीं होती!

Friday, October 12, 2012

सम्मान चिन्तन के साथ संगीत का


संगीत नाटक अकादमी ने कलाओं के विशिष्ट प्रदर्शन, कला गुरू और कलाओं का बेहतर ज्ञान रखने वाले जिन विद्वानों को इस बार संगीत नाटक फैलोशिप सम्मान दिया है, उनमें जयपुर के मुकुन्द लाठ भी सम्मिलित हैं। पढ़कर सुखद लगा। इसलिये कि कलाओं के प्रदर्शन के साथ कला चिन्तन पर अकादमी ने किसी ऐसे शख्स को फैलाशिप प्रदान की जिसके संगीत के साथ तमाम दूसरी कलाअेां के गहरे सरोकार हैं।
मुकुन्द लाठ से बतियाना संगीत और दूसरी कलाओं से अपने को संपन्न करना है। राग-रागिनियों और गान की प्रचलित धारणाओं से परे सदा ही चिन्तन में वह नया कुछ देते रहे हैं। कहूं, उन्हें सुनना पारम्परिक दृष्टि के नवोन्मेष का अनुभव करना है। पिछले दिनों अज्ञेय की भागवतभूमि यात्रा पर पढ़ रहा था तो वहां भी मुकुन्दजी को पाया। गायक मुकुन्दजी को। भागवतभूमि यात्रा में मुकुन्दजी ने जो गाया, उसके धु्रपद आलाप बोल थे ‘आयो कुंवर कान्ह, मुरलीधर नाम’। मुकुन्दजी के चूंकि शब्द से भी गहन सरोकार है सो वह शब्दातीत को राग की डोर से बांध मूर्त करते हैं। यह इसलिये कि कुछ दिन पहले उनके निवास स्थान पर ही उस्ताद अमीर खां और उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन खां के गायन पर घंटो जब चर्चा हुई तो बहुत कुछ उन्होंने गाकर भी समझाया था। धु्रपद की बारीकियों से यह अलग ढंग से मेरा साक्षात्कार था।
बहरहाल, मुकुन्दजी प्रचार से सदा ही दूर रहे हैं। सौम्य और कहन में अद्भुत धैर्य अंवेरने की उनका मुद्रा मन में गहरे से बसती है। बहुतेरी बार यह भी अनुभूत किया है कि उचित प्रशंसा में भी वह बेहद संकोच का अनुभव करते हैं। कलाओं के तो खैर वह मौन साधक हैं ही। याद पड़ता है, पंडित जसराज का विद्याश्रम में कार्यक्रम था। उससे एक दिन पहले मुकुन्दजी के निवास स्थान पर ही उनसे संवाद करने पहुंचा था। मुकुन्दजी पंडित जसराज के शिष्य हैं। सो जब पहुंचते तो देखा मुकुन्दजी पंडितजी के साथ ही रियाज कर रहे थे। छायाकार महेश स्वामी जसराज के चित्र लिये जा रहे थे और मैं और पंडितजी संगीत पर घंटो बातें करते रहे। मुकुन्दजी शांत बस हमें सुन रहे थे। संकोच नये शिष्य की मानिंद ही। उनके व्यक्तित्व की यही खासियत है, अपने को कभी किसी स्तर पर स्थापित करने का प्रयास वह कभी नहीं करते। कभी विजयदान देथा का एक संग्रह आया था ‘रूंख’। उसमें भी मुकुन्दजी की अनुवादित कविताओं से रू-ब-रू होते लगा वह शब्दों में निहित सांगीतिक लय को गहरे से पकड़ते हैं। वत्सल निधि द्वारा आयोजित डॉ. हीरानंद शास्त्री स्मारक व्याख्यान माला की बारहवीं कड़ी में उन्होंने ‘संगीत एवं चिन्तन’ पर व्याख्यान दिया था। इस व्याख्यान को ही ‘संगीत एचं चिन्तन’ पुस्तक में पढ़ते औचक संगीत और धुनों की मन में बनी प्रचलित बहुत सी धारणाएं जैसे टूटी। दर्शन और संस्कृति के संगीतपरक विमर्श में राग और धुनों को केन्द्र में रखते हुए उन्होंने जो मौलिक स्थापनाएं की हैं, वे ऐसी हैं जिनमें संगीत स्वयमेव हमारे चिन्तन से जुड़ा अनुभूत होता है।  
मुकुन्दजी शास्त्रीय संगीत की तमाम हमारी परम्पराओं, रागों और नृत्य की गहरी समझ रखते हैं। संगीत को दर्शन से जोड़ते वह जब किसी खास राग और धुन पर संवाद करते हैं तो लगता है आप संगीत पर अब तक जो जानते थे, वह कुछ भी नहीं था। संगीत को मन के विचारो से जोड़ते वह अद्भुत लय अवंेरते हैं। कहते हैं, ‘...मान भी लें कि चिन्तन के साथ संगीत बज नहीं सकता लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी भी तरह की जुगलबंदी हो ही नहीं सकती।’ इसमें मैं यह भी जोड़ देता हूं-यह जुगलबन्दी आपको देखनी हो तो संवाद करे मुकुन्द लाठ से। कशम से, निराशा तो नहीं ही होगी।

Thursday, October 4, 2012

चीन में भारतीय कला की अनुगूंज


कलाएं व्यक्ति की दृष्टि का विस्तार करती है। अरूप का रूप दिखाती हुई। अतीत की राह से भविष्य की वास्तविकताओं से हमें रू-ब-रू कराती हुई। कहें एक व्यापक सांस्कृतिक प्रतिक्रिया के भीतर कलाओं के जरिये ही हमारा समाज अपनी तमाम स्मृतियों, विस्मृतियों, खामियों और बेशक विशेषताओं के साथ मौजूद रहता है। शायद इसीलिये कलाओं के जो अन्तर्राष्ट्रीय आयोजन होते हैं उनमें देशों की दूरियां समाप्त होती विश्व को सृजनात्मकता के क्षितिज पर एक करती है। चीन की राजधानी बीजिंग में समकालीन भारतीय कला सरोकारों से जोड़ती भारतीय कलाकारों की विशेष प्रदर्शनी इसी की संवाहक है। इसलिये कि इसमें देशज विशेषताओं के साथ कला में विश्व स्तर पर हो रहे बदलावों और रूप परिवर्तनों को भारतीय कलाकारों ने अपनी कला में गहरे से संजोया है।
 सितम्बर माह की 28 तारीख से प्रारंभ हआ पांचवा बिजिंग अन्तर्राष्ट्रीय आर्ट बिनाले 22 अक्टूबर तक चलेगा। केन्द्रीय ललित कला अकादमी द्वारा इस बिनाले में ग्यारह भारतीय कलाकारों की 26 कलाकृतियां प्रदर्शित की गयी है। इनमें कैनवस पर रंग और रेखाओं के सरोकार हैं, फाईबर, ग्लास, बोंज और मार्बल से रचित शिल्प है, कैलिग्राफी में गूंथा सृजन है और इसके साथ ही संस्थापन के जरिये दृश्यों आधुनिक सरोकार भी हैं।  ललित कला अकादमी के सचिव सुधाकर शर्मा ने इस कला प्रदर्शनी को अपने तई किये प्रयासों से संभव बनाया। बाकायदा इसके लिये देशभर के कलाकारों और उनकी कलाकृतियों में से वह खास ढूंढा गया जिससे अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर भारतीय कला अपनी विशिष्टता का प्रतिनिधित्व कर सके। कलाकृतियों में निहित संवेदना और आधुनिकता के अपनापे की ही वजह कहें कि भारतीय कला को स्वयं चीन ने अपने इस प्रतिष्ठित बेनाले आयोजन के लिये मेजबानी दी। 
बहरहाल, पिछले दिनों जब दिल्ली जाना हुआ तो सुधाकर शर्मा से इस बारे में संवाद हुआ। उद्घाटन समारोह में शिरकत कर लौटे सुधाकर कहने लगे, ‘इस बार प्रदर्शित कलाकृतियां में भारतीय संस्कृति की अनुगूंज देखने वालांे के लिये विशेष आकर्षण लिये है।’ यह कहते बीजिंग में प्रदर्शित भारतीय कलाकृतिया का छायाचित्र आस्वाद भी उन्होंने कराया। आस्वाद करते लगा, कोई एक दीठ नहीं बल्कि सृजन की दृष्टि बहुलता उन कलाकृतियों में है। यह भी लगा कि देश की सभ्यता और संस्कृति के ताने-बाने को विश्व कला परिवर्तनों से जोड़ते भारतीय कलाकार इधर बहुत कुछ महत्वपूर्ण रच रहे हैं। मसलन सीमा कोहली की कलाकृति देखते लगता है, वह अपने बोंज स्कल्पचर में कुण्डलिनी जागृति के जरिये भारतीय ध्यान और योग परम्परा को उद्घाटित कर रही है तो परमेश्वर राजू केलिग्राफी की देश की शानदार कला के जरिये पौराणिक चरित्रों और उनमें निहित विश्वास को स्वर दे रहे हैं। के.एस. राधाकृष्णन के स्कल्पचर में टैक्सचर की सघनता में स्ट्रक्चर का खास पहलू, के.के. मुहम्मद, सुमन गुप्ता विजय बागोरी के ग्राफिक और पंेटिंग में भारतीय परम्परा में आधुनिकता की छोंक है। अंजू डोडिया, दीपक शिन्दे के कैनवस पर रंग-रेखा सरोकार गहरे से उद्घाटित होते हैं तो रियाज कोमू और चित्रांकन मजूमदार के विडियो संस्थापनों में दृश्य की संवेदना को गहरे से जिया गया है। मुझे लगता है ललित कला अकादमी ने इस बार बीजिंग के अन्तर्राष्ट्रीय कला मेले के लिये कलाकृतियां का चयन करते हुए इस बात का भी विशेष ध्यान रखा है कि सांस्कृतिक विविधता में वहां कला के वर्तमान भारतीय सरोकारों के तमाम आयाम सम्मिलत हों। बीजिंग बेनाले की थीम भी ‘भविष्य और वास्तविकता’ है। इस दीठ से भी कला के बदलते रूपों में सृजनात्मकता का सांगोपांग प्रवाह कराती लगती है प्रदर्शित भारतीय कलाकृतियां। 
कभी मार्को पोलो ने चीन शब्द को विश्वभर में प्रसारित किया था और आज विश्व के शक्तिशाल देशांे में यह सुमार है। इस शक्तिशाली राष्ट्र में ललित कला अकादमी के प्रयासों से समकालीन भारतीय कला की संपन्नता की अनुगूंज हो रही है तो यह हमारे लिये गौरव की ही बात है। 

डेली न्यूज़ में प्रति सप्ताह एडिट पेज पर प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 5-10-2012

Friday, September 28, 2012

कहन की दृष्यकला


समाचारों की मूक भाषा है फोटो पत्रकारिता। कहें, कहन की दृष्य कला। इस कला में तकनीक ही महत्वपूर्ण नहीं है, छायाकार की छायांकन दीठ भी खास महत्व रखती है। कल्पनाषीलता के साथ घटना, दृष्य का वहां दर्षाव जो होता है। मुझे लगता है, दृष्य को पकड़ते बहुतेरी बार फोटो पत्रकार उस निःसंग को भी पकड़ता है जिसमें मौन भी बोलने लगता है और तब हजारों-हजार शब्दों में जो नहीं कह सकते, वह एक छायाचित्र कह देता है। 
पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र की  कला दीर्घा में फोटो जर्नलिस्ट सोसायटी की सामुहिक प्रदर्षनी ‘इमेजिन’ में प्रदर्शित छाया चित्रों  का आस्वाद करते यही सब अनुभूत हो रहा था। खास बात यह थी कि कलादीर्घा में छायाचित्र टंगे हुए नहीं थे, बल्कि ईजल पर रखे अपनी ओर जैसे आमंत्रित कर रहे थे। प्रदर्षन के साथ छायाचित्रों के कला सरोकारों पर जाते औचक यह भी लगा कि यह फोटो पत्रकार ही हैं जो क्षण के अपूर्व को पकड़ उसे सदा के लिये स्मरणीय बना देता है। समाचारों को पत्र-पत्रिका में पढ़ना नहीं, देखना संभव आखिर फोटो पत्रकार ही तो कराता है।
बहरहाल, ‘इमेजिन’ के छायाचित्र आंखों में बसने वाले थे। कल्पना और संवेदना की गहरी दीठ लिये। मसलन वहां प्रदर्शित रावण हत्था बजाते एक वृद्ध ग्रामीण की तस्वीर। छायाकार राजदीप का यह पोट्र्रेट पूरी दीर्घा में जैसे आपसे संवाद करता है। तस्वीर में बुजुर्ग की आंखे, उसकी भंगिमा, चेहरे की झुर्रियां और संगीत सृजन में निहित उसकी संवेदना की रागात्कता-सभी कुछ इस कदर भावपूर्ण है कि इस देखे हुए को गहरे से जिया जा सकता है। कहना गलत नहीं होगा कि छायाकार या चित्रकार जब कभी किसी पोट्र्रेट पर कार्य करता है तो उसमें वह चेहरे की एनाटोमी के साथ व्यक्ति के अन्र्तनिहित चरित्र को भी अपनी तई प्रस्फुटित करता है। सृजन का सर्वाधिक सुअवसर वहीं छिपा जो होता है! रोंदा का बालजाक का बनाया पोट्र्रेट, हुकुषाह का बनाया महात्मा गाँधी  का रेखांकन, एप्सराईन का बनाया बर्नाड शाॅ का चित्र और षिल्पकार-चित्रकार रामकिंकर बैज के बनाए बहुतेरे पोट्र्रेट ऐसे ही तो हैं जिनमें चेहरे के बहाने व्यक्ति के चरित्र का सांगोपांग चितराम है। वहां देखे हुए को आसानी से पढ़ा जा सकता है।
फोटो पत्रकार भी तो यही करता है, वह बहुतेरी बार किसी व्यक्ति विषेष के चेहरे की भंगिमाओं के बहाने उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को हमारे समक्ष उद्घाटित कर देता है। इसीलिये शब्दों की बजाय तस्वीर आंकने का उसका कर्म वहां अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। छायाचित्र प्रदर्षनी में एक छायाचित्र है जिसमें पुरूषोतम दिवाकर ने हिरणों के षिकार के दौरान पकड़े गये सिने अभिनेता सलमान के तनाव भरे चेहरे को अपनी छाया दृष्टि दी है। स्थिति-परिस्थिति के साथ कैसे मानवीय संवेदनाओं के सरोकार बदलते हैं, इसे इसमें गहरे से व्यंजित किया गया है। ऐसा ही एक छायाचित्र पदम सैनी का है, जिसमें शेर की शांत मुद्रा के समक्ष चील की ललकार के तेवराना अंदाज है। कोई एक क्षण होता है, जब इस तरह के दृष्य से हम रू-ब-रू होते हैं और उस क्षण के महत्व को छायाकार की संवेदन कला से ऐसे ही समझा जा सकता है। रामजी व्यास के एक छायाचित्र में महिला बच्चे के साथ हिरण के बच्चे को भी अपने स्तन से दूध पिलाती दिखाई दे रही है तो  समुद्र, नाव और मछुआरों के जीवन से सरोकार कराता लीला दिवाकर का चित्र भी आंखों में बसता है। छायाचित्र और भी हैं, जिनमें दीपक शर्मा, दिनेष गुप्ता, सलीम शेरी, राकेष ने हिंसा, प्रदर्षन के दौरान पानी की छोड़ी बोछार का क्षणांस, ग्रामीण जीवन के चितराम, ग्लेमर से जुडे जीवनानुभव, सूर्यग्रहण, आदिवासी नृत्य, वन एवं वन्यजीव और रोजमर्रा की घटनाओं के साथ एब्स्ट्रेक्ट में कोई अनूठा, अद्भुत पल अपनी अंतर्मन संवेदना से संजोया गया है। 
छायांकन बीते हुए को याद कराने की अद्भुत कला है। ऐसी जिसमें जो कुछ दिख रहा है, वही नहीं बल्कि उससे परे के अदृष्य को भी हम देख सकते हैं। पढ़ सकते हैं। आखिर ऐसे ही तो नहीं कहा गया है, एक छायाचित्र हजारों-हजार शब्दों से भी कहीं अधिक मुखर होता है!

Saturday, September 22, 2012

छायाचित्रों का समय प्रवाह


फोटोग्राफी अतीत से अपनापा कराती कला हैं। क्षण जो बीत गया है, उससे प्रभावी संवाद आखिर छायाचित्र ही तो कराते हैं। कहूं, अतीत वहां विगत नहीं बल्कि समय के प्रवाह के रूप में हमारे समक्ष उद्घाटित होता है। बहुतेरी बार यूं भी लगता है कि छायाचित्र भिन्न भिन्न कालखंडो की रूप-गोठ है। माने समय के कोलाज। ऐसा कोलाज जहां स्मृतियां स्पन्दित होती है, पुराने दृष्य जीवित होते हैं। 
बहरहाल, कुछ दिन पहले एम.एन.आई.टी. स्थापना दिवस पर बहुत सारे आयोजन हुए। उनमें एक बीते दिनों की स्मृतियों को हरा करने वाली छायाचित्र प्रदर्षनी भी थी।
 छायाचित्र कला में रमते, उसी में अपना आपा तलाषने वाले छाया चित्रकार महेष स्वामी ने आग्रह कर प्रदर्षनी अवलोकन की नूंत दी तब मन में कुछ पूर्वाग्रह थे। इस बात को लेकर कि वहां नया क्या होगा! वही इन्स्टीट्यूट स्थापना और बाद के कुछ आयोजनो के फोटो ही तो होंगें। परन्तु जब छायाचित्रांे का आस्वाद किया तो प्रदर्षित छायाचित्रों की समय संवेदन दृष्टि ने सोच की नयी दीठ भी दी। लगा, छायाचित्र स्मृतियों के साथ अपने भीतर की भूलभुल्लैयों में भटकने का लूंठा-अलूंठा लेखा है। वहां दूसरों का अतीत आपको अपने अतीत में झांकने का अवसर भी देता है। भले छायाचित्रों में चीजें, स्थान और घटनाएं स्थिर हों परन्तु अंतर्मन संवेदनाओं को वे चलायमान करती है। एम.एन.आई.टी स्थापना, बाद के आयोजनों और वहां पढ़ने वालों की गतिविधियों से जुड़े बहुतेरे चित्रों में औचक एक उस चित्र पर नजर ठहर जाती है जिसमें दूर तक विराने के बीच बिखरी पड़ी इंटे पड़ी है। उजाड़ में निर्माण की आहट सुनाती। ऐसे ही एक में मदनमोहन मालवीय दिखाई दे रहे हैं, जिनकी स्मृति मंे इस संस्थान की स्थापना का आगाज हुआ है तो कुछ में किसी एक बैच का समूह चित्र और उसमें झांकते चेहरों का उजास दिख रहा है। संस्थान की खेल, षिक्षण गतिविधियों के साथ समय प्रवाह में बैच मिलन के वह चित्र भी हैं जिनमें समय के धूंधलेपन को हटाता अचरज और बरसों बिछोह के बाद मिलन के सुख को संजोया गया है।
बीते कल के साथ आज के भी कुछ चित्र हैं-संगीत की सुरमयी सांझ के, पेड़ की छांव तले सुस्ताते छात्रों के और फोटोग्राफी क्लब से जुड़ी छायाचित्र कला के। सभी में छायाचित्र कला की सूक्ष्म संवेदात्मक दृष्टि है। इन्हें देखते यह अहसास भी बार-बार हुआ कि यह फोटोग्राफी ही है जो माध्यम, चीजों, तथ्यों, घटनाओं और प्राकृतिक आभाष को दिखाते इन सबकी अनुभूतियों से भी हमें सराबोर करती है। यह भी कि कैमरानुमी यंत्र समय का अपने तई सृजन की दीठ से पुनराविष्कार करता है तो प्रकृति, घटनाएं, तथ्य और चीजें एक खास ढंग में रूपान्तरित होकर हमारे समक्ष उद्घाटित होती है। हमारे अवचेतन मन को झिंझोडती है और दिख रहे दृष्य के साथ देखने वाले की स्मृतियों का वातायन भी खोल देती है। महेष स्वामी छायाकला की गहरी संवेदन दीठ लिये रचनाकार हैं। छायाचित्र प्रदर्षनी अवलोकन करते ही पता चला कि यह उनकी ही परिकल्पना थी कि एमएनआईटी गोल्डन जुबली समारोह में पृथक से एक फोटो प्रदर्षनी भी हो। उनकी सूझ ही कहूंगा कि प्रदर्षित छायाचित्रों में अतीत से जुड़ी यादों के श्वेत-ष्याम चित्रों का भी डिजिटिलाईजेषन कर उन्हें इस खूबसूरती से फ्रेमिंग कर प्रस्तुत किया गया था कि समय संवेदना से जुड़ विगत वर्तमान में जीवन्त हो गया था।
निर्मल वर्मा का लिखा याद आ रहा है, ‘स्मृति की यह विषेषता ही है कि वह अपने पीछे कोई पदचिन्ह नहीं छोड़ जाती-वह स्वयं पद चिन्ह बन जाती है, परम्परा का मतलब इन पदचिन्हों पर चलकर उस वर्तमान को परिभाषित करना है जहां मनुष्य आज जीवित है।’ उनके कहे में यह मिलाने की धृष्टता कर देता हूं कि छायाचित्र स्मृति के वह पद चिन्ह हैं जो समय प्रवाह को रेखांकित करते हमारी स्मृतियों को अलंकृत कर उसे वर्तमान से जोड़ते हैं। आप क्या कहेंगे!


"डेली न्यूज़" में प्रति सप्ताह शुक्रवार को एडिट पेज पर  प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" दिनांक 21.9.2012

Friday, September 14, 2012

मांड में संस्कृति का उजास


मधुर और श्रृंगारिक राग है मांड। आरोह-अवरोह में वक्र सम्पूर्ण राग। समय का कहीं कोई बंधन नहीं। जब चाहे, तब गायें। संगीत की विष्णु नारायण भातखंडे की परम्परा की मानें तो मांड राग बिलावल थाट में आता है परन्तु सुनते हैं तो मांड का लोक संगीत मिश्र राग में ध्वनित होता लगेगा। स्व. अल्लाह जिलाई बाई का ‘पधारो म्हारे देस...’ तो का पर्याय ही हो गया है। उनके स्वर माधुर्य में न जाने कितनी बार इसे सुना और हर बार सुनने का सर्वथा नया आनंद मिला। 
मांड को यहां याद करने की वजह है, पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र में संगीत नाटक अकादेमी द्वारा आयोजित मांड समारोह। इसमें मांड गायकी पर व्याख्यान भी हुए और कलाकारों ने मांड के भिन्न रूप भी प्रस्तुत किये। मांड सुनने का हाल यह था कि लगातार तीन दिन प्रेक्षागृह श्रोताओं से खचाखच भरा रहा। माने लोक संगीत की जड़ें अभी भी हरी है। आखिर यह लोक संगीत ही है जो सहज मानवीय संवेदना से जोड़ता हमें अपने आपे से रू-ब-रू कराता है। और मांड तो राजस्थान के लोक का आलोक है। 
लोकगीत की स्वर लहरियों में निषाद का प्रयोग भी मांड में गजब का होता है। अल्लाह जिलाई बाई, गवरी देवी, मांगी बाई की निषाद प्रयोग की मांड सुनते गले का उनका कंपन मन में गहरे से बस जाता है। जवाहर कला केन्द्र में ‘महला री खिड़की खोलो..., ‘जला रे...’छप्पड़ पुराणा पड़ग्या, तिड़कन लाग्या बांस...’ मांड सुनते मन में यह खयाल भी बार-बार आ रहा था कि यही वह लोक संगीत है जिसमें बिछोह, श्रृंगार, सौन्दर्य के भाव गहरे से सजते हैं। सुनने के बाद भी गान से हम उबर ही कहां पाते हैं!
बहरहाल, यह मांड ही है जिसमें राजस्थान के विभिन्न अंचल अपनी संस्कृति में ध्वनित होते है। माने बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, सीकर, उदयपुर, जोधपुर की मांड गायकी में स्थान-विषेष के लोगों के रीत-रिवाज और संस्कृति के साथ ही वहां की बोली की झलक भी अलग से ध्यान खींचती है। मांड के माधुर्य में रमते ही कभी राजा-महाराजाओं ने रियासतों में गुणीजन खानों की स्थापना कर वहां बाकायदा मांड के प्रषिक्षण की भी पहल की। बीकानेर और जोधपुर के गुणीजनखानों से ही अल्लाहजिलाई बाई और गवरी देवी सरीखी स्वर कोकिलाएं हमें मिली। मारवाड़-मेवाड़ की मांड गायकी का अपना अंदाज है। अरसा पहले उदयपुर की ख्यात मांड गायिका मांगीबाई से जयपुर में ही लम्बा संवाद हुआ था तब उन्हें सुना भी था। याद पड़ता है, अस्सी पार मांगीबाई ने ‘बायरियो’ सुनाया था। उनके कंठ माधुर्य में मेवाड़ी संस्कृति का उजास भी जैसे दिखाई दे रहा था। अल्लाहजिलाई बाई ‘पधारो म्हारे देस...’गाती तो पावणों की मेजबानी की राजस्थानी संस्कृति के दृष्य चितराम भी अनायास आंखों के सामने घुमने लगते हैं। ‘सुपनो,’ ‘हेलो, ‘जल्ला’, ’ओळ्यू’, ‘कलाली’, ‘कुरंजा’ गीतों को सुनेंगे तो राजस्थान की संस्कृति के अनूठे चितराम, परम्पराएं भी आंखों के सामने जैसे तैरने लगेगी। यही तो है लोक का वह माधुर्य जिसमें सुना ही नहीं जा सकता, सुनते हुए देखा भी जा सकता है। 
यूं शब्द व्याख्या करेंगे तो मांड का सामान्य अर्थ होगा-मांडना, अंकित करना। मांड सुनते हैं तो गान के सुर मन में कहीं गहरे से अंकित ही तो होते हैं। आखिर ऐसे ही तो अंकित नहीं है मन में लोक गायिका धीरा सेन की वह मधुर गायकी। याद पड़ता है, वह काॅलेज के दिन हुआ करते थे। तब आकाषवाणी बीकानेर में अस्थायी उद्घोषक का कार्य भी करता था। राजस्थानी लोकगीतों का बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम ‘गुंजे गांव गुवाड़’ प्रस्तुत करते हर सप्ताह उसकी शुरूआत धीरा सेन के ‘काळो जी काळो, कईं करो सहेल्या ए...’ से ही करता। इस लोकगीत में ‘उभण तो उजास बरण्यो, गांया रा गुवाड़ चाल्या, पंछिड़ा महाराज चाल्या..’ बोल सुन सब कुछ भूल जाता। आंखों के सामने गांव के गोबर लीपे घरों की ओर लौटती धूल उड़ाती गायों के दृष्य और एक अजीब सा अपनापा तैर जाता। बनावटी रहित परिवेष का अपनापा।... असल संगीत यही तो है। अपने आपे से साक्षात् आखिर इस सगीत के उजास से ही तो हो सकता है! 


Friday, September 7, 2012

दृष्य यथार्थ में अंतर्मन संवेदना के बिम्ब


कलाकारों से बिछोह का यह दुखद काल है। कुछेक वर्षों के अंतराल में ही कृपालसिंह शेखावत, द्वारकाप्रसाद शर्मा, ज्योतिस्वरूप, डॉ. प्रेमचन्द गोस्वामी, सुमहेन्द्र और कुछ दिन पहले पी.एन. चोयल जैसे कला स्तम्भ हमें छोड़कर चले गये। मुझे लगता है, इनके साथ ही राजस्थान की कला के जैसे एक युग का अवसान हो गया है। पी.एन. चोयल राजस्थान के ऐसे कलाकार थे जिन्होंने अपने दौर में चित्रकला में नवीनता का सूत्रपात किया। यह नवीनता कैनवस पर फॉर्म को लेकर ही नहीं थी बल्कि इतिहास, संस्कृति और सभ्यता के नए सृजन संदर्भ लिये थी। कभी अपने चित्रों को उन्होंने ‘फोटो रियलिज्म’ की संज्ञा दी थी। शायद इसलिये कि अपने उकेरे चित्रों में वह दृष्य यथार्थ के साथ अंतर्मन संवेदनाओं के गहरे बिम्ब रखते थे। खैर, यह उनके कार्य के आरंभ के दिनों की बात है। बाद के उनके काम को देखंे तो यह सहसा ही यह अहसास होता है कि चोयल के चित्र संरचना और रूपाकारों में देष की कला धारा से सर्वथा पृथक अपनी मौलिक पहचान लिये थे। उनके चित्रों में वाष और टेम्परा की एप्रोच भले रही हो परन्तु जड़त्व से मुक्त उन्होंने अपने तई चित्रों की नई शैली ही एक प्रकार से विकसित की। यह शैली ऐसी थी जिसमें रेखीय न्यूवता में धुमिल होते रंगो में स्मृतियों, भीतर की सोच और अनुभवों का अनूठ ताना-बाना कैनवस को समृद्ध करता था।
पी.एन. चोयल की कलाकृतियां देखता हूं तो औचक यह विचार भी जेहन में कौंधता है कि रूप-अरूप, अंतरंग-बहिरंग से परे वह जो बनाते थे उसमें देखे हुए यथार्थ के साथ कहन का वह मुहावरा था जिसमें चित्र धुंआ-धुंआ होते परिवेष में देखने वाले की सोच में रच-बस जाता। भैंसो की उनकी चित्र श्रृंखला को ही लें। भैंसों की शरीर संरचना के साथ उनकी गति, मस्ती और विचरण की आवारगी के कोलाज मन में इस कदर बस जाते है ंकि एक बार नहीं, बार-बार उन्हें देखने का मन करता है। भैसों के चित्र ही क्यों, आकृतिमूलक उनके तमाम जो दूसरे चित्र हैं उनमें अनुभव और स्मृतियों का अपनापा गहरे से ध्वनित होता है। इसीलिये कि वहां दृष्य यथार्थ की बजाय सौन्दर्य की कला दीठ सर्जक बनी है। उनके चित्रों में स्वयं उनकी अभिव्यक्ति की छटपटाहट के साथ ही समय से उपजे तनावों को भी स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। कभी उन्होंने अपनी एक कलाकृति में नारी देह से निकलती आग की लपटों को नियंत्रित करते घोड़े को रूपाकार दिया तो ऐसे ही ‘घुंघट’ श्रृंखला के अपने चित्रों में नारी की भोग्या स्थिति के जरिए स्त्री के देह के दर्शन को जैसे उभारा है। पौराणिक प्रसंगों के उनके चित्रों में, चाहे वह कृष्ण एवं अर्जुन संवाद हो या फिर रावण वध हो-इनके पार्श्व में नारी की दयनीय स्थिति भी अलग से उभारी दिखाई देती है।  
बहरहाल, पी.एन. चोयल ने नारी संवेदनाओं को ही अपने कैनवस पर सांगोपांग ढंग से नहीं उभारा है बल्कि उनके कैनवस में उभरी इतिहास प्रसिद्ध इमारतें भी अलग से आकृष्ट करती है। याद पड़ता है अर्सा पहले उनकी ‘परसेप्शन ऑफ चित्तौड़’ श्रृंखला चित्रों को देखते हुए मन उनमें जैसे रम सा गया था। धुंध के आवरण से धीरे-धीरे स्पष्ट होती चित्तौड़ के किले, वहां के महलों की आकृतियांे के भग्नावशेष के यथार्थ चित्रण के बावजूद उनमें कला के लोक का आलोक ऐसा है, कि मन उन आकृतियों पर ही भटकने लगता है। यह उनकी कला का वह सौन्दर्य ही तो है जो जिर्ण-शीर्ण और खंडहर होती आकृतियो में भी जैसे जान डालता है। चाक्षुस यथार्थ की उनकी कलाकृतियां में एन्द्रिक बोध होता है। रेखांकन इतना सधा हुआ कि उकेरी आकृतियां और उनका अहसास मस्तिष्क पर छा जाता है। सादगी भरे रंगों के अंतर्गत काले, भूरे, मटमैले रंगों के साथ ही उन्होंने चटख रंगों का जैसा प्रयोग किया है, उससे उनकी संवेदनाएं पूरी तरह से दर्शक के सामने उभरकर सामने आती है। यह जब लिख रहा हूं, रंगो को ब्रश से कैनवस पर लगाने की बजाय बहाकर लगाने की उनकी तकनीक से सृजित उनके बहुतेरे चित्र ही जेहन में कौंध रहे हैं। 

Friday, August 31, 2012

सभ्यता-संस्कृति की छाया कला दीठ



विश्व की प्राचीनतम और अब तक निरंतरता रखने वाली सभ्यता और संस्कृति में भारत के साथ चीन भी शुमार है। यह चीन ही है जिसका  लिखित इतिहास चार हजार वर्ष से भी पुराना है। माने अधुनातन विकास से ही नहीं अतीत की कला, साहित्य और संस्कृति से भी चीन अत्यधिक समृद्ध है। संस्कृति की उसकी निरंतरता को वहां के जन-जीवन, स्थापत्य, संगीत, नृत्य और तमाम दूसरी कलाओ में गहरे से अनुभत किया जा सकता है।
बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र में पिछले दिनों चीन की सभ्यता एवं सस्कृति से साक्षात् कराते नारायणी गुप्ता के छायाचित्रों की प्रदर्षनी लगी थी। सुखद यह था कि इसमें चीन के कलात्मक जीवन के किसी एक पहलू की बजाय तमाम आयामों को नारायणी ने अपने कैमरे की अपनी आंख से पकड़ते उसे सार्वजनीन किया है। 
मुझे लगता है, छायाकला रूपों की मौन मुखराभिव्यक्ति है। इसमें देखना ही महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि दृष्य के भीतर निहित सौन्दर्य की दीठ भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। यह छायाकला ही है जिसमें अंतर्मन संवेदना के जरिये छायाकार बहुतेरी बार दृष्य मंे निहित सौन्दर्य को कईं गुना अधिक सघनता से मुखरित कर देता है। तब यथार्थ दृष्य की बजाय उसका कैमरे की आंख का संवेदन रूपान्तरण अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। नारायणी के छायाचित्रों के साथ यही है। वह देखे हुए दृष्यों की विषय-वस्तु के साथ घटना की संवेदना, क्षण की अपूर्वता और उसमंे निहित गति को अपने कैमरे में भीतर की अपनी संवेदना से पकड़ती है। इसीलिये बहुतेरी बार साधारण दृष्य भी उसके छायाचित्रों में संवेदना की छाया-कला दीठ से असाधरण प्रतीत होने लगते हैं। मसलन उसकी इस छायाचित्र प्रदर्षनी में एक दृष्य है सुन्दर से एक पूल का। चाईना के इस ब्रिज का नारायणी का कैमरा फ्रेम दृष्य में निहित सौन्दर्य को कईं गुना अधिक उद्घाटित करता है। इस तस्वीर में छाया-प्रकाष प्रभाव, कोण, दृष्य माप और गति का संतुलन अद्भुत है। पानी में उभरती ब्रिज की छाया और ठीक ब्रिज के नीचे चलती नाव और ऊपर पर्यटकों की रेलमपेल। देखता हूं तो, दृष्य संयोजन की यह दीठ मुग्ध करती है। आकाष की निलाई के साथ दृष्य संयोजन में नारायणी की छाया-कला सूझ को इस चित्र में गहरे से पहचाना जा सकता है। 
बहरहाल, दृष्य संवेदन के ऐसे ही छायाचित्र और भी हैं। संघई के सुप्रसिद्ध बौद्ध मंदिर में बुध की लेटी हुई प्रतिमा के चित्र को ही लें। इसमें नारायणी ने लेटे हुए बुद्ध के मौन और निर्वाण को गहरे से मुखरित किया है। खास बात यह कि प्रतिमा के साथ आस-पास का शांत परिवेष भी यहां उद्घाटित है। एक छायाचित्र में सिंघई के पुराने घरों का दृष्य है तो एक में कला संग्रहालय के संस्थापन का दर्षाव अतीत के साथ अधुनातन संस्कृति से रू-ब-रू कराता है। सिंघई के एंटिक बाजार में इमारतों का वास्तु षिल्प भी मन मोहता है। यह नारायणी के कैमरे की आंख की वह संवेदना ही है जिसमें बाजार की इमारतों से निकले छज्जों को परस्पर मिलाते वहां के वास्तु सौन्दर्य की सूक्ष्म अभिव्यंजना की गयी है। मुझे लगता है, वह छाया चित्रों में दृष्य के साथ तमाम उसकी दूसरी संभावनाओं को भी अपने कैमरे से पकड़ती है। ऐसा ही एक चित्र है छोटे से एक बच्चे का। चाईना के भविष्य से अभिहित इस छायाचित्र में सीढ़ियां, बच्चे की मासूमियत और भयमुक्तता के बहाने दृष्य के गहरे संवेदन आयाम हैं। दृष्य संवेदना की दीठ ही तो है छायाकला! टाईनामेन स्कवायर, चीन की दीवार, संगीत, नृत्य और चित्रकलाओं के साथ ही आधुनिक चीन के विष्व सरोकारों को भी बहुत से चित्रों में अभिव्यंजित किया गया है। कोई संस्कृति कैसे बरसों-बरस अपनी निरंतरता बनाये रखती है, कैसे वह संस्कारित होती है और कैसे उसमें कलाओं की अनुगूंज को सुना जा सकता है, नारायणी के छायाचित्रों में इसे गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। सोचता हूं, चीन की सभ्यता और संस्कृति के साथ ही नारायणी की छाया कला दीठ की भी तो संवाहक है यह छायाचित्र प्रदर्षनी। आप क्या कहंेगे!