Friday, May 21, 2010

दृश्य यथार्थ का नया मुहावरा बनाते चित्र

अमित कल्ला ने सम-सामयिक कला में इधर अपनी सर्वथा नयी पहचान बनायी है। अभिनव अंतर्दृष्टि और तकनीक की सुस्पष्टता के साथ ही सौम्य, संवेदी और अबाध रेखाओं के उसके चित्रों में परिकल्पित रंग संयोजन भी अलग से ध्यान खींचता है। लगभग सभी चित्रांे में हरे, नीले, काले, पीले, लाल आदि सभी रंग हल्के, ऐंद्रिक और नियंत्रित हैं। शास्त्रीय परिवेश में आधुनिकता को परोटते अमित अपने चित्रों के प्रतीक और बिम्बों के जरिए जैसे खुद के सर्जक मन की आकांक्षाओं की तीव्रता का उद्गार करते है।

कुछ साल पहले जयपुर में ही अमित के घर पर बने स्टूडियों में कवि, आलोचक नंदकिशोर आचार्य एवं प्रयाग शुक्ल के साथ जाना हुआ था। उसकी कलाकृतियों में अंतर्निहित शक्ति, एंेद्रिकता और वस्तुपरकता ने पहले पहल तभी प्रभावित किया था। बाद में तो कला प्रदर्शनियों और अन्य संदर्भों में निरंतर उसकी कलाकृतियों से साक्षात्कार हेाता रहा है। हर बार उसके चित्रों की तात्विकता और निजता ने आकर्षित किया है। अमित के चित्रो में स्वर लहरियों का उभरता अमूर्तन भी बेहद आकर्षक है। आरोह-अवरोहण के ऐसे ही उसके एक चित्र में काले, पीले, नीले और लाल रंग से उभरते रंगीय थक्कों में आकाश और पृथ्वी की ऊर्जा के प्रतीक के रूप में उभरते ग्रह, नक्षत्र, तारे, चांद और भिन्न आकृतियो के फूलों में सर्वथा नया अर्थोन्मेष हैं। यहां सफेद पिरामिड में उभरते बिन्दु कैनवस की अनंत ऊर्जा के  जैसे संवाहक बने हैं। उनका यह चित्र ऐसा है जिसमें प्रकृति और जीवन का संगीत है। रंगों के प्रवाह में जीवन को गहरे अर्थों में व्याख्यायित करते ऐसे ही उसके दूसरे चित्रों में मोरपंख, प्रवाल भित्तियां, शंख, सीपी और आदिवासी कला की मांडनाकृतियां सरीखे बिम्ब और प्रतीक दृश्य यथार्थ का नया मुहावरा बनाते हैं।

अमित ने कभी एनर्जी चित्र श्रृंखला बनायी थी। इसमें आकृतियों की जकड़न है परन्तु तकनीकी की जटिलता नही है। गहरे नीले रंग की एक दूसरे से गुत्थमगुत्था होती आकृतियों की ज्यामितीय संरचना में मौलिकता में अनूठी कल्पनाशीलता है। ऐसे उसके चित्रों की जटिल संरचनाओं में भी रेखाएं सौम्य, संवेदी और अबाध रूप में प्रवाहपूर्ण है। व्यक्तिगत मुझे लगता है, अमूर्तन में स्पष्टता लिए उसके चित्रों में अनूठी गीतात्मकता है।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक २१-५-2010

Friday, May 14, 2010

अमूर्तोन्मुख आकृतियां का कला दस्तावेज

कला रूप और अंतर्वस्तु का सम्मिश्रण है। कोई कलाकृति जब हमें अपने रूप सौन्दर्य से आकृष्ट करती है तो सहज ही मन में अवर्णनीय उल्लास, उमंग की अनुभूति होती है।...कलादीर्घाओं में प्रदर्शित कुछ कलाकृतियां अन्तर्मन में बस जाती है परन्तु समय के अन्तराल के बाद कला और उससे संबंधित कलाकार हमसे दूर होते चले जाते हैं। इस दूरी को कम करने की दृष्टि से ही ललित कला अकादमियां द्वारा महत्वपूर्ण कलाकारों पर मोनोग्राफ प्रकाशित करने की परम्परा रही है। इधर इस प्रवृति में लगभग सभी स्तरों पर शिथिलता सी आ गयी है।

राज्य ललित कला अकादमी, उत्तरप्रदेश ने पिछले दिनों जब देश के चर्चित कलाकार, कला आलोचक अवधेश मिश्र लिखित मो. सलीम का मोनोग्राफ प्रेषित किया तो औचक ही अकामियों द्वारा प्रकाशित मोनोग्राफ परम्परा पर फिर से जैसे ध्यान गया।

समकालीन कला के देश के महत्वपूर्ण सैरां (दृश्य) चित्रकार मो. सलीम का मोनोग्राफ देखता हूं। नजर मोनोग्राफ मंे प्रकाशित उनके बनाए प्रकृति लैण्डस्केपों पर जाती है। रंगों का सुगठित संयोजन। रेखाओं की बारीकियां। पहाड़, पहाड़ी जीवन को आत्मसात करती अमूर्तोन्मुख आकृतियां। प्रकृति दृश्यावलियों के अंतर्गत बिम्बों में उन्होंने रंगों का अनूठा लोक रचा है। ऐसा, जिसमें खुद उनकी स्मृतियां जैसे झांक रही है। अवधेश ने उनके जिन चित्रों का चयन मोनोग्राफ में किया हैं, वे उनकी सात दशकों की कला यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव लगते हैं। नीले, हरे, लाल, पीले रंगों की अप्रत्याशित, स्तब्धकारी छटाएं सलीम के इन चित्रों में हर ओर, हर छोर है। जल रंगों में उनके लैण्डस्केप अवधेश मिश्र के शब्दों में अनुभवातीत रागात्मकता लिए पहाड़ी जीवन को वृहद, भव्य और सर्वथा नया अर्थ देते हैं।

मो. सलीम के रेखाचित्रों, उनके तैल, जल एवं एक्रेलिक रंगों की कलाकृतियों और समग्र कलाकर्म पर अवधेश मिश्र ने बेहद संजिदगी से लेखन किया है। वह सलीम के कलाकर्म की गहराईयों में गए हैं। रंगों की उनकी तानों और संयोजन की संवेदना को मोनोग्राफ में एक तरह से जीते अवधेश ने हिन्दी में जो लिखा है, उसका उसी गंभीरता से मोनोग्राफ में डॉ. लीना मिश्र ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है। सरकारी प्रकाशनों की लीक से अलग बहुरंगी इस मोनोग्राफ का सधा हुआ ले आउट भी अलग से आकर्षित करता है। ऐसे दौर में जब कला अकादमियां में प्रकाशन की प्रवृतियां धीरे-धीरे समाप्त सी होती जा रही है, क्या यह सुखद नहीं है कि कोई अकादमी कलाकार के जीवन को उसके रचनाकर्म से यूं उजागर करे!
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक १४-५-१०

Friday, May 7, 2010

तपःपूत जीवन का सांगीतिक आस्वाद

संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्र आदि समस्त कलाओं के बारे में जब भी मन में विचार आता है, मुझे लगता है सभी एक दूसरे मिली हुई है। एक दूसरे के बिना उनका काम नहीं चल सकता। कलाओं के आपसी रिश्तों को निश्चित किसी प्रकार की व्याख्या भले ही नहीं दी जा सकती हो परन्तु संगीत, नृत्य, अभिनय और चित्रों में परस्पर अनूठा सहकार होता है। कलाओं के अन्तर्सम्बन्धों पर इस प्रकार से जब भी विचार होता है, रवीन्द्रनाथ टैगोर का व्यक्तित्व जेहन में कौंधने लगता है। मुझे लगता है, कला और संगीत के क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात करते रवीन्द्रनाथ ने जो किया वह कोई और नहीं कर सकता।

बहरहाल, रवीन्द्र ने कविताएं लिखी, नाटक और उपन्यास लिखे, हजारों हजार गानों की रचना की, चित्र बनाए और अपने तपःपूत जीवन के अनुभवों को निरंतर सांगीतिक आस्वाद दिया। किशोरी चटर्जी से सीखे गीतों को उन्होंने अपने मधुर कंठ से साधा और सबसे बड़ी बात यह कि कीर्तन, सारिगान, बाउल में तो उन्होंने जो किया, वह कला जगत कभी भुला नहीं पाएगा।

रवीन्द्र कहते थे, ‘मैं गान के सब्दों को सुर पर प्रतिष्ठित करना चाहता हूं।...मैं शब्द की अभिव्यंजना के लिए सुर संयोजित करना चाहता हूं।...संगीतवेत्ताओं से मेरा निवेदन है कि किस-किस सुर के किस प्रकार विन्यास से कौन-कौन से भाव प्रकट होते हैं और उनकी अभिव्यक्ति क्यों होती है-उसके विज्ञान का अनुसंधान करे।’ रवीन्द्र जब यह कहते हैं तो अनायास ही ध्यान उनके बनाए गीतों और उन चित्रों पर जाता है जिनमें सहज सांगीतिक आस्वाद है। बहुत बाद में उन्हांेने चित्र बनाने प्रारंभ किए थे परन्तु उन्होंने चित्रों की अपनी संवेदना में जीवन और प्रकृति के जो रूपाकार बनाए वे मन को उल्लसित करते प्रकृति और जीवन के रिष्तों को ही जैसें बंया करते हैं। उनके चित्रों की नारी आकृतियों में प्रकृति का अनूठा लोक है। रंगों का उत्सव है। कोमल रेखाएं और उनका गतिषील प्रवाह उनके चित्रों की बड़ी विषेषता है। मन के भीतर की उमंग, उल्लास और उमंग को प्रकृति से जोड़ते उन्होंने जो नारी आकृतिया बनायी वे देखने वाले से जैसे संवाद करती है।

अपने चित्रों के बारे में वे कहते भी थे, ‘मैं अपनी धुन के अनुसार ही चित्र बनाता हूं। बस हाथ में रंग या कागज हो और मन में उमंग, फिर क्या कहने हैं। मन तूलिका और रंगो से खेलने लगता है और इसी तरह मेरे चित्र बनते हैं।’ सच ही तो कहते हैं रवीन्द्र। पूर्व निश्चित कुछ सोच कर उन्होंने कभी चित्रों का निर्माण नहीं किया। अक्सर लकीरें गोदते हुए ही वे बहुत कुछ महत्वपूर्ण बना देते। ऐसा ही उनके संगीत के साथ था। वे संगीत सुनते, उसे गुनते और ऐसे ही बहुत सी संगीत रचनाओं का उनसे अनायास ही जन्म हो गया।...और यह भी क्या महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी संगीतकार के नाम पर कहीं पर भी संगीत नहीे मिलता जबकि रवीन्द्र ऐसे हैं जिनके नाम पर रवीन्द्र संगीत का गान होता है। उनके भीतर के कलाकार का इससे बड़ा परिचय और क्या हो सकता है!

‘डेली न्यूज में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश  कुमार व्यास का कॉलम ‘कला तट’ दिनांक 7.5.2010

Saturday, May 1, 2010

रंग संवेदना में उभरती अर्थ छवियां




कैनवस पर रंगों का जैसे मेला लगा हुआ है। हरा, नीला, लाल, काला, पीला और इन सबसे निकले दूसरे भी बहुतेरे रंग। उत्सवधर्मिता जताते। हर ओर, हर छोर। रंगों का सांगीतिक आस्वाद।... सब कुछ तरतीब से और थोड़ा साब बेतरतीब भी।... यह बेतरतीब क्यों? दीपक शिंदे कहते हैं, ‘यह कैनवस की सहजता है। आसमान में नजर दौड़ाएं, वहां भी कहीं कोई स्पेस अलग दिखायी देगा ही।...मेरे कैनवस का सच भी यही है। यह जो बेतरीब उभरा है, उसे चाहकर भी मैं तरतीब से नहीं कर सकता।...मुझे नहीं लगता यहां, ब्रश से कुछ किया जा सकता है।’

बहरहाल, समकालीन कला परिदृश्य में दीपक शिंदे ने इधर शेर, बंदर और दूसरे बहुतेरे पशु-पक्षियों की आकृतियों और उनके व्यवहारों को कैनवस पर सर्वथा अलग अंदाज में रूपायित किया है। उनके इधर बनाए काम को देखने व्योम आर्ट गैलरी में लगे अखिल भारतीय कला शिविर में पहंुचता हूं। वह कैनवस पर मनोयोग से लगे हुए हैं। कैनवस पर हरे, नीले, सफेद और काले रंगों के मेल से जो आकृति उभरी है, वह बाघ की है, इस आकृति के साथ ही उड़ती हुई एक चिड़िया भी अनायास ध्यान खींचती है। दृष्टियों की बहुलता में पृष्ठभूमि में बिखरे रंग भी जैसे बहुत कुछ कह रहे हैं। पेड़-पौधे, जंगल की नीरवता, वहां का एकांत और प्रकृति की सुरम्यता-अमूर्तन में यहा बहुत कुछ है। उनके अमूर्तन मंे विशिष्ट अर्थ छवियां हैं। ये ऐसी हैं जिनमंे रंग अपने होने को सार्थक करते जैसे देखने वाले से संवाद करते हैं। मुझे लगता है, अन्तर्मन अनुभूतियों को वे रंगों से जताते खुद भी उनमंे खो से जाते हैं। चटख होने के बावजूद उनके बरते रंगों में गजब का संतुलन है। लगता है, रंगों के साथ उभरती पशु-पक्षी आकृतियों मंे आकारों के तुमुल के बाद वह उनकी सादगी पर गए हैं।

शिंदे पहले से यह तय नहीं करते कि कैनवस पर क्या कुछ बनाया जाना है। जो कुछ घटित होता है वह कैनवस पर ही होता है। ऐसे मे ऐन्द्रिकता को रूपायित करते शिंदे उस अव्याख्यायित सौन्दर्य का भी सर्जन करते हैं जिसमें माध्यम से अधिक आशय की अर्थवत्ता होती है। गहन आशयों से उत्प्रेरित रंग मूर्त और अमूर्तन में जैसे यहां जीवन को नया अर्थ देते हैं। बौद्धिक रचनात्मकता में दीपक कैनवस पर नये नये रंग प्रभावों को आजमाते हैं, उनकी प्रभावशीलता में जाते हैं। ऐसा जब वह करते हैं तो रंग उत्सवधर्मिता के संवाहक बनते देखने वालों को सुकून प्रदान करने लगते हैं। और सबसे बड़ी बात यह भी है कि अमूर्तन में रंग संवेदना का सर्वथा नया मुहावरा गढ़ती उनकी कला में आधुनिकता है परन्तु उससे पैदा विभम्र नहीं है। मुझे लगता है, यही उनके चित्रों की वह विशेषता है जो उन्हे ओरों से जुदा करती है।
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 30 अप्रैल 2010

Friday, April 23, 2010

परम्परा में आधुनिकता का ताना-बाना

सामान्य अनुभवों को समय के तात्कालिक संदर्भों में कलाकार जब रूपान्तरित करता है तो स्वाभाविक ही है कि दर्शक में एक तटस्थ एवं निस्संग अभिरूचि उत्प्रेरित होती है। ऐसे में बहुतेरी बार होता यह भी है कि कलाकृति में अभिव्यक्त वस्तुएं कला की दीठ से अद्वितीय रूप ग्रहण करती आनंदानुभूति कराने लगती है। इस आनंदानुभूति में कलाकृति तब वैचारिक स्तर पर विमर्श की नयी राहें भी खोलने लगती है।
अभी बहुत समय नहीं हुआ, गौरीशंकर सोनी की कलाकृतियों का आस्वाद करते लगा, वह चित्रो मे आधुनिक और पारम्परिकता के बीच के संघर्ष का ताना-बाना अपनी कलाकृतियों में कुछ इस गहराई से बुनता है कि चित्र देखने वाले के विचारों में भी उथल-पुथल मचा देेते हैं। हल्की रस्सी के साथ दो अलग हुई परतों की आकृतियों की खींचतान के उसके चित्रो में उभरा द्वन्द और बीच में गोले अनायास ही देखने वाले को कुछ सोचने को मजबूर करते हैं और कैनवस पर बरते उसके रंगों के पार्ष्व में उभरती आकृतियां जैस चित्रकला की भारतीय परमपरा से साक्षात् कराती है।
चित्रो में विषय को जीते गौरीषंकर की आकृतियों मे पंरतों का टूटना, रंगो का गहरे से हल्के होते जाना और पार्ष्व में नियत आकार नहीं होकर अजन्ता, एलोरा के गुफा चित्रों सरीखी उभरती आकृतियों में वह जैसे आधुनिकता और परम्परा का सांगोपांग मेल कराता है। उसके लगभग सभी चित्रों की संरचना में आकृतियां गोल घेरे से कभी बाहर निकली तो कभी उसमें लटकी तो कभी उसमें घूसने का प्रयास करती दिखायी देती है। गोल घेरा चित्रों के केन्द्र में रहता है, बहुत कुछ कहता मानों चित्र के विषय को पूरी तरह से व्यक्त करता मनुष्य के अंतर्द्धन्द को भी बंया करता है।...और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इधर जो चित्र श्रृंखला गौरीषंकर ने बनायी है उसकी पृष्ठभूमि में अंजता के पाषाण सौन्दर्य को गोल घेरे के पार्ष्व में दिया गया है। गोल घेरों से निकलती उसकी आकृतियां यांत्रिक जटिलता और मानव मन की दुरूहता को व्यक्त करती कुछ नहीं कहते हुए भी जैसे बहुत कुछ कहती है। चित्रों में बरते गए उसके रंग विषय को जताने के साथ ही उसके रचनाकार के द्वन्द को भी पूरी तरह से उभारते हैं। कैनवस पर गौरीषंकर बहुत सी परतों का अहसास कराता है। एक दूसरे से अलग होती परत में टूटन है तो जुड़ाव का प्रयास भी है। ऐसे ही रंगों के प्रयोग में खिंचाव और मिलनोत्सुकता को महसूस किया जा सकता है। उसके चित्रों में गति है, विषय का बेहतरीन निरूपण है और हां, रंगो की गहरी समझ का अहसास भी है।
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकशित  डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ ‘कला तट’, दिनांक 23 अप्रैल 2010

Friday, April 16, 2010

नाटक जारी आहे!


नाट्यकला को दृश्य काव्य कहा गया है। दरअसल इसमें यथार्थ की नकल नहीं बल्कि विशेष उद्देश्य से की गयी उसकी पुनःसृष्टि होती है। अनगिनत नाटकों की दर्शकीय दीठ में सदा ही यह महसूस किया है कि नाटक में जीवन का सतही यथार्थ ही प्रतिबिम्बित नहीं होता बल्कि उसमें गहरे नैतिक और सौंदर्यमूलक विवेक से मुनष्य के कार्यों और भावों की, जीवन की विभिन्न अवस्थाओं की कलात्मक कल्पनाशील अनुकृति भी कलाकार करता है। जब तक फिल्मों का दौर प्रारंभ नहीं हुआ था, तब तक नाटक केवल रंगमंच पर ही खेले जाते थे परन्तु अब उन्हें दूरदर्शन, रेडियो, और सिनेमाघारों में भी देखा, सुना जाने लगा है।

बहरहाल, रंगकर्म के कलाकारों की कला को इसी से व्यापक दर्शक मिल गए हैं। रंगकर्म को जीते ईश्वरदत्त माथुर के बारें में जब भी विचारता हूं, मुझे लगता है अभिनय को जीवन दर्शन बनाते उसमें अपने आप को तलाशने की कोशिश उन्होंने की है। मिले तो कहने लगे, ‘नाटक ग्लेमर नहीं, चकाचौंध नहीं, बल्कि साधना है।’ वह जब यह कहते हैं तो अनायास ध्यान उनके इस कला कर्म पर जा रहा है। इब्राहिम अल्काजी, एम. वासुदेव, एच.पी.सक्सेना, रवी झांकल के साथ पारसी रंगमंच की नाट्य परम्परा से लेकर अधुनातन नाटकों को खेलते उन्होंने अभिनय को सदा ही जैसे जिया है। श्याम बेनेगल निर्मित बेहद लोकप्रिय धारावाहिक ‘यात्रा’ में इंजन ड्राइवर के रूप में उन्हें दर्शक आज भी भूले नहीं है तो ‘भारत एक खोज’ में गाए राजस्थान के इतिहास के जरिए उन्होंने जैसे राजस्थान की कला का देशभर में प्रतिनिधित्व किया। ‘पोलमपोल रो खयाल’, ‘पांचवा सवाल, ‘जसमा ओढ़न’, आजादी की नीदं’, ‘भूमिका’ जैसे बहुतेरे नाटकों के साथ ही दूरदर्शन की शुरूआत के दौर में आए ‘दायरे’, ‘भोर’ धारावाहिक और कल्याणी जैसे शिक्षाप्रद कार्यक्रमों में निभाये अपने किरदारों को जैसे उन्होंने अब अपनी पहचान में शुमार कर लिया है। कहते हैं, ‘उन दिनों की बात ही कुछ ओर थी। हम रंगकर्म को जीते थे और रंगकर्म हमें।...’

बहरहाल, उनके साथ दूरदर्शन निर्मित ‘हरित राजस्थान’ की एंकरिंग करते उन्हें निकट से जाना, समझा और तभी पहली बार लगा अभिनय करते वे कला की बारीकियों में खुद को जैसे भूल से जाते हैं। उनके भीतर का कवि, गायक और लेखक भी जैसे तब जाग पड़ता है। शायद इसीलिए कहा गया है, कलाकार जब अपनी कला प्रदर्शित करता है तो भीतर के उसके समस्त रचनात्मक बोध जीवित हो उठते हैं।...और नाटक जारी आहे!

डॉ. राजेश कुमार व्यास का ‘डेली न्यूज’ में प्रकाशित  कॉलम ‘कला तट’ दिनांक 16-4-2010

Tuesday, April 13, 2010

अपने होने से

अपने को पहचानना
अंतर से
अंतरतम तक
अपने से लड़ना है,
ठीक वैसे ही
जैसे आईने में
अपने ही अक्स को देखकर
फड़़फड़ाती है चिड़िया
फड़़फड़ाते ही फड़़फड़ाते
करती है प्रहार,
तब तक
जब तक कि
लहूलुहान
न हो जाए चोंच।
शायद
वैसा ही कुछ
होता है हमारे साथ
कि अपने को
पहचान कर भी
लड़ते हैं हम
अपने होने से।
हाँ,
अपना होना भी
एक संघर्ष है
अंतर से
अंतरतम का,
अतीत से
वर्तमान का।

Monday, April 12, 2010

पर्व के बहाने प्रकृति से जुड़ाव

पर्व के बहाने प्रकृति से जुड़ना कोई हमारी भारतीय परम्परा से सीखे। घुमने की लालसा के लिए नहीं। पर्यटन की प्रवृति के कारण नहीं। मेले के उत्सव में भाग लेने के लिए नहीं बल्कि संस्कृति की परम्परा के पुण्य स्नान के लिए कुम्भ एकत्र करता है समुदाय को एक स्थान पर। कुम्भ पर नदी तट पर एकत्र हो सभी स्नान करते हैं। भगवे वस्त्र पहनें साधु, अमीर, गरीब, स्त्री-पुरूष सभीजन एक हो जाते हैं।

प्रकृति पल प्रतिपल अपना रंग बदलती है। या यूं कहूं कि अपना परिष्कार करती है। हमारी धर्म की परम्पराओं के मूल में भी प्रकृति का यही सूक्ष्म रूप छुपा हुआ है। प्रकृति के साथ व्यक्ति अपने आपको साधे। वह परम्पराओं को ढोए नहीं, उनसे अपने आपको जोड़ता हुआ निरतर अपना परिष्करण करे। कुंभ में स्नान का महात्म्य नदी में नहाना भर नहीं है। नदी के पानी से शरीर को स्वच्छ करना भर नहीं है। शारीरिक शुचिता के साथ मानसिक शुचिता को प्राप्त करना भी हैं। मन को उदार बनाते उसकी शुद्धि करना है। पाप धुलने का अभिप्राय है, आप धुलें।

स्नान करने पर पुण्य मिलता है। धर्म यही कहता है परन्तु उसका मर्म धरित्रि की प्रार्थना से जुड़ा है। प्रार्थना सिर्फ अपने लिए नहीं दूसरों के लिए भी। पुण्य को संजोना है, इस जन्म के लिए नहीं अगले जन्म के लिए भी। यानी अनवरत चलना है यह क्रम। जाने-अनजाने हम जो कुछ गलतियां करते हैं, जो कुछ अनर्थ करते हैं, जो कुछ नहीं करने वाला करते हैं, उनका प्रायष्चित कराता है नदी का स्नान। लोग भोर से पहले ही आकर गंगा और दूसरी नदियों के तट पर एकत्र होने लगते हैं।

कुम्भ में स्नान की मेरी अपनी यादें हैं। हरिद्वार में अलसूबह ही गंगा तट पर परिवारजन एकत्र हो गया। दादी ने सभी को जगाया। कुम्भ स्नान के लिए शायद रात भर वह सोई भी नहीं थी।...सभी को साथ ले नदी तट पर ले आयी थी। अर्सा पहले की बात है यह। मन में उसकी धूंधली याद भर है। भीड़ का रेला लगा था परन्तु फिर भी जैसे हर व्यक्ति अकेला था। इस अकेलेपन में भाव था, अपने आपको शुद्ध करने का। मनसा, वाचा और कर्मणा से। तभी पहली बार लगा था, समूह में उंच-नीच के भाव तिरोहित हो जाते हैं। पहली बार भीड़ में होते हुए भी भीड़ से अलग अकेलेपन का भाव भी तभी लगा था। नदी पर स्नान की परम्परा में सम्मिलित होने की उस याद में पित्तरों के साथ आने वाली पीढ़ी के कल्याण का हरजस भी दादी के मुंह से निकल रहा था। नदी तट पर कमर तक डूबे अभ्यर्थना में उठे हाथ हर ओर हर छोर।

कुम्भ में आपको भीतर और बाहर से शुद्ध करने की मंषा ही दूर दराज से लोगों को एक स्थान पर खींच ले आती है। सूर्य को अर्ध्य देते हाथ। डूबकी लगाकर अपने आपको शुद्ध करने के साथ भविष्य के सद्कर्मों के लिए अपने आपको संकल्पबद्ध करते जन। किसी भी धर्म का यही सबसे बड़ा मर्म है। हम अपने आपका मूल्यांकन करें। अपना आत्मविष्लेषण करें। कुंभ इसी का प्रतीक है।

एक ही घाट पर जाति, सम्प्रदाय के भेदभाव से परे वहां हर व्यक्ति इंसान होता है। सबके लिए उसके भाव सम होते हैं। जाति का वहां कोई बंधन नहीं है। गरीब और अमीर की कोई खाई नहीं है। वय का कोई बंधन नहीं है। सभी एक डूबकी भर लगाने को आतुर। हैं। मन में उठने वाले ईर्ष्या, द्वेष के भाव नदी तट आ जैसे तिरोहित हो जाते हैं। मनुष्य केवल और केवल मनुष्य रह जाता है। स्नान से पहले ही धुलने लगता है मन का मेल। डूबकी लगी नहीं कि उदादत्ता के भाव अपने आप ही जगने लगते हैं।

मुझे लगता है, सांस्कृतिक अस्मिता की अर्थ बहुल ध्वनियां यदि सुननी हो तो एक बार कुम्भ पर्व पर जरूर सम्मिलित होना चाहिए। उत्सवधर्मिता के इस पर्व में मन में उमंग और उत्साह का नया प्रवाह होता है।

नदियों में स्नान की परम्परा शायद इसलिए है कि नदी के प्रवाह से हम सीख ले। कहते हैं जल यदि बहता नहीं है, एक ही जगह रूक जाता है तो संधाड़ं मारने लगता है। ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मंत्र भी तो यही है, ’चरेवैति, चरैवेति....’ अर्थात् चलते रहो। चलते रहो। नदी की तरह। नदियां का प्रवाह जीवन का पर्याय है। शून्य से आती अनंत में समाती नदी। वे बहती हैं तो अपने साथ बहुत कुछ बहा कर ले जाती है। धूल, कंकर, मिट्टी, बड़े पेड़ों के तने और तमाम गंदगी। मुझे लगता है पुण्य सरिताओं के प्रवाह को देखें नहीं उसे सुनें और फिर गुनें। प्रवाह में कितने वेग, संवेग झेलती है नदी। उतार-चढ़ाव में पत्थरों की बाधाओं को पार करती नदियां बहती है। न थकते। कभी मंद तो कभी तेज। नदी का प्रवाह गति में आगे बढ़ता रहता है। जीवन में भी तो यही है। जीवन प्रवाह क्या नदी के समान नहीं है? कितने उतार-चढ़ाव आते हैं। आषाएं-निराषाएं उत्पन्न होती रहती है। संकट आते हैं। दुःख से उत्पन्न होती है पीड़ परन्तु हम कईं बार अपने प्रवाह को रोक देते हैं। दुःखों से घबरा जाते हैं। नदी नहीं घबराती। उसका प्रवाह कम नहीं होता। नदी की शक्ति है उसकी गति। हम गति को कम कर देते हैं। गति को समाप्त कर देते हैं। सोचिए! यदि जीवन में गति ही नहीं रहे तो क्या सब कुछ थम नहीं जाएगा। गति जीवन की सहजता है। गति का अर्थ है चलते रहना। सांस भी तो चलती है। यदि उसका चलना रूक जाए तो!

...तो बहती नदी के प्रवाह को सुनें। उसमें भीगें। कुम्भ से बड़ा और बहाना इसका और हो भी क्या सकता है! कुम्भ स्नान कर जब लौटें तो अनुभूत करें, आप जो पहले थे, अब वह नहीं रहे। कवि घाघ कहता है,

‘क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति वदेव रूपं रमणीयाताः’

अर्थात् क्षण-क्षण में जो वस्तु को अपूर्व सुन्दरता अथवा नवीनता प्रापत होती है, वही रमणीयता का सच्चा स्वरूप है। इसीलिए हर पल, हर क्षण सुंदर है। उसे हाथ से न जान दें। कुम्भ में स्नान का हर क्षण, हर पल रमणीयता प्रदान करता है।

कुम्भ पर विचार करते ही रैदास का किस्सा स्मरण हो आया है, प्रयाग में कुम्भ का मेला भरा था। संत रैदास भी वहां पहुंचे। षिष्यों और उनके भक्तों ने उनका स्वागत किया, आदर-सत्कार किया। प्रयाग के पंडित चिढ़ गए। तय यह हुआ कि दोनों ओर के प्रतिनिधि हाथ में शालिग्राम लेकर गंगा में बहाएंगे। जो सच्चा होगा उसके शालिग्राम तैरते रहेंगे। रैदास की शालिग्राम मूर्ति तैरने लगी। रैदास ने तभी कहा था, ‘मूरती मांहि बसे परमेष्वर तो पानी मांहि तिरै रे।’

कुम्भ यानी घड़ा। जिसमें जल भरा जाता है। कुम्भ के बारे में विचारता हूं तो बहुत से बिम्ब मन में तैरने लगते हैं। एक कुम्भ वह जो अमृत से भरा है। क्षीरसागर के मंथन से निकला। वह जिन जिन स्थानों पर छलका और भूतल पर रखा गया और जिस जिस ग्रह के कालबिन्दु पर रखा गया, उन-उन स्थानों पर उस ग्रहयोग के कालबिन्दु पर प्रति बारह वर्ष के बाद कुम्भ पर्व मनाया जाता है। एक कुम्भ वह है जिस प्रक्रिया में सांस भरकर रोकी जाती है। यह शरीर भी तो कुम्भ ही है। कबीरदासजी तभी तो कहते हैं-

यह तन कच्चा कुभ है, लियां फिरै या साथि।

ढक्का लगा फुटि गया, कछु न आया हाथि।।

अर्थात् यह जो शरीर है वह कच्चा कुभ है, मिट्टी का बना जिसे लिये तूं यूं ही फिर रहा है। धक्का लगते ही यह फूट जाएगा फिर कुछ भी हाथ नहीं लगना है। भावार्थ यह कि भौतिक चीजें यहीं रह जानी है। मिट्टी का बना यह शरीर मिट्टी में ही मिल जाना है।

...तो कुम्भ जीवन चक्र का प्रतीक है। एक फेरे से मुक्ति के बाद दूसरा चक्र प्रारंभ हो जाता है। अमृत का अर्थ है न मरा होने का भाव। शरीर के मरने को एक स्नान के रूप में देखने का भाव। इसीलिए कुम्भ में स्नान किया जाता है। स्नान के बाद व्यक्ति वह नहीं रहता जो पहले था, वह नवीन हो जाता है। कुम्भ का स्नान तन और मन दोनों की ही शुद्धि का पर्व है। आस्तिक ही नहीं नास्तिक भी निस्पृह भाव से नदियों में स्नान करते हैं। स्नान करते अपने आपको नवीन करते हैं। पुराने भाव तिरोहित हो जाते हैं। नूतनता का संचार हो जाता है।

‘नवो नवो भवति जायमानः‘

लोक के अनहद नाद का यही मूल स्त्रोत है। नयेपन में ही तो व्यक्ति की असल यात्रा प्रारंभ होती है। भीतर की यात्रा। अकेलेपन की यात्रा। खुद को खोजने की यात्रा। कुंभ स्नान के बाद जब यह यात्रा करके व्यक्ति बाहर आता है तो वह पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाता है। पंडित विद्यानिवास मिश्र कहते हैं, ‘कुम्भ पर्व एक निमंत्रण है अपने गांव-घर, अपने जाति, कुल, अपने धन-वैभव को भूलकर एकदम अंकिचन बनकर जुड़ो, एक दूसरे से और जब जीवन की पवित्र धारा से रागी-वैरागी, सब एकत्र हों, काल के उस बिन्दु को पहचानो, देष की उस बिन्दु को पहचानो जहां अमृत का कुम्भ है। वह एक समय हरिद्वार में, दूसरे समय प्रयाग में है, तीसरे समय महाकाल की नगरी उज्जयिनी में है, चौथे समय गोदावरी के उद्गमस्थल नासिक में है। कोटी-कोटी आस्थाएं जुड़ती है जीवन के इस मूर्त्त प्रवाह से पत्थरो ंके हदृय से निकली हुई रसधार से कोटि-कोटि सांसे एक महाष्वास बनती हैं, सांसो का मेला होता है तब एक पर्व बनता है। पर्व का अर्थ है वह सन्धि जो भरे हुए रस की रक्षा करती है, गन्ने की दो पारों के बीच ही तो गन्ने की मिभस है। समष्टि जीवन का माधुर्य संचय ही पर्व है।’

कुम्भ का शास्त्रीय पक्ष ज्योतिष शास्त्र से जुड़ा है। कुंभ शब्द की व्युत्पत्ति है, कुं भूमिं, कु कुत्सितं उम्भति पूरयति इति कुम्भः। अर्थात् दिन का वह भाग जब क्षितिज पर राषि चक्र का उदय होता है। अलग-अलग स्थानों पर कुंभ का अलग अलग योग होता है।

पद्मिनी नायके मेषे कुम्भं राषिगतो गुरूः।

गंगाद्वारे भवेद्योगः कुम्भ नाम ददोत्तमम्।।

सूर्य जब वृष राषि पर हों तथा वृहस्पति कुंभ राषि पर जाएं तब हरिद्वार में कुम्भ होता है और यह स्थिति बारह वर्षों में एक बार आती है।

कं जलं उम्भति पूरयति अवर्षणादि दुर्भिक्षेम्यो दूरयति इति कुम्भः।।

यानी बारह वर्षों में घटित वह ग्रह योग जो दुर्भिक्ष तथा अवर्षण को दूर करके सबको समृद्धि प्रदान करता है, वह कुम्भ है। इसीलिए हरिद्वार से ही कुम्भ की परम्परा की शुरूआत मानी गयी है। कुम्भ लोक पर्व है। प्रकृति से जुड़ने का पर्व। कुम्भ पर एकत्र जन समुदाय भीतर से खाली होता है। हरेक वहां मनुष्यता के भाव से ही खींचा चला आता है। कुम्भ महात्माओं के मिलन का पर्व है। बल्कि यूं कहें कि जब पृथ्वी पर लोकहित के लिए एक स्थान पर महात्मा एकत्र होते हैं तो वह कुम्भ योग होता है। कुम्भ स्नान के अंतर्गत एकत्र होने वाला जन समुदाय जो भाव लेकर वहां उपस्थित होता है, वह महात्मा का भाव ही तो होता है। इसीलिए शायद कहा गया है-

कुं पृथ्वीं उम्भतेऽनुगृह्यते उत्तमोत्तम महात्म संगमैः

तदीय हितोपदेषै यस्मिन् स कुम्भः।।

अर्थात् जब पृथ्वी पर अनेक महात्मा एकत्रित होकर लोकहितकारी उपदेषों का प्रवचन करें, वह कुम्भ योग है। लोक के बिना जीवन-सत्व का उद्घाटन कैसे हो! लोक में ही उत्सवधर्मिता और जीवन धर्म का उद्भव होता है। लोक तत्व का जब स्पन्दन होता है तो संस्कृति और दूसरी कलाएं मुखरित होते देखी जा सकती है। महाभारत के उद्योग पर्व में भी तो वेद व्यास कहते हैं

‘प्रत्यक्षदर्षी लोकानाम् सर्वदर्षी भवेष्वरः’

अर्थात् जो लोकदर्षन में शामिल होकर खुद उसे अपने अन्तरमन से देखता है, वही मनुष्य सच्चे रूप में लोक को समझ सकता है। भारतीय संस्कृति विष्ववरणीय इसीलिए है कि उसमें लोक जीवन का साधकीय रूप है। लोक उत्सवधर्मिता की अपनी परम्परा के अंतर्गत निरंतर अपने आपको साधता है। निरंतर साधने के लिए तन और मन दोनों की ही शुद्धि जरूरी है।

...और कुम्भ की पौराणिक कथाएं! सहज ही मन में कथाओं की गूंज होती है। सागर मंथन से निकले अमृत कुम्भ की कथा जेहन में सबसे पहले कौंधती है। अमृत की खोज में देवता और असुर दोनों ही साथ मिलकर जुट गए हैं। अमृत कलष जैसे ही हाथ में आया, दोनांे में ही उसे पाने का युद्ध छिड़ गया। लड़ाई चलती रही। चलती ही रही। कहते हैं, जिन स्थानों पर यह लड़ाई चली वहां कालान्तर में पर्व मनाया जाने लगा। इन स्थानों पर स्नान को मोक्षकारक माना जाने लगा।

एक और भी कथा है ‘मत्स्य पुराण’ की। अमृत कलष लेकर गरूण उड़ रहे हैं। उड़ान के दौरान अमृत कलष की बूंदे जहां जहां छलकी और जहां बूदें गिरीं, वहां कुम्भ पर्व विश्रुत हुआ।

आख्यान और भी है।...गरूण नागमाता कद्रू से अपनी माता को दासत्व से मुक्ति दिलाने के लिए ‘अमृत कलष’ हठात् छीनकर ले आए हैं। नागलोक में वासुति द्वारा रक्षित अमृत कलष के यूं गरूण के छीनकर ले जाने पर नागांे को बहुत क्रोध आता है। नाग उनका पीछा करता हैं। ‘अमृत कलष’ प्राप्ति के लिए नाग गरूण पर चार बार प्रहार करते हैं। चारों बार ‘अमृत कलष’ पृथ्वी पर रखकर गरूण को युद्ध करना पड़ा। कहते हैं, पृथ्वी पर जहा, जहां अमृत कलष रखा गया, वे ही स्थान ‘कुम्भ स्थली’ से जाने गए।

विष्णुद्वारे तीर्थराजेऽअवन्त्यां गोदावरी तटे।

सुधाविन्दु विनिक्षेपात् कुम्भ पर्वेति विश्रुतः।।

हरिद्वार का कुम्भ प्रथम कुम्भ है। प्रयाग, नासिक तथा उज्जैन में क्रमषः कुम्भ घटित होता है। कुम्भ अभावों को दूर करता है। जीवन में नवीनता का संचार करता है। यह जब घटित होता है तो मंगल होता है। पृथ्वी में समृद्धि व्याप्त होती है। हर ओर, हर छोर अनिष्टकारी प्रवृतियों का शमन होता है। मंगल कामनाओं के स्वर धरित्रि पर गूंज उठते हैं। अपने लिए नहीं बल्कि पूरे संसार के लिए मंगलकामना के स्वर-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कष्चित् दुःख भाग्भवेत्।।

Sunday, April 11, 2010

सब्दों की नीरवता के बीच...

नन्द किशोर आचार्य के सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह "उड़ना संभव करता आकाश" उनके सर्वथा नये कवि रूप से साक्षात्कार कराता है। इस रूप में कि इस संग्रह की उनकी लगभग सभी कविताएं समय, समाज और परिवेष के अंतर्गत शब्दों की नीरवता के बीच के स्पेस को सर्वथा नये अर्थों में व्याख्यायित करती है। वे संग्रह में जिज्ञासाओं को खड़ा करते हैं, उनसे संवाद करते हैं और चुपके से शब्दों के बीच की नीरवता में उनका समाधान भी कर देते हैं। ऐसा करते हुए भाषा की उनकी लाक्षणिकता और कलात्मक अनुशासन पर औचक ही ध्यान जाता है, ‘नहीं होती है शब्दों में-/बीच की नीरवता में/होती है कविता/नीरवता!यह क्या है/षब्द ने सोचा/जानना चाहिए इस को/चुपके से उतर गया/उसमें...’
"उड़ना संभव करता आकाश" की बड़ी विषेषता यह भी है कि इस संग्रह की कविताओं में आचार्य ने व्यक्ति की आस्थाओं, मन में उपजे संदेहों और एंकात की संपूर्णता को भी सर्वथा नये अर्थ दिए हैं। इस नये अर्थ में जो ध्वनित होता है, उसे जरा देखें, ‘‘मेरा एकान्त/हो आया/दुनिया तुम्हारी जैसे/कभी एकान्त को अपने/मेरी दुनिया में/ढ़लने दो..’ और ‘‘निंदियायी झील के जल में/सोते हुए अपने को/देखता रहूं/तुम्हारे सपनों के जल में/कभी पत्ता कोई झर जाय/नीरव...।’
नंदकिशोर आचार्य के पास भाषा की अद्भुत कारीगरी है परन्तु यह ऐसी है जिसमें षिल्प या शैली के चमत्कार का आग्रह नहीं है। बात कहने का उनका अपना मौलिक अंदाज है, इस अंदाज में शब्दों के अपव्यय से उन्हें परहेज है। शायद यही कारण है कि कविता के उनके शब्द अगले शब्दार्थ को खुद ही खोलते नजर आते हैं। देखें, जरा छोटी सी बानगी ‘केवल अपने रंग में रहना/कम बेरंग होना है/यह उस हरे से पूछो/जिसका खो गया है लाल/या लाल से जानों/जिसका हरा गया है हरा।’
"उड़ना संभव करता आकाश" की कविताओं में आचार्य ने अपने एकांतिक क्षणों को कविता में गहरे जीते जीवनानुभवों और अन्तर्मन संवेदनाओं के आकाष से भी पाठकों का बेहद खूबसूरती से साक्षात्कार कराया है। यहां उनकी बहुत सी आत्मपरक कविताएं भी है जो उनका निजीवृत बनाती, पाठकों की संवेदनाओं को भी गहरे से दस्तक देती है। अपनी पूर्ववर्ती कविताओं की भांति ईष्वर के सबंध में उपजे भावों को उन्होंने यहां नये अर्थों में व्याख्यायित किया है। वे ईष्वर के होने और न होने के बीच के स्पेस को भरते विमर्ष की जैसे नयी राहें खोलते हैं, ‘‘जीवन से पहले है/ईष्वर/जीवन के बाद/मृत्यु है/दोनों ही निर्थक होते जो/दोनों के बीच/या जीवन/लेता हुआ सांसे/तुम्हारे वायुमंडल में।’
बिम्ब और प्रतीकों से उभरते अर्थों में दरअसल आचार्य कविता का नया रूपक बनाते हैं। मुझे लगता है, काव्य भाषा के साथ काव्यवस्तु में जो कुछ अव्यक्त और सामान्यतया अननुमार्गणीय है, उसे अभिव्यक्त और अभिव्यंजित करती संग्रह की उनकी कविताएं दरअसल कविता की कलात्मक खोज भी है। इस खोज में परम्पराबोध तो है परन्तु जड़त्व को तोड़ने का प्रयास भी हर ओर, हर छोर है। मसलन ‘लय रच जाना उस का’ कविता को ही लें, ‘हर उड़ना/सम्भव करता आकाष/लय होता हुई उस मेंः/उड़ने का आनंद है/पाखी/लय रच जाना उस का/मुक्ति मेरी हो जाना है।’
"उड़ना संभव करता आकाश" संग्रह पढ़ते बार-बार यह अहसास भी होता है कि यहां वे अपनी पूर्व कविताओं को ही नहीं बल्कि अपने समकाल को भी जैसे नये सिरे से पुनर्संस्कारित करते हैं।
"राजस्थान पत्रिका" के रविवारीय, दिनांक 4 अप्रैल 2010 को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास की समीक्षा

सब्दों की नीरवता के बीच...

"राजस्थान पत्रिका" के रविवारीय, दिनांक 4 अप्रैल 2010 को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास की समीक्षा
नन्द किशोर आचार्य के सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह "उड़ना संभव करता आकाश" उनके सर्वथा नये कवि रूप से साक्षात्कार कराता है। इस रूप में कि इस संग्रह की उनकी लगभग सभी कविताएं समय, समाज और परिवेष के अंतर्गत शब्दों की नीरवता के बीच के स्पेस को सर्वथा नये अर्थों में व्याख्यायित करती है। वे संग्रह में जिज्ञासाओं को खड़ा करते हैं, उनसे संवाद करते हैं और चुपके से शब्दों के बीच की नीरवता में उनका समाधान भी कर देते हैं। ऐसा करते हुए भाषा की उनकी लाक्षणिकता और कलात्मक अनुशासन पर औचक ही ध्यान जाता है, ‘नहीं होती है शब्दों में-/बीच की नीरवता में/होती है कविता/नीरवता!यह क्या है/षब्द ने सोचा/जानना चाहिए इस को/चुपके से उतर गया/उसमें...’
"उड़ना संभव करता आकाश" की बड़ी विषेषता यह भी है कि इस संग्रह की कविताओं में आचार्य ने व्यक्ति की आस्थाओं, मन में उपजे संदेहों और एंकात की संपूर्णता को भी सर्वथा नये अर्थ दिए हैं। इस नये अर्थ में जो ध्वनित होता है, उसे जरा देखें, ‘‘मेरा एकान्त/हो आया/दुनिया तुम्हारी जैसे/कभी एकान्त को अपने/मेरी दुनिया में/ढ़लने दो..’ और ‘‘निंदियायी झील के जल में/सोते हुए अपने को/देखता रहूं/तुम्हारे सपनों के जल में/कभी पत्ता कोई झर जाय/नीरव...।’
नंदकिशोर आचार्य के पास भाषा की अद्भुत कारीगरी है परन्तु यह ऐसी है जिसमें षिल्प या शैली के चमत्कार का आग्रह नहीं है। बात कहने का उनका अपना मौलिक अंदाज है, इस अंदाज में शब्दों के अपव्यय से उन्हें परहेज है। शायद यही कारण है कि कविता के उनके शब्द अगले शब्दार्थ को खुद ही खोलते नजर आते हैं। देखें, जरा छोटी सी बानगी ‘केवल अपने रंग में रहना/कम बेरंग होना है/यह उस हरे से पूछो/जिसका खो गया है लाल/या लाल से जानों/जिसका हरा गया है हरा।’
"उड़ना संभव करता आकाश" की कविताओं में आचार्य ने अपने एकांतिक क्षणों को कविता में गहरे जीते जीवनानुभवों और अन्तर्मन संवेदनाओं के आकाष से भी पाठकों का बेहद खूबसूरती से साक्षात्कार कराया है। यहां उनकी बहुत सी आत्मपरक कविताएं भी है जो उनका निजीवृत बनाती, पाठकों की संवेदनाओं को भी गहरे से दस्तक देती है। अपनी पूर्ववर्ती कविताओं की भांति ईष्वर के सबंध में उपजे भावों को उन्होंने यहां नये अर्थों में व्याख्यायित किया है। वे ईष्वर के होने और न होने के बीच के स्पेस को भरते विमर्ष की जैसे नयी राहें खोलते हैं, ‘‘जीवन से पहले है/ईष्वर/जीवन के बाद/मृत्यु है/दोनों ही निर्थक होते जो/दोनों के बीच/या जीवन/लेता हुआ सांसे/तुम्हारे वायुमंडल में।’
बिम्ब और प्रतीकों से उभरते अर्थों में दरअसल आचार्य कविता का नया रूपक बनाते हैं। मुझे लगता है, काव्य भाषा के साथ काव्यवस्तु में जो कुछ अव्यक्त और सामान्यतया अननुमार्गणीय है, उसे अभिव्यक्त और अभिव्यंजित करती संग्रह की उनकी कविताएं दरअसल कविता की कलात्मक खोज भी है। इस खोज में परम्पराबोध तो है परन्तु जड़त्व को तोड़ने का प्रयास भी हर ओर, हर छोर है। मसलन ‘लय रच जाना उस का’ कविता को ही लें, ‘हर उड़ना/सम्भव करता आकाष/लय होता हुई उस मेंः/उड़ने का आनंद है/पाखी/लय रच जाना उस का/मुक्ति मेरी हो जाना है।’
"उड़ना संभव करता आकाश" संग्रह पढ़ते बार-बार यह अहसास भी होता है कि यहां वे अपनी पूर्व कविताओं को ही नहीं बल्कि अपने समकाल को भी जैसे नये सिरे से पुनर्संस्कारित करते हैं।

समकाल को पुनर्संस्कारित करती कविताएं

नंदकिशोर आचार्य के सद्य प्रकाषित काव्य संग्रह ‘उड़ना संभव करता आकाष’ उनके सर्वथा नये कवि रूप से साक्षात्कार कराता है। इस रूप में कि इस संग्रह की उनकी लगभग सभी कविताएं समय, समाज और परिवेष के अंतर्गत शब्दों की नीरवता के बीच के स्पेस को सर्वथा नये अर्थों में व्याख्यायित करती है। वे संग्रह में जिज्ञासाओं को खड़ा करते हैं, उनसे संवाद करते हैं और चुपके से शब्दों के बीच की नीरवता में उनका समाधान भी कर देते हैं। ऐसा करते हुए भाषा की उनकी लाक्षणिकता और कलात्मक अनुषासन पर औचक ही ध्यान जाता है, ‘नहीं होती है शब्दों में-/बीच की नीरवता में/होती है कविता/नीरवता!यह क्या है/षब्द ने सोचा/जानना चाहिए इस को/चुपके से उतर गया/उसमें...’ ‘उड़ना संभव करता आकाष’ की बड़ी विषेषता यह भी है कि इस संग्रह की कविताओं में आचार्य ने व्यक्ति की आस्थाओं, मन में उपजे संदेहों और एंकात की संपूर्णता को भी सर्वथा नये अर्थ दिए हैं। इस नये अर्थ में जो ध्वनित होता है, उसे जरा देखें, ‘‘मेरा एकान्त/हो आया/दुनिया तुम्हारी जैसे/कभी एकान्त को अपने/मेरी दुनिया में/ढ़लने दो..’ और ‘‘निंदियायी झील क ेजल में/सोते हुए अपने को/देखता रहूं/तुम्हारे सपनों क ेजल में/कभी पत्ता कोई झर जाय/नीरव...।’ नंदकिशोर आचार्य के पास भाषा की अद्भुत कारीगरी है परन्तु यह ऐसी है जिसमें षिल्प या शैली के चमत्कार का आग्रह नहीं है। बात कहने का उनका अपना मौलिक अंदाज है, इस अंदाज में शब्दों के अपव्यय से उन्हें परहेज है। शायद यही कारण है कि कविता के उनके शब्द अगले शब्दार्थ को खुद ही खोलते नजर आते हैं। देखें, जरा छोटी सी बानगी ‘केवल अपने रंग में रहना/कम बेरंग होना है/यह उस हरे से पूछो/जिसका खो गया है लाल/या लाल से जानों/जिसका हरा गया है हरा।’ ‘उड़ना संभव करता आकाष’ की कविताओं में आचार्य ने अपने एकांतिक क्षणों को कविता में गहरे जीते जीवनानुभवों और अन्तर्मन संवेदनाओं के आकाष से भी पाठकों का बेहद खूबसूरती से साक्षात्कार कराया है। यहां उनकी बहुत सी आत्मपरक कविताएं भी है जो उनका निजीवृत बनाती, पाठकों की संवेदनाओं को भी गहरे से दस्तक देती है। अपनी पूर्ववर्ती कविताओं की भांति ईष्वर के सबंध में उपजे भावों को उन्होंने यहां नये अर्थों में व्याख्यायित किया है। वे ईष्वर के होने और न होने के बीच के स्पेस को भरते विमर्ष की जैसे नयी राहें खोलते हैं, ‘‘जीवन से पहले है/ईष्वर/जीवन के बाद/मृत्यु है/दोनों ही निर्थक होते जो/दोनों के बीच/या जीवन/लेता हुआ सांसे/तुम्हारे वायुमंडल में।’ बिम्ब और प्रतीकों से उभरते अर्थों में दरअसल आचार्य कविता का नया रूपक बनाते हैं। मुझे लगता है, काव्य भाषा के साथ काव्यवस्तु में जो कुछ अव्यक्त और सामान्यतया अननुमार्गणीय है, उसे अभिव्यक्त और अभिव्यंजित करती संग्रह की उनकी कविताएं दरअसल कविता की कलात्मक खोज भी है। इस खोज में परम्पराबोध तो है परन्तु जड़त्व को तोड़ने का प्रयास भी हर ओर, हर छोर है। मसलन ‘लय रच जाना उस का’ कविता को ही लें, ‘हर उड़ना/सम्भव करता आकाष/लय होता हुई उस मेंः/उड़ने का आनंद है/पाखी/लय रच जाना उस का/मुक्ति मेरी हो जाना है।’ ‘उड़ना संभव करता आकाष’ संग्रह पढ़ते बार-बार यह अहसास भी होता है कि यहां वे अपनी पूर्व कविताओं को ही नहीं बल्कि अपने समकाल को भी जैसे नये सिरे से पुनर्संस्कारित करते हैं।
समकाल को पुनर्संस्कारित करती कविताएं नंदकिशोर आचार्य के सद्य प्रकाषित काव्य संग्रह ‘उड़ना संभव करता आकाष’ उनके सर्वथा नये कवि रूप से साक्षात्कार कराता है। इस रूप में कि इस संग्रह की उनकी लगभग सभी कविताएं समय, समाज और परिवेष के अंतर्गत शब्दों की नीरवता के बीच के स्पेस को सर्वथा नये अर्थों में व्याख्यायित करती है। वे संग्रह में जिज्ञासाओं को खड़ा करते हैं, उनसे संवाद करते हैं और चुपके से शब्दों के बीच की नीरवता में उनका समाधान भी कर देते हैं। ऐसा करते हुए भाषा की उनकी लाक्षणिकता और कलात्मक अनुषासन पर औचक ही ध्यान जाता है, ‘नहीं होती है शब्दों में-/बीच की नीरवता में/होती है कविता/नीरवता!यह क्या है/षब्द ने सोचा/जानना चाहिए इस को/चुपके से उतर गया/उसमें...’ ‘उड़ना संभव करता आकाष’ की बड़ी विषेषता यह भी है कि इस संग्रह की कविताओं में आचार्य ने व्यक्ति की आस्थाओं, मन में उपजे संदेहों और एंकात की संपूर्णता को भी सर्वथा नये अर्थ दिए हैं। इस नये अर्थ में जो ध्वनित होता है, उसे जरा देखें, ‘‘मेरा एकान्त/हो आया/दुनिया तुम्हारी जैसे/कभी एकान्त को अपने/मेरी दुनिया में/ढ़लने दो..’ और ‘‘निंदियायी झील क ेजल में/सोते हुए अपने को/देखता रहूं/तुम्हारे सपनों क ेजल में/कभी पत्ता कोई झर जाय/नीरव...।’ नंदकिशोर आचार्य के पास भाषा की अद्भुत कारीगरी है परन्तु यह ऐसी है जिसमें षिल्प या शैली के चमत्कार का आग्रह नहीं है। बात कहने का उनका अपना मौलिक अंदाज है, इस अंदाज में शब्दों के अपव्यय से उन्हें परहेज है। शायद यही कारण है कि कविता के उनके शब्द अगले शब्दार्थ को खुद ही खोलते नजर आते हैं। देखें, जरा छोटी सी बानगी ‘केवल अपने रंग में रहना/कम बेरंग होना है/यह उस हरे से पूछो/जिसका खो गया है लाल/या लाल से जानों/जिसका हरा गया है हरा।’ ‘उड़ना संभव करता आकाष’ की कविताओं में आचार्य ने अपने एकांतिक क्षणों को कविता में गहरे जीते जीवनानुभवों और अन्तर्मन संवेदनाओं के आकाष से भी पाठकों का बेहद खूबसूरती से साक्षात्कार कराया है। यहां उनकी बहुत सी आत्मपरक कविताएं भी है जो उनका निजीवृत बनाती, पाठकों की संवेदनाओं को भी गहरे से दस्तक देती है। अपनी पूर्ववर्ती कविताओं की भांति ईष्वर के सबंध में उपजे भावों को उन्होंने यहां नये अर्थों में व्याख्यायित किया है। वे ईष्वर के होने और न होने के बीच के स्पेस को भरते विमर्ष की जैसे नयी राहें खोलते हैं, ‘‘जीवन से पहले है/ईष्वर/जीवन के बाद/मृत्यु है/दोनों ही निर्थक होते जो/दोनों के बीच/या जीवन/लेता हुआ सांसे/तुम्हारे वायुमंडल में।’ बिम्ब और प्रतीकों से उभरते अर्थों में दरअसल आचार्य कविता का नया रूपक बनाते हैं। मुझे लगता है, काव्य भाषा के साथ काव्यवस्तु में जो कुछ अव्यक्त और सामान्यतया अननुमार्गणीय है, उसे अभिव्यक्त और अभिव्यंजित करती संग्रह की उनकी कविताएं दरअसल कविता की कलात्मक खोज भी है। इस खोज में परम्पराबोध तो है परन्तु जड़त्व को तोड़ने का प्रयास भी हर ओर, हर छोर है। मसलन ‘लय रच जाना उस का’ कविता को ही लें, ‘हर उड़ना/सम्भव करता आकाष/लय होता हुई उस मेंः/उड़ने का आनंद है/पाखी/लय रच जाना उस का/मुक्ति मेरी हो जाना है।’ ‘उड़ना संभव करता ’ संग्रह पढ़ते बार-बार यह अहसास भी होता है कि यहां वे अपनी पूर्व कविताओं को ही नहीं बल्कि अपने समकाल को भी जैसे नये सिरे से पुनर्संस्कारित करते हैं।

Friday, April 2, 2010

कला में अर्थ अभिव्यंजना


किसी भी कला के लिए रूपाकार को स्वतंत्र और जगत का सत्व मान लेना ही पर्याप्त नहीं है। छायाचित्रकारी की ही बात करें। यथार्थ में अन्तर्निहित जो है, उसकी जो संवेदना है, उसके भीतर के सच का जो अर्थ है, उसे यदि कैमरा व्याख्यायित करता है, तो वह उसकी कला परिणति हो जाती है। ऐसा करते छायाचित्रकार स्थूल तत्वों, जो कुछ घटित हो रहा है, तेज-मंद हो रहे प्रकाश, विविध रंगों, नादों और आकार और अर्थ के संयोग को ही तो निरूपित कर रहा होता है।

मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान की क्रिएटिव आर्ट सोसायटी के फोटोग्राफी क्लब के अंतर्गत निर्णायक के रूप में जब सम्मिलित हुआ तो अभियांत्रिकी विद्यार्थियों की देशभर से आयी छायाचित्र प्रविष्टियों को देखकर मन में यही सब कौंध रहा था। यह तय करना बेहद मुश्किल हो रहा था कि कौनसी प्रविष्टियों का चयन किया जाए। विद्यार्थियों ने दिखाई देने वाले दृश्यों से अप्रासंगिक वस्तुओं और विषयों को बाहर निकालकर अर्थपूर्ण ही नहीं बनाया था बल्कि अपने तई सौन्दर्य की भी जैसे नई सृष्टि की थी। डाल पर लटकी चींटी, नृत्यांगना का नुपूर पहना पांव, सूरज की ढ़लती किरणों में उछलता युवामन, पानी के भीतर तैर रहे तिनकों की सर्वथा नयी अर्थ अभिव्यंजना और ऐसे ही बहुतेरे दूसरे छायाचित्रों में आकृति की तीक्ष्णता, कुछ के तीव्र और तटस्थ भाव औचक अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे।

अभियांत्रिकी शिक्षण संस्थानों में फोटोग्राफी क्लब तो बने हैं परन्तु वहां आयोजन की उदासीनता विद्यार्थियों में अर्न्तनिहित कला को पंख नहीं लगने देती। छायाकार मित्र महेश स्वामी अभियांत्रिकी विद्यार्थियों में उनकी कला के लिए जो जोश भर रहे हैं, उससे छायाचित्रकला की भविष्य की उम्मीदें जगती है। बच्चा बन वे जिस तरह से हमारे साथ अपनी नहीं विद्यार्थियों की छायाचित्रकला की बारीकियों का बखान कर रहे थे, वह भी सर्वथा नयी अनुभूति थी।

बहरहाल, अभियांत्रिकी छात्रों की फोटोग्राफी देखते यह अहसास भी हो रहा था कि छायाचित्रकार भी किसी दार्शनिक से कम नहीं होता। कैमरे का वह यांत्रिक उपयोग ही नहीं करता बल्कि ऐसा करते वह उसमें अपनी रचना, सृजन और चिंतन को भी जोड़ता है। अच्छा जो दिख रहा है, उसे कैमरे में कैद कर लेना ही कला नहीं है। सूक्ष्म और ऐन्द्रजालिक चित्ताकर्षण को मन के भीतर की संवेदना से जोड़ते जब अपने तई व्याख्यायित किया जाता है तो उसे नयी कला की अर्थ अभिव्यंजना मिलती है। छायाचित्रकारी ही क्यों, सभी कलाओं का सच भी क्या यही नहीं है!
डॉ. राजेश कुमार व्यास का "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" दिनांक २ अप्रैल २०१०

Friday, March 26, 2010

माध्यम का हूबहू रूपान्तरण

छायाचित्रकारी का दौर जब प्रारंभ नहीं हुआ था, तब कलाकार अपनी कलाकृतियों के जरिए ही यथार्थ का दर्षाव किया करते थे। बाद में जब 1826 में फ्रांसीसी आविष्कर्ता निप्से ने पहला फोटोग्राफ बनाया और 1839 में ब्रिटेन के नागरिक टाल्बो ने छायाचित्रकारी की शोध आम जन के समक्ष रखी तो पूरे विष्व में एक हलचल सी मच गयी थी। पेरिस में चित्रकार-प्राध्यापक पॉल देलारोष ने हताषा और गुस्से में तब घोषणा की थी, ‘आज से चित्रकला मर गयी है।’ चित्रकला का तो इससे कहीं नुकसान नहीं हुआ। हॉं, कुछ स्तरों पर दोनों कलाएं एक दूसरे के प्रभाव से समृद्ध जरूर हुई।


बहरहाल, किसी कलाकृति के लिए छायाचित्र सहयोगी बने तो इसे स्वीकारा जा सकता है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि कला का रूप एक हो जाए। ऐसा यदि होता है तो फिर कला की अपनी निजता कैसे रहेगी। दूसरी कला से आप विषय ले सकते हैं, फॉर्म का कुछ हिस्सा इस्तेमाल कर सकते हैं परन्तु पूरा का पूरा उसे ही आप यदि अपनाते हैं तो फिर वह कला कहां रहेगी!


पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र की सुरेख कला दीर्घा में जयगढ़, नाहरगढ़, गढ़ गणेष, जन्तर-मन्तर, आमेर दुर्ग आदि की खेतान्ची की पेंटिग देखते हुए लगा कैनवस पर छायाचित्रों को रूपान्तरित कर दिया गया है। उनके तेलचित्रों में कला की मौलिक अभिव्यंजना की बजाय छायाचित्रकारी का ही आस्वाद हर ओर हर छोर नजर आ रहा था। किलों के भीतर के गलियारों के छाया-प्रकाष प्रभाव, उग आयी घास और ऐसे ही बहुतेरे दूसरे दृष्य ऐसे हैं जिनहें अनुभूति चाह कर भी संचित नहीं कर सकती। खेतान्ची ने इन्हें अपनी पेंटिंग में संचित किया है। जाहिर सी बात है, कैमरे का इस्तेमाल उन्होंने अपनी इन पेंटिंग मे अनुकरण की हद तक किया है। सवाल यह है कि क्या इन्हंे फिर कलाकृतियां कहा जाएगा? कलाकार पर दूसरी कला का प्रभाव हो सकता है। अमृता शेरगिल, गुलाम मोहम्मद शेख, विकास भट्टाचार्य, गीव पटेल, भूपेन खक्खर, शांतनु भट्टाचार्य आदि की कलाकृतियों में फोटोग्राफी का प्रभाव जरूर दिखायी देता है परन्तु उन्हें छायाचित्रों का अनुकरण नहीं कहा जा सकता। बहुतेरी बार अचेतन भी ऐसा होता है परन्तु खेतान्ची ने तो पेंटिंग को ही छायाचित्र बना दिया है। हूबहू आप यदि दूसरे माध्यम को अपने माध्यम में रूपान्तरित करते हैं तो फिर इसमें नया क्या हुआ?


बहरहाल, ऐसे दौर में जब कैमरानुमी सक्षम यंत्र बेहद विकसित हो गया है और नंगी आंख से न देख सकने वाले सूक्ष्म से सूक्ष्म दृष्य को भी वह चित्र में परिवर्तित कर देता है, क्या पेंटिग का प्रयोजन भी यही होना चाहिए! पॉल देलारोष फिर से याद आ रहे है, ‘क्या चित्रकला मर गयी है?’

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" २६-३-२०१०

Friday, March 19, 2010

कलाओं का अन्तर्सम्बन्ध

भारतीय दृष्टि जीवन को उसकी सम्पूर्णता में देखती है, उसमें जीवन के सभी पक्षों को समाहित किया जाता है। जाहिर सी बात है, कला के परिप्रेक्ष्य में उसमे संगीत है, नृत्य है, चित्रकला है और तमाम प्रकार की दूसरी कलाएं भी सम्मिलित हैं। दरअसल सभी कलाएं एक दूसरे से गूंथी हुई हैं। वे एक दूसरे को रूप देने का कार्य करती है। भरत मुनि के नाट्यषास्त्र का नाम भले नाटक से संबद्ध हो परन्तु उसमें सभी कलाओं के अर्न्तसंबंधों की परिणति में हर कला की अपनी स्वायत्ता को दर्षाया गया है। भरत मुनि का एक बेहद खूबसूरत श्लोक है जिसमें उन्होंने संगीत को नाट्य की शय्या कहा है। आर्जेन्टीनी लेखक खोर्खे लुइस बोर्खेस के कथन को इसी परिप्रेक्ष्य में लें जिसमें उन्होंने कहा है कि शब्द का जन्म कविता में हुआ होगा। सच भी क्या यही नहीं है! गान मे छन्द का स्थान केन्द्रीय है। यदि वहां छन्द नहीं बरता गया है तो वह गान का स्वांग भर होगा।संगीत में आलाप के अंतर्गत राग का हल्के हल्के विस्तार होता है। इस विस्तार में ही पूरा एक भाव लोक तैयार होता है। ठीक ऐसे ही रंगमंच के साथ है। वहां किसी पात्र सें संबंधित दृष्य में विस्तार होने के बाद ही अगला दृष्य मंचित होता है। नृत्य में दृष्टि, हाव-भाव आदि की भंगिमाएं ही उसका विस्तार करती है। यही बात चित्रकला के साथ भी है। रंग और रेखाएं बढ़त करती है। इस बढ़त में ही कैनवस पर मूर्त और अमूर्त चित्र की परिणति होती है। हर कला अपने रूप में सौन्दर्य और श्रेष्ठता का वरण दूसरी कला के मेल से ही करती है। सोचिए! यदि नाटक में नृत्य और सगीत नहीं हो, संगीत में चित्रात्मकता के दृष्य उभारने का भाव नहीं हो और चित्रकला में संगीत की लय नहीं हो तो क्या उसे जीवंत कहा जाएगा!
बहरहाल, यह जब लिख रहा हूं, जतिनदास का एक चित्र जेहन में कौंध रहा है। नृत्य की भाव भंगिमाओं में यह चित्र ऐसा है जिसमें कला की सम्पूर्णता को अनुभूत किया जा सकता है। इसमें चित्रात्मकता तो है ही, सांगीतिक आस्वाद है, नाट्य का भ्व है, कविता का छन्द है और कला की तमाम अनुभूतियों भी यहां सघन महसूस की जा सकती है। कहा जा सकता है कि सभी कलाएं एक दूसरे से मिली हुई है। एक दूसरे के बिना उनका काम नहीं चल सकता। संवाद और सहकार के जरिए कलाओं के परस्पर संबंधों को और अधिक सघन किया जा सकता है। अब जबकि बाजारवाद ने लगभग सभी कलाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया है और हर कला अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने में लगी है, क्या यह जरूरी नहीं है कि कलाओं के अन्तर्सम्बधों पर विचार करते हम उन्हें एक दूसरे के नजदीक लाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो क्या अपनी श्रेष्ठता की होड़ में एक कला का दूसरी कला से संवादहीनता और सहकारहीनता से उनके मूल अस्तित्व से संघर्ष की चुनौती ही क्या हम पैदा नहीं कर रहे?




‘‘डेली न्यूज’’ में प्रति शुक्रवार को प्रकशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ ‘‘कला तट’’ दिनांक 19।3।2010

Monday, March 15, 2010

सच करो रेत के सपने

अबोले शब्दों के
मौन में
संजोए हैं मैंने
रेत के सपने
पाल ली है मछलियां
मरूथल की मृगमरिचिका में
तुम-
सांस बन जीवन दो
मेरी मछलियों को
सच करो
रेत के सपनों को
मझदार भी किनारा बने
मेरी सोच का
खोलो, खोलो
तुम्हारे होने के सच का
अनावृत घेरा।

Thursday, March 11, 2010

स्मृतियों के दृष्यालेख



सैयद हैदर रज़ा के चित्र स्मृतियों के दृष्यालेख हैं। ऐसे जिन्हें आप देखकर सुकून पा सकते हैं, पढ़ सकते हैं और हां, यदि घूंट घूंट आस्वाद लंेगे तो अर्से तक आप उन्हें भुला भी नहीं पाएंगे। वे आपकी स्मृतियों को झंकृत करते रहेंगे। रजा दअरसल चित्रों से देखने वाले का रागात्मक संबंध स्थापित कराते हैं। बेषक, चित्रों में उभरी स्मृतियां उनकी वैयक्तिक हैं, उनके अपने संदर्भ है परन्तु वे देखने वाले की अंतर्मन भाव सत्ताओं को गहरे से छूती है। ड्राइंग के अंतर्गत रेखाओं का उनका सहज लयात्मक संतुलन और कोमलता हर देखने वाले को आत्मीयता का बोध कराती है। उनके चित्रों में जिस प्रकार की सफाई, रंग स्पर्ष से झलकने वाली कोमलता नजर आती है, वह अमूर्तन में इधर न के बराबर दिखायी देती है। यह रजा की कला के गंभीर आत्मसयंम की ही परिणति है, जिसमें वे कैनवस पर अनुभूति और संवेदनाओं के अपने आत्मकथ्य की खोज बाहर की ओर नहीं करके भीतर की ओर करते हैं, देखने वालों को करवाते हैं।बहरहाल, रज़ा के चित्रों पर पहले भी लिखा है, परन्तु इस बार जब जवाहर कला केन्द्र में लगे उनके चित्रों की प्रदर्षनी देखी तो लगा वे इस उम्र भी में भी निंरतर कला की बढ़त की ओर ही उन्मुख है। रंगों का तो वे अद्भुत लोक रचते हैं। रंग उनके चित्रांे का माहौल बनाते हैं। भावों के उद्वेग में रंग एक निर्मम तटस्थता भी प्रदान करते हैं। आंतरिक तन्मयता और आग्रहषीलता से रजा अपनी ऐन्द्रिकता को कैनवस पर रूपायित करते जैसे दृष्यों को लेख बंचवाते हैं। प्रकृति और जीवन के रहस्यों को कैनवस की भाषा में परोटते उनके चित्र अभिप्राय बहुत अधिक चर्चित भले नहीं हो परन्तु बौद्धिक आडम्बर उनमें नहीं है। मसलन पंचभुत तत्व का उनका चित्र ही लें या फिर बिन्दू के उनके चित्र या फिर उनके रेखांकन-सभी में ज्यामितिक आकारों के उभरते बिम्ब और प्रतीक अदम्य ऊर्जा लिए हैं। उनके चित्रों की बड़ी विषेषता यह भी है कि वे पावन शंांति का अहसास कराते हैं। ऐसे दौर में जब रंग और रेखाएं कैनवस में कला की सघनता की बजाय बाजार की संभावनाओं की दस्तक देती हों, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि रजा के चित्र कला के सच से हमंे रू-ब-रू कराते आषय की अर्थवत्ता की तलाष कराते हैं। उनके बरते रंग मन में उत्सवधर्मिता का जैसे आगाज करते हैं। कोलकाता की आकार-प्रकार आर्ट गैलरी के जरिए प्रदर्षित उनके चित्र हाल ही बनाए हैं और वे सभी ‘लिरिकल’ हैं, हॉं, कुछ में जबरदस्त दोहराव भी है परन्तु समग्रता में उनके चित्रों के रंग और रूपाकार एक अतीन्द्रिय सत्ता के संवाहक बनते, सूक्ष्म बौद्धिक संवेदनाओं का सांगीतिक आस्वाद लगभग सभी स्तरों पर कराते हैं।


"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक १२-३-१०

स्मृतियों के दृष्यालेख




सैयद हैदर रज़ा के चित्र स्मृतियों के दृष्यालेख हैं। ऐसे जिन्हें आप देखकर सुकून पा सकते हैं, पढ़ सकते हैं और हां, यदि घूंट घूंट आस्वाद लंेगे तो अर्से तक आप उन्हें भुला भी नहीं पाएंगे। वे आपकी स्मृतियों को झंकृत करते रहेंगे। रजा दअरसल चित्रों से देखने वाले का रागात्मक संबंध स्थापित कराते हैं। बेषक, चित्रों में उभरी स्मृतियां उनकी वैयक्तिक हैं, उनके अपने संदर्भ है परन्तु वे देखने वाले की अंतर्मन भाव सत्ताओं को गहरे से छूती है। ड्राइंग के अंतर्गत रेखाओं का उनका सहज लयात्मक संतुलन और कोमलता हर देखने वाले को आत्मीयता का बोध कराती है। उनके चित्रों में जिस प्रकार की सफाई, रंग स्पर्ष से झलकने वाली कोमलता नजर आती है, वह अमूर्तन में इधर न के बराबर दिखायी देती है। यह रजा की कला के गंभीर आत्मसयंम की ही परिणति है, जिसमें वे कैनवस पर अनुभूति और संवेदनाओं के अपने आत्मकथ्य की खोज बाहर की ओर नहीं करके भीतर की ओर करते हैं, देखने वालों को करवाते हैं।बहरहाल, रज़ा के चित्रों पर पहले भी लिखा है, परन्तु इस बार जब जवाहर कला केन्द्र में लगे उनके चित्रों की प्रदर्षनी देखी तो लगा वे इस उम्र भी में भी निंरतर कला की बढ़त की ओर ही उन्मुख है। रंगों का तो वे अद्भुत लोक रचते हैं। रंग उनके चित्रांे का माहौल बनाते हैं। भावों के उद्वेग में रंग एक निर्मम तटस्थता भी प्रदान करते हैं। आंतरिक तन्मयता और आग्रहषीलता से रजा अपनी ऐन्द्रिकता को कैनवस पर रूपायित करते जैसे दृष्यों को लेख बंचवाते हैं। प्रकृति और जीवन के रहस्यों को कैनवस की भाषा में परोटते उनके चित्र अभिप्राय बहुत अधिक चर्चित भले नहीं हो परन्तु बौद्धिक आडम्बर उनमें नहीं है। मसलन पंचभुत तत्व का उनका चित्र ही लें या फिर बिन्दू के उनके चित्र या फिर उनके रेखांकन-सभी में ज्यामितिक आकारों के उभरते बिम्ब और प्रतीक अदम्य ऊर्जा लिए हैं। उनके चित्रों की बड़ी विषेषता यह भी है कि वे पावन शंांति का अहसास कराते हैं। ऐसे दौर में जब रंग और रेखाएं कैनवस में कला की सघनता की बजाय बाजार की संभावनाओं की दस्तक देती हों, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि रजा के चित्र कला के सच से हमंे रू-ब-रू कराते आषय की अर्थवत्ता की तलाष कराते हैं। उनके बरते रंग मन में उत्सवधर्मिता का जैसे आगाज करते हैं। कोलकाता की आकार-प्रकार आर्ट गैलरी के जरिए प्रदर्षित उनके चित्र हाल ही बनाए हैं और वे सभी ‘लिरिकल’ हैं, हॉं, कुछ में जबरदस्त दोहराव भी है परन्तु समग्रता में उनके चित्रों के रंग और रूपाकार एक अतीन्द्रिय सत्ता के संवाहक बनते, सूक्ष्म बौद्धिक संवेदनाओं का सांगीतिक आस्वाद लगभग सभी स्तरों पर कराते हैं।

Sunday, March 7, 2010

पाषाण सौन्दर्य और सुरम्य झील...



यात्रा डायरी
‘बीकानेर में सुरम्य झील!॥ हिल स्टेषन जैसे दृष्य!’‘क्यों? विष्वास नहीं हो रहा?...’‘तुम कह रहे हो तो मान लेता हूं।...अच्छा कब ले जा रहे हो वहां?’‘तुम तो कल जा रहे हो नहीं तो कल ही ले चलता।’‘मेरा जाना कैंसिल...आज ही टिकट रद्द करवा देता हूं। मैं कल तुम्हारे साथ अब गजनेर चलूंगा।’ कोलकता से आए मित्र इन्द्र ने सच में गजनेर के लिए अपनी यात्रा स्थगित कर दी थी। उसे गजनेर की इतनी उतावली हो रही थी कि रात को वह ठीक से सो भी नहीं पाया। वह बीकानेर में तब इन्टनेषनल कैमल फेस्टिवल में भाग लेने वह आया था। तय यह हुआ कि इन्द्र के साथ मोटरसाईकिल पर ही गजनेर जाया जाए। दिन में सूबह 9 बजे ही हम लोग मोटर साईकल पर रवाना हो गए थे। बीकानेर से कोई 30 किलोमीटर दूर स्थित गांव गजनेर के लिए। मोटर साईकिल में हवाओं के सर्द झोंकों का अहसास लेते हम बीकानेर शहर के अंतिम छोर स्थित मुरलीधर व्यास कॉलोनी को क्रॉस करके रेलवे फाटक के पास पहुंच गए थे। सामने छोटा सा बोर्ड लगा हुआ था, ‘नाल बड़ी।’ इन्द्र अपने आपको रोक नहीं पाया, बोला, ‘अरे! ये क्या नाम है?’ ‘इसमें अचरज क्यों हो रहा है, गांव का नाम है भाई।’ ‘अजीब नाम है।’ ‘यह जानकर और भी अजीब लगेगा कि भारतीय सेना के मिग ट्वन्टीवनों का बड़ा कारवां यहीं से गुजरता है। भारतीय सेना का बड़ा हवाई अड्डा है यहां।’ ‘अच्छा। तब तो पहले हम वहीं चलते हैं।’ ‘वहां प्रवेष निषेध है।’ ‘ओह!’ मोटर साईकिल 50 की स्पीड में आगे बढ़ रही थी। रास्ते में सड़क के किनारे किंकर के पेड़ और उड़ती रेत के अलावा दूर तक नजर दौड़ाएं तो सपाट रेत के मैदान, कुछ अन्तराल पर रेत के धोरों के अलावा उजाड़ ही उजाड़ था। मरूस्थल में विरानगी के इन नजारों में गजनेर के जिस सौन्दर्य का मैंने बखान किया था, उसको लेकर उसे अभी भी संदेह था। कोई एक घंटे में हम गजनेर पहुंच गए। मरूस्थल के गांव जैसा गांव। सामने एक छोटा सा तालाब। गंदा, मटमेला पानी। कुछ गायें और भैंसे उस पानी में नहा रही थी तो कुछ औरतें दूसरे किनारे से उसी पानी को पीने के लिए मटकों में भर रही थी। आस-पास किंकर के अलावा कुछ नहीं। ‘यह है झील!...इसमें क्या नया है।...तुम तो कह रहे थे बहुत खूबसूरत स्थान ले जा रहा हूं। यहां क्या खास है? यह तालाब (गजनेर झील) और और गांवो जैसा गांव! क्या यही है तुम्हारा खूबसूरत गजनेर।’‘अभी तुमने देखा ही क्या है? आओ आगे चलते हैं।’कहते हुए मैं मोटर साईकिल को अंदर संकरे रास्ते की ओर घुमा ले जाता हूं। किल,े महलों की शानदार विरासत की कड़ी के नायाब नमूने गजनेर पैलेस के प्रवेष द्वार तक पहुंचते-पहुंचते दृष्य जैसे परिवर्तित होने लगते हैं। मैं इन्द्र की ओर देखता हूं। उसे भी हैरानी है। चहुं ओर हरियाली। रेत के टिले। पत्थरों का सौन्दर्य और...यह विषाल प्रवेष द्वार। हम दुलमेरा के लाल पत्थरों से निर्मित राजस्थान के शानदार महल गजनेर पैलेस में है। मोर अपनी मीठी आवाज में जैसे स्वागत कर रहे हैं। मरूस्थल में विषाल पेड़। उन पर चहचहाते पक्षी। ठंडी हवाएं अवर्णनीय शांति का अहसास करा रही है।‘खमाघणी हुकूम। म्हूं आपरी काईं खिदमत कर सकूं हू।’पारम्परिक पगड़ी और वेषभुषा में बड़ी-बड़ी मूंछो में सहज मुस्कान के साथ चौड़ी कद काठी का रोब वाला एक व्यक्ति झुक कर स्वागत करते हुए जब यह कहता है तो राजस्थान की संस्कृति जैसे मेरे पर्यटक मित्र की आंखों के सामने साकार हो उठती है। इन्द्र गजनेर पैलेस के अप्रतिम सौन्दर्य को ही निहारने मंे लगा है। लाल पत्थरों से निर्मित प्रकृति की गोद में बसे पैलेस के आस-पास के क्षेत्र को देखकर भी उसे घोर अचरज हो रहा है। मैं उसे बताता हूं, ‘अब यह हैरिटेज होटल है। कभी बीकानेर के पूर्व महाराजा गजसिंह ने विक्रम संवत् 1803 में यह गांव बसाया था।’ एचआरएच ग्रूप के हेरिटेज होटल का मैनेजर पूर्व परिचित है, उसे दूरभाष पर सूचित कर दिया था इसलिए वह हमारा इन्तजार ही कर रहा था।’ इन्द्र पैलेस की हरियाली को देखकर हैरत में है। सामने पैलेस से सटी झील का नजारा देखकर तो चौंक ही पड़ता है। उसे विष्वास नहीं हो रहा, गांव में ऐसा दृष्य दिखायी देगा। एक छोटी सी बोट तैर रही है पानी में। साफ पानी। थोड़े थोड़े अन्तराल में पैलेस के पत्थरों से टकराकर मधुर ध्वनित करता मन को जैसे आंदोलित कर रहा है। ‘तुम्हें यहां सब जानते हैं!’‘हां, जब भी बीकानेर आता हूं। यहां आता ही हूं। बचपन से ही आता रहा हूं। तब यह हैरिटेज होटल नहीं था। मित्रों के साथ पिकनिक मनाने का यही गंतव्य था।’‘सच में, मन करता है, यहीं बस जाऊं।’‘हैरिटेज वाले लूट लेंगे, सोच लो।’ मैं जब यह कहता हूं तो इन्द्र जोर से हंस पड़ता है। सुन्दरता को होटल वालों ने ही सहेज लिया है...नहीं तो यहां भी उजाड़ होता। कितने किले, महल ऐसे ही तो उजाड़ होते चले गए हैं।...सोचते हुए ही मैं इन्द्र के साथ झील के किनारे टहल रहा हूं। हैरिटेज होटल मैनेजर मल्होत्रा हमारे पास आकर चाय की मनुहार करता है। हम ना नहीं करते। वह इसके लिए आदेष दे देता है, फिर इन्द्र की ओर देखते हुए बताने लगता है, ‘यह जो झील आप देख रहे है, उसके जल ग्रहण हेतु बीकानेर के महाराजा ने कभी ब्रिटिश इंजीनियरों को बुलाया था। ब्रिटिष इंजीनियरों ने इस तकनीक से इस कृत्रिम झील का निर्माण किया कि गांव के किसी भी कोने से इस झील को देखें, आपको यह वैसी दिखायी नहीं देगी जैसी गजनेर के शानदार पैलेस से दिखायी देती है।’‘तो क्या यह वही झील है जो गांव में आते ही हमने देखी थी?’‘हां, यही झील गजनेर गांव में आगे चलकर तालाब का रूप ले लेती है। वहां उस तालाब में नहाने वाला कोई सोच नहीं सकता कि वह गजनेर पैलेस की शानदार झील के एक हिस्से में नहा रहा है। दरअसल पैलेस में रहने वालों और आने वाले मेहमानों के लिए इस मनोरम झील में जल प्रबंधन की व्यवस्था कुछ इस तरह से की हुई है कि भले ही गांव के तालाब का पानी सूख जाए परन्तु पैलेस की झील कभी नहीं सूखती। सदा भरी रहती है यह झील। यही नहीं झील में जीव-जन्तु भी हैं और प्रति वर्ष यहां विदेषी प्रजातियों के पक्षी भी विचरण करने लाखों मिलों की दूरियां तय कर आते हैं। प्रति वर्ष यहां इम्पीरियन ग्राण्डस विदेशी पक्षी भी आते हैं। झील में आठ ‘वाटर चैनेल्स’ एवं स्थान-स्थान पर ‘रूल्स गेट’ और बांध आदि बने हुए है।’...हम गजनेर झील के सौन्दर्य में ही खोए हुए हैं।...अरे! दूर वह पक्षियों का जोड़ा भी झील में सूस्ता रहा है।...रमणिक। जल महल से झील का ऐसा दृष्य। सोचकर ही अचरज होता है। रेगिस्तान में अद्भुत है झील का ऐसा सुहावना दृष्य। सच! गजनेर के ऐतिहासिक पैलेस में चार चांद लगाती है यह कृत्रिम झील। लाल पत्थरों से निर्मित गजनेर के ऐतिहासिक पैलेस का महत्व इसलिए भी है कि इसमें प्राचीन और आधुनिक शैली की स्थापत्य कला का सांगोपांग मेल है। गजनेर पैलेस आजादी के बाद वर्षों तक उपेक्षित पड़ा रहा।...1994 में उदयपुर के महाराणा और हिस्टोरिक रिसोर्ट एंड होटल्स यानी एचआरएच ग्रूप के अध्यक्ष अरविंद सिंह मेवाड़ ने इसे होटल में परिवर्तित करते इसके जिर्णोद्धार का बीड़ा उठाने की पहल की।...अब इस हेरिटेज होटल के महल सूइट बन गए हैं। पश्चिमी शैली में स्थानीयता का पुट लिए इस ऐतिहासिक पैलेस की स्थापत्य कला, शिल्पकला इतनी भव्य है कि मन करता है इसे निहारते रहें। बस जाएं यहीं। यहां के डूंगर निवास, मंदिर चौक, गुलाब निवास ओर चंपा निवास में लाल पत्थरों का स्थापत्य सौन्दर्य अवर्णनीय है। पैलेस में महाराजा गजसिंह द्वारा बनाए सभी महल एक से बढ़कर एक हैं। यहीं एक सुन्दर कालीन भी है। इन्द्र सहज प्रष्न करता है, किसने बनायी?...’पता चलता है, बीकानेर के केन्द्रीय कारागृह में कैदियों द्वारा निर्मित है यह कालीन। महल के किसी भी कोने से इस कालीन को देखें। आपको हर कोने से यह अलग रंग में दिखायी देगा। है, न आष्चर्यजनक। गलीचे की बुनाई इतनी शानदार कि इसके बारे में हमारे पास कुछ कहने को शब्द कम पड़ रहे हैं।गजनेर पैलेस में ही हम लंच लेते हैं।...कुछ पल सुस्ताकर वहीं आस-पास घूम लेते हैं।...पूरा दिन गजनेर पैलेस में ही बिताते हैं।...पाषाण सौन्दर्य में रेगिस्तानी की सुन्दरता और ढ़ेरों बाते...पता ही नहीं चलता दिन बीत जाता है। ...सांझ गहरा रही है। पैलेस की छतों पर रियासत काल में बने कांच के झुमरों में बल्ब की रोषनी बेहद भली-भली लग रही है। इस रोषनी में डीनर का आनंद लेते प्रकृति के इस सुरम्य स्थल पर पसरी रेत की शांति मन में जो अहसास करा रही है, उसे बंया नहीं किया जा सकता। अपने पर्यटक मित्र के साथ गजनेर पैलेस से लौटे इतने दिन हो गए परन्तु अभी भी पैलेस के जल महल के किनारों से टकराते झील के पानी की मधुर आवाज कानों में प्रकृति के अद्भुत दृष्य की अनुभूति कराती जैसे हमे फिर से बुला रही है ‘पधारो म्हारे देस’...।



डेली न्यूज़ के रविवारीय "हम लोग" में प्रकाशित, दिनांक ७-३-१०

Thursday, March 4, 2010

संस्कृति के अंतर्द्वन्द की पुनर्रचना

सिनेमा का कला से सीधा ही नहीं बल्कि निकट का रिष्ता है। इसलिए कि दोनों ही एक दूसरे के लिए अनंत संभावनाओं के द्वार खोलते हैं और बेशक व्यावहारिक रूप में सामाजिक सरोकारों से जुड़े भी हैं। बहरहाल, कला की सभी विधाएं अंततः अपने माध्यमों से कोई न कोई कथा कहने का ही प्रयास करती है। मुझे लगता है कला के विभिन्न रूपों का पारस्परिक संतुलित समन्वय करना कला को एक प्रकार से अभिजात्य वर्ग की सीमाओं से बाहर निकाल उसे जन सामान्य तक पहुंचाने की प्रक्रिया ही है और फिल्म में इसकी सर्वाधिक संभावनाएं हैं। पिछले दिनों जयपुर के नमन गोयल की बनायी ‘एन अफेयर विद न्यूयॉर्क’ देखते इसे जैसे और गहरे से अनुभूत किया। नमन न्यूयॉर्क फिल्म एकेडमी में फिल्म निर्माण और निर्देषन की बारीकियां सीख रहा है। यहां रहते उसने अपने वतन के संस्कारों की स्मृतियों में न्यूयॉर्क की जीवन शैली, संस्कृति को फिल्म में जैसे गूंथ दिया है। दैनंदिन जीवन की साधारण घटनाओं से विषेष उद्दीपन में मन और दैहिक संबंधों के साथ संस्कारों से मुक्ति के घटनाक्रमों में तेजी से बदलते फिल्म के दृष्य घनीभूत नाटकीय रूप धारण कर देखने वाले को आंदोलित करते हैं। रचनात्मक अर्थों में कहानी के बिखरे कोलाज की एक बड़ी विषेषता यह भी है कि इसमें कमेन्ट्री, परस्पर संवाद और सब टाईटल्स की मदद से कथा के बड़े सूत्रों को अल्पअवधि में सहज संप्रेष्य किया गया है। खुद के संस्कारों के बरक्स अपने तई सामाजिकि संहिताओं का एक प्रकार से विरेचन करते नमन ने फिल्म में यथार्थ के विकृत को ट्रिटमेंट में कला की सौन्दर्यानुभूति भी दी है। स्क्रिन पर ताजमहल, खजूराहों की मूर्तियों के बहाने न्यूयार्क और भारतीय दर्शन की गहराईयों को भी जिया गया है। यथार्थ जीवन के कटू सत्यों के साथ उनके संघर्ष में नमन ने अपनी फिल्म में संस्कृतियांे के अंतर्द्वन्द को सैलुलाइड पर जैसे पुनर्सृजित किया है। नमन ने इससे पहले ‘अदर देन राइट ऑर रोंग’, ‘सस्पेक्ट लिस्ट’, बिगनिंग टू गेट बाल्ड’ जैसी लघु फिल्में भी बनायी है। कथ्य की मौलिकता और भाव बोध को अधिकाधिक सुगम करती उसकी बनायी फिल्में मन और मस्तिष्क को झंकृत करती कुछ सोचने को विवष करती है। मुझे लगता है, वास्तविकता की पुनर्रचना की सिनेमा की आभासी क्षमता ही उसके कला सरोकारों को और अधिक प्रमाणित करती है।
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक ५-३-१०