Friday, September 14, 2012

मांड में संस्कृति का उजास


मधुर और श्रृंगारिक राग है मांड। आरोह-अवरोह में वक्र सम्पूर्ण राग। समय का कहीं कोई बंधन नहीं। जब चाहे, तब गायें। संगीत की विष्णु नारायण भातखंडे की परम्परा की मानें तो मांड राग बिलावल थाट में आता है परन्तु सुनते हैं तो मांड का लोक संगीत मिश्र राग में ध्वनित होता लगेगा। स्व. अल्लाह जिलाई बाई का ‘पधारो म्हारे देस...’ तो का पर्याय ही हो गया है। उनके स्वर माधुर्य में न जाने कितनी बार इसे सुना और हर बार सुनने का सर्वथा नया आनंद मिला। 
मांड को यहां याद करने की वजह है, पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र में संगीत नाटक अकादेमी द्वारा आयोजित मांड समारोह। इसमें मांड गायकी पर व्याख्यान भी हुए और कलाकारों ने मांड के भिन्न रूप भी प्रस्तुत किये। मांड सुनने का हाल यह था कि लगातार तीन दिन प्रेक्षागृह श्रोताओं से खचाखच भरा रहा। माने लोक संगीत की जड़ें अभी भी हरी है। आखिर यह लोक संगीत ही है जो सहज मानवीय संवेदना से जोड़ता हमें अपने आपे से रू-ब-रू कराता है। और मांड तो राजस्थान के लोक का आलोक है। 
लोकगीत की स्वर लहरियों में निषाद का प्रयोग भी मांड में गजब का होता है। अल्लाह जिलाई बाई, गवरी देवी, मांगी बाई की निषाद प्रयोग की मांड सुनते गले का उनका कंपन मन में गहरे से बस जाता है। जवाहर कला केन्द्र में ‘महला री खिड़की खोलो..., ‘जला रे...’छप्पड़ पुराणा पड़ग्या, तिड़कन लाग्या बांस...’ मांड सुनते मन में यह खयाल भी बार-बार आ रहा था कि यही वह लोक संगीत है जिसमें बिछोह, श्रृंगार, सौन्दर्य के भाव गहरे से सजते हैं। सुनने के बाद भी गान से हम उबर ही कहां पाते हैं!
बहरहाल, यह मांड ही है जिसमें राजस्थान के विभिन्न अंचल अपनी संस्कृति में ध्वनित होते है। माने बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, सीकर, उदयपुर, जोधपुर की मांड गायकी में स्थान-विषेष के लोगों के रीत-रिवाज और संस्कृति के साथ ही वहां की बोली की झलक भी अलग से ध्यान खींचती है। मांड के माधुर्य में रमते ही कभी राजा-महाराजाओं ने रियासतों में गुणीजन खानों की स्थापना कर वहां बाकायदा मांड के प्रषिक्षण की भी पहल की। बीकानेर और जोधपुर के गुणीजनखानों से ही अल्लाहजिलाई बाई और गवरी देवी सरीखी स्वर कोकिलाएं हमें मिली। मारवाड़-मेवाड़ की मांड गायकी का अपना अंदाज है। अरसा पहले उदयपुर की ख्यात मांड गायिका मांगीबाई से जयपुर में ही लम्बा संवाद हुआ था तब उन्हें सुना भी था। याद पड़ता है, अस्सी पार मांगीबाई ने ‘बायरियो’ सुनाया था। उनके कंठ माधुर्य में मेवाड़ी संस्कृति का उजास भी जैसे दिखाई दे रहा था। अल्लाहजिलाई बाई ‘पधारो म्हारे देस...’गाती तो पावणों की मेजबानी की राजस्थानी संस्कृति के दृष्य चितराम भी अनायास आंखों के सामने घुमने लगते हैं। ‘सुपनो,’ ‘हेलो, ‘जल्ला’, ’ओळ्यू’, ‘कलाली’, ‘कुरंजा’ गीतों को सुनेंगे तो राजस्थान की संस्कृति के अनूठे चितराम, परम्पराएं भी आंखों के सामने जैसे तैरने लगेगी। यही तो है लोक का वह माधुर्य जिसमें सुना ही नहीं जा सकता, सुनते हुए देखा भी जा सकता है। 
यूं शब्द व्याख्या करेंगे तो मांड का सामान्य अर्थ होगा-मांडना, अंकित करना। मांड सुनते हैं तो गान के सुर मन में कहीं गहरे से अंकित ही तो होते हैं। आखिर ऐसे ही तो अंकित नहीं है मन में लोक गायिका धीरा सेन की वह मधुर गायकी। याद पड़ता है, वह काॅलेज के दिन हुआ करते थे। तब आकाषवाणी बीकानेर में अस्थायी उद्घोषक का कार्य भी करता था। राजस्थानी लोकगीतों का बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम ‘गुंजे गांव गुवाड़’ प्रस्तुत करते हर सप्ताह उसकी शुरूआत धीरा सेन के ‘काळो जी काळो, कईं करो सहेल्या ए...’ से ही करता। इस लोकगीत में ‘उभण तो उजास बरण्यो, गांया रा गुवाड़ चाल्या, पंछिड़ा महाराज चाल्या..’ बोल सुन सब कुछ भूल जाता। आंखों के सामने गांव के गोबर लीपे घरों की ओर लौटती धूल उड़ाती गायों के दृष्य और एक अजीब सा अपनापा तैर जाता। बनावटी रहित परिवेष का अपनापा।... असल संगीत यही तो है। अपने आपे से साक्षात् आखिर इस सगीत के उजास से ही तो हो सकता है! 


Friday, September 7, 2012

दृष्य यथार्थ में अंतर्मन संवेदना के बिम्ब


कलाकारों से बिछोह का यह दुखद काल है। कुछेक वर्षों के अंतराल में ही कृपालसिंह शेखावत, द्वारकाप्रसाद शर्मा, ज्योतिस्वरूप, डॉ. प्रेमचन्द गोस्वामी, सुमहेन्द्र और कुछ दिन पहले पी.एन. चोयल जैसे कला स्तम्भ हमें छोड़कर चले गये। मुझे लगता है, इनके साथ ही राजस्थान की कला के जैसे एक युग का अवसान हो गया है। पी.एन. चोयल राजस्थान के ऐसे कलाकार थे जिन्होंने अपने दौर में चित्रकला में नवीनता का सूत्रपात किया। यह नवीनता कैनवस पर फॉर्म को लेकर ही नहीं थी बल्कि इतिहास, संस्कृति और सभ्यता के नए सृजन संदर्भ लिये थी। कभी अपने चित्रों को उन्होंने ‘फोटो रियलिज्म’ की संज्ञा दी थी। शायद इसलिये कि अपने उकेरे चित्रों में वह दृष्य यथार्थ के साथ अंतर्मन संवेदनाओं के गहरे बिम्ब रखते थे। खैर, यह उनके कार्य के आरंभ के दिनों की बात है। बाद के उनके काम को देखंे तो यह सहसा ही यह अहसास होता है कि चोयल के चित्र संरचना और रूपाकारों में देष की कला धारा से सर्वथा पृथक अपनी मौलिक पहचान लिये थे। उनके चित्रों में वाष और टेम्परा की एप्रोच भले रही हो परन्तु जड़त्व से मुक्त उन्होंने अपने तई चित्रों की नई शैली ही एक प्रकार से विकसित की। यह शैली ऐसी थी जिसमें रेखीय न्यूवता में धुमिल होते रंगो में स्मृतियों, भीतर की सोच और अनुभवों का अनूठ ताना-बाना कैनवस को समृद्ध करता था।
पी.एन. चोयल की कलाकृतियां देखता हूं तो औचक यह विचार भी जेहन में कौंधता है कि रूप-अरूप, अंतरंग-बहिरंग से परे वह जो बनाते थे उसमें देखे हुए यथार्थ के साथ कहन का वह मुहावरा था जिसमें चित्र धुंआ-धुंआ होते परिवेष में देखने वाले की सोच में रच-बस जाता। भैंसो की उनकी चित्र श्रृंखला को ही लें। भैंसों की शरीर संरचना के साथ उनकी गति, मस्ती और विचरण की आवारगी के कोलाज मन में इस कदर बस जाते है ंकि एक बार नहीं, बार-बार उन्हें देखने का मन करता है। भैसों के चित्र ही क्यों, आकृतिमूलक उनके तमाम जो दूसरे चित्र हैं उनमें अनुभव और स्मृतियों का अपनापा गहरे से ध्वनित होता है। इसीलिये कि वहां दृष्य यथार्थ की बजाय सौन्दर्य की कला दीठ सर्जक बनी है। उनके चित्रों में स्वयं उनकी अभिव्यक्ति की छटपटाहट के साथ ही समय से उपजे तनावों को भी स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। कभी उन्होंने अपनी एक कलाकृति में नारी देह से निकलती आग की लपटों को नियंत्रित करते घोड़े को रूपाकार दिया तो ऐसे ही ‘घुंघट’ श्रृंखला के अपने चित्रों में नारी की भोग्या स्थिति के जरिए स्त्री के देह के दर्शन को जैसे उभारा है। पौराणिक प्रसंगों के उनके चित्रों में, चाहे वह कृष्ण एवं अर्जुन संवाद हो या फिर रावण वध हो-इनके पार्श्व में नारी की दयनीय स्थिति भी अलग से उभारी दिखाई देती है।  
बहरहाल, पी.एन. चोयल ने नारी संवेदनाओं को ही अपने कैनवस पर सांगोपांग ढंग से नहीं उभारा है बल्कि उनके कैनवस में उभरी इतिहास प्रसिद्ध इमारतें भी अलग से आकृष्ट करती है। याद पड़ता है अर्सा पहले उनकी ‘परसेप्शन ऑफ चित्तौड़’ श्रृंखला चित्रों को देखते हुए मन उनमें जैसे रम सा गया था। धुंध के आवरण से धीरे-धीरे स्पष्ट होती चित्तौड़ के किले, वहां के महलों की आकृतियांे के भग्नावशेष के यथार्थ चित्रण के बावजूद उनमें कला के लोक का आलोक ऐसा है, कि मन उन आकृतियों पर ही भटकने लगता है। यह उनकी कला का वह सौन्दर्य ही तो है जो जिर्ण-शीर्ण और खंडहर होती आकृतियो में भी जैसे जान डालता है। चाक्षुस यथार्थ की उनकी कलाकृतियां में एन्द्रिक बोध होता है। रेखांकन इतना सधा हुआ कि उकेरी आकृतियां और उनका अहसास मस्तिष्क पर छा जाता है। सादगी भरे रंगों के अंतर्गत काले, भूरे, मटमैले रंगों के साथ ही उन्होंने चटख रंगों का जैसा प्रयोग किया है, उससे उनकी संवेदनाएं पूरी तरह से दर्शक के सामने उभरकर सामने आती है। यह जब लिख रहा हूं, रंगो को ब्रश से कैनवस पर लगाने की बजाय बहाकर लगाने की उनकी तकनीक से सृजित उनके बहुतेरे चित्र ही जेहन में कौंध रहे हैं। 

Friday, August 31, 2012

सभ्यता-संस्कृति की छाया कला दीठ



विश्व की प्राचीनतम और अब तक निरंतरता रखने वाली सभ्यता और संस्कृति में भारत के साथ चीन भी शुमार है। यह चीन ही है जिसका  लिखित इतिहास चार हजार वर्ष से भी पुराना है। माने अधुनातन विकास से ही नहीं अतीत की कला, साहित्य और संस्कृति से भी चीन अत्यधिक समृद्ध है। संस्कृति की उसकी निरंतरता को वहां के जन-जीवन, स्थापत्य, संगीत, नृत्य और तमाम दूसरी कलाओ में गहरे से अनुभत किया जा सकता है।
बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र में पिछले दिनों चीन की सभ्यता एवं सस्कृति से साक्षात् कराते नारायणी गुप्ता के छायाचित्रों की प्रदर्षनी लगी थी। सुखद यह था कि इसमें चीन के कलात्मक जीवन के किसी एक पहलू की बजाय तमाम आयामों को नारायणी ने अपने कैमरे की अपनी आंख से पकड़ते उसे सार्वजनीन किया है। 
मुझे लगता है, छायाकला रूपों की मौन मुखराभिव्यक्ति है। इसमें देखना ही महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि दृष्य के भीतर निहित सौन्दर्य की दीठ भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। यह छायाकला ही है जिसमें अंतर्मन संवेदना के जरिये छायाकार बहुतेरी बार दृष्य मंे निहित सौन्दर्य को कईं गुना अधिक सघनता से मुखरित कर देता है। तब यथार्थ दृष्य की बजाय उसका कैमरे की आंख का संवेदन रूपान्तरण अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। नारायणी के छायाचित्रों के साथ यही है। वह देखे हुए दृष्यों की विषय-वस्तु के साथ घटना की संवेदना, क्षण की अपूर्वता और उसमंे निहित गति को अपने कैमरे में भीतर की अपनी संवेदना से पकड़ती है। इसीलिये बहुतेरी बार साधारण दृष्य भी उसके छायाचित्रों में संवेदना की छाया-कला दीठ से असाधरण प्रतीत होने लगते हैं। मसलन उसकी इस छायाचित्र प्रदर्षनी में एक दृष्य है सुन्दर से एक पूल का। चाईना के इस ब्रिज का नारायणी का कैमरा फ्रेम दृष्य में निहित सौन्दर्य को कईं गुना अधिक उद्घाटित करता है। इस तस्वीर में छाया-प्रकाष प्रभाव, कोण, दृष्य माप और गति का संतुलन अद्भुत है। पानी में उभरती ब्रिज की छाया और ठीक ब्रिज के नीचे चलती नाव और ऊपर पर्यटकों की रेलमपेल। देखता हूं तो, दृष्य संयोजन की यह दीठ मुग्ध करती है। आकाष की निलाई के साथ दृष्य संयोजन में नारायणी की छाया-कला सूझ को इस चित्र में गहरे से पहचाना जा सकता है। 
बहरहाल, दृष्य संवेदन के ऐसे ही छायाचित्र और भी हैं। संघई के सुप्रसिद्ध बौद्ध मंदिर में बुध की लेटी हुई प्रतिमा के चित्र को ही लें। इसमें नारायणी ने लेटे हुए बुद्ध के मौन और निर्वाण को गहरे से मुखरित किया है। खास बात यह कि प्रतिमा के साथ आस-पास का शांत परिवेष भी यहां उद्घाटित है। एक छायाचित्र में सिंघई के पुराने घरों का दृष्य है तो एक में कला संग्रहालय के संस्थापन का दर्षाव अतीत के साथ अधुनातन संस्कृति से रू-ब-रू कराता है। सिंघई के एंटिक बाजार में इमारतों का वास्तु षिल्प भी मन मोहता है। यह नारायणी के कैमरे की आंख की वह संवेदना ही है जिसमें बाजार की इमारतों से निकले छज्जों को परस्पर मिलाते वहां के वास्तु सौन्दर्य की सूक्ष्म अभिव्यंजना की गयी है। मुझे लगता है, वह छाया चित्रों में दृष्य के साथ तमाम उसकी दूसरी संभावनाओं को भी अपने कैमरे से पकड़ती है। ऐसा ही एक चित्र है छोटे से एक बच्चे का। चाईना के भविष्य से अभिहित इस छायाचित्र में सीढ़ियां, बच्चे की मासूमियत और भयमुक्तता के बहाने दृष्य के गहरे संवेदन आयाम हैं। दृष्य संवेदना की दीठ ही तो है छायाकला! टाईनामेन स्कवायर, चीन की दीवार, संगीत, नृत्य और चित्रकलाओं के साथ ही आधुनिक चीन के विष्व सरोकारों को भी बहुत से चित्रों में अभिव्यंजित किया गया है। कोई संस्कृति कैसे बरसों-बरस अपनी निरंतरता बनाये रखती है, कैसे वह संस्कारित होती है और कैसे उसमें कलाओं की अनुगूंज को सुना जा सकता है, नारायणी के छायाचित्रों में इसे गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। सोचता हूं, चीन की सभ्यता और संस्कृति के साथ ही नारायणी की छाया कला दीठ की भी तो संवाहक है यह छायाचित्र प्रदर्षनी। आप क्या कहंेगे!


Friday, August 24, 2012

कुमारस्वामी व्याख्यान में रवीन्द्र का चित्रकर्म


भारतीय कला का सूक्ष्म मूल्यांकन कर उसे विश्वभर में प्रतिष्ठित करने का श्रेय किसी कला अध्येता को जाता है तो वह डॉ. आनन्द के. कुमारस्वामी हैं। पढ़ते हैं तो हमारे यहां की चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला, नृत्य, संगीत आदि का उनका चिंतन गहरे से मन में घर करता है। शायद इसलिये कि यह कुमारस्वामी ही हैं जो कला के इतिहास के साथ उसकी निर्माण-प्रक्रिया की गहराई में भी जाते हैं। 
बुधवार को जवाहर कला केन्द्र में आनन्दकुमार स्वामी स्मृति व्याख्यान रखा गया था। केन्द्रीय ललित कला अकादमी प्रतिवर्ष यह आयोजन करती है। इस बार सुखद यह रहा कि यह आयोजन राजधानी दिल्ली में नहीं होकर जयपुर में हुआ। शांतिनिकेतन विश्वभारती से आए प्रो. आर.शिवाकुमार ने कुमारस्वामी व्याख्यान के अंतर्गत रवीन्द्रनाथ टैगोर की चित्रकला में आधुनिकता को चुनते हुए बहुत सी पहले प्रकाश में नहीं आयी बातों को साझा किया। उन्हे सुनते हुए आनन्दकुमार स्वामी के कला आलोचना कर्म की उन विशेषताओं पर भी औचक ध्यान गया जिसमें चित्रकला में जो दिख रहा है, वही नहीं बल्कि चित्र के भीतर निहित में भी वह गहरे से जाते उसकी अपने तई खोज करते रहे हैं। 
बहरहाल, प्रो. आर.शिवाकुमार अपने व्याखान में जब यह बता रहे थे कि रवीन्द्रनाथ ने चित्रकला की विधिवत शिक्षा नहीं ली बल्कि अपने अग्रजों और घर-परिवार के परिवेश, घटनाओं से उन्होंने सीखा तो लगा यही तो वह कारण थे जिससे अपने तई प्रयोगधर्मिता के साथ उम्र के आखरी पड़ाव में भी उन्होंने चित्रकला में संवेदना का सर्वथा नया मुहावरा दिया। मुझे लगता है, यही वह मुहावरा है जिसके अंतर्गत उनकी कलाकृतियों मे उभरे बिम्ब, प्रतीक और कालेपन में औचक उभरती रेखाओं की धवलता अपनी मौलिकता में आज भी हमें आकृष्ट करती हैं। 
प्रो. आर.शिवाकुमार ने रवीन्द्र की कला पर चर्चा के साथ ही जापान और योरोप में कला मंे आधुनिकता के प्रयोगों से रवीन्द्र की कला को जोड़ा भी। मसलन जापान की कलाओं के अर्न्तनिहित उस चुप्पी पर भी वह गये जिसमें भीड़ के बावजूद सन्नाटे का छंद हैं। जहां चाय की केतली में उभरी आकृतियांे में समुद्र की लहरें, बहती नदियों के गान के साथ ही कैलिग्राफी में सौन्दर्य की सर्जना है। जापान ही क्यों चीन की कलाओं में उभरी मानव संरचनाओं, भांत-भांत की मुखाकृतियों और वहां की वास्तु कला में उभरी आधुनिकता भी तो किसी न किसी रूप में विश्व में कला सर्जन का हेतु रही ही है।
रवीन्द्र के चित्रांे पर गौर करता हूं तो न जाने क्यों वहां एक खास तरह की एकान्तिका को अनुभूत करता हूं। माने वहां सब कुछ हैं, रेखाएं-सघन टैक्सचर और रंगों की आभा परन्तु इस सबके बावजूद जो निरवता और शांति वहां है वह अपने आपमें देखने वाले से जैसे बतियाती है। और रवीन्द्र ने तो अपने समय के आधुनिकतावाद को गहरे से चित्रों में जिया है। यह ऐसा है जिसमें भीड़ के बावजूद खालीपन ध्वनित होता है और शोर के बीच भी पसरे सन्नाटे का कहन है। कभी रवीन्द्र ने कहा भी था, ‘मैं अकेला हूं परन्तु मेरे आस-पास बहुत से लोग हैं और  उनसे मेरी संवेदनशीलता बहुत से स्तरों पर प्रभावित होती है।’ उनके चित्रों को देखंेगे तो लगेगा अपनी एकान्तिका में आस-पास की घटनाओं, लोगों की संवेदनशीलता को भी वह ध्वनित करते हैं। यह उनके चित्रों के सन्नाटे का मधुर छंद हैं। स्याह से धवलता की ओर उन्मुख होती उनके चित्रों की रेखाएं, और रंगों की आभा इसीलिये सौन्दर्य का सर्वथा नया मुहावरा लिये है। आधुनिकता में रचे-बसे उनके चित्रों को देखते हुए इसीलिये राफेल की याद आती है, जापानी कला की निरवता को हम अनुभूत करते हैं, पिकासो की मुखाकृतियां औचक जेहन में कौंधती है तो माइकल एन्जेलो की शरीर संरचना वाली कलाकृतियां भी न जाने क्यों मन में घर करने लगती है। कला में आधुनिकतावाद के इस सामने से ही तो सिरजा उन्होंने कला का अपना जग! आनन्दकुमार स्वामी व्याख्यानमाला में प्रो. आर.शिवाकुमार को सुनना सुखद था, इसलिये भी कि इसमें उन्होंने रवीन्द्र की वह दुर्लभ कलाकृतियां भी दिखायी, जिनमें आधुनिकता बोध के साथ भीतर की उनकी कला संवेदनशीलता का गहरा आकाश है। 

Friday, August 17, 2012

माटी एक भेष धरि नाना


बरसात की बूंदे धरती के लिये जीवन है। बारिष होती है तभी तो ओढ़ती है धरती हरियाली की चादर। मिट्टी में घूला बीज प्रस्फुटित होता है। धरती से उठती है सौंधी सी महक। यह ऐसी है जिसे हर कोई महसूस करता है। ऐसे ही तो षिल्प में ढ़ल मिट्टी सर्जन की संपूर्णता का हेतु बनती है। यह मिट्टी का ही गुण है कि उसे किसी भी आकार और सांचे में ढाला जा सकता है। कैसे भी इसे बरत षिल्प की सुन्दर परिणति की जा सकती है। माटी है ही सर्जन की प्रतीक। सर्जन से गहरा अंतःसंबंध जो है इसका।  
माटी माने मिट्टी। मनुष्य की सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आवष्यकताओं की पूर्ति के लिये उपयोगी वस्तुओं के निर्माण का प्राचीनतम साधन। कुम्हार मिट्टी से ही तो करता है सर्जन। सोचिए! पृथ्वी, सूर्य, पवन, अग्नि और जल से ही तो यह संसार है और कुम्हार जब नया घड़ा ढालता है तो इन सबसे ही अपने सर्जन को संपूर्णता देता है। पंचभूत तत्वों से बनता है शरीर और माटी का सर्जन भी इन्हीं तत्वों से होता है। कुम्हार को आखिर यू ंतो प्रजापति नहंी कहा जाता! 
हमारे यहां तो मिट्टी के ही हैं तमाम हमारे सर्जन सरोकार। तमाम हमारी परम्पराओं का निर्वाह। दुर्गा पूजा, गणगौर, गणपति आदि की प्रतिमाएं मिट्टी से ही तो बनती है। बाकायदा इनमें प्राण प्रतिष्ठा होती है। माना जाता है, पर्वोत्वस पर दुर्गा, गौरी, गणति जगते हैं और जब उनसे आत्मा अलग होती है तो फिर से ये भूमि और जल में विसर्जित कर दिये जाते हैं। माने जहां से ये आए, वहीं फिर से लौट जाते हैं। मिट्टी इसीलिये तो जीवन का प्रतीक मानी जाती है। कहें, मनुष्य को उसके समग्रपन में अवस्थित करने का कार्य किसी के जरिये होता है तो वह माटी ही है।
राजस्थान की मोलेला की मृण मूर्तियांे जग प्रसिद्ध है। मोलेला में कलाकारों को माटी मूर्तियों गढ़ते बहुतेरी बार देखा है। हर बार लगा, धरती पुत्र षिल्पकार सहज सरल तरीके से सर्जनात्मकता का निर्वहन करते हैं। पीढ़ी-दर पीढ़ी सर्जन की यह विरासत वह ऐसे ही छोड़ते जाते हैं। परम्परा और आस्था से निरंतर आगे बढ़ता जाता है सर्जन का यह सफर। षिल्पकार मिट्टी में रूप-अरूप, अदृष्य-प्रत्यक्ष, खंडता-असंलग्नता के बहुविध वैचित्र्य का एक ऐक्य सुर का गान करते हैं। कुम्हार जो मूर्तियां गढ़ते हैं, उनमें भीतर और बाहर के तमाम संघर्षों की बानगी है परन्तु अनूठी संगति भी है। सर्जन की संगति। जो दिखता है, वह इस जगत से है भी और नहीं भी। माने चिन्मय वास्तव। 
कहते हैं, मानवीय-सम्बन्धों में भाषा से भी अधिक व्याप्त होने वाला तत्व कोई है तो वह षिल्प ही है। इसमें संप्रेषण के सामान्य अवरोधों को समाप्त करने की क्षमता जो है। शायद इसीलिये आदि मानव ने अपने दैनिक उपयोग की वस्तुओं और भावनाओं का षिल्प संसार सर्वप्रथम रचा। सिन्धुघाटी काल के उपलब्ध षिल्पकारिता अवषेषों पर जाएं तो सहज यह कहा जा सकता है कि वहां सामान्य व्यवहार की वस्तुएं भी सौन्दर्यबोधक कृतियों में रूपान्तरित हो गई। कला के हमारे इतिहास में उपयोगिता में सौन्दर्य का समावेष कर षिल्प के अंतर्गत अंतरंग जीवन में भी सुन्दरता के महत्व को सदा प्रतिपादित किया गया है। यूं भी षिल्पकारिता जीवन के सहज स्पन्दन से उत्पन्न पूर्णता के गर्भ में ही प्रस्फुटित हुई है। यह माटी ही तो है, जिसमें विराट् से व्यष्टि के संबंध रूपायित होते हैं। कबीर इसीलिये तो एक मिट्टी में अनेक रूपधारी अखंड ब्रह्म का नाद करते हैं, ‘माटी एक भेष धरि नाना तामहि ब्रह्म पछाना।’ ...तो बारिष के इस दौर में भूमि पर पड़ती टप-टप बूंदों को निहारें। अनुभूत करें माटी के सर्जन की सौंधी महक। 


Friday, August 10, 2012

कृष्णम वन्दे जगदगुरुम

भगवान श्रीकृष्ण! बंसी बजईया, कृष्ण कन्हैया। वह जिसमें सम्मोहन है। आकर्षण है। तमाम हमारी कलाओं के संदर्भ अंतत: इस श्रीकृष्ण से ही तो जुड़े हैं। वे रसेश्वर हैं। वेणुवादक हैं। नर्तक हैं। शंखनाद करने वाले हैं। कलाओं के युग्म। ईश्वर! चौसठ कलाओं की समग्रता लिए पुरूषोत्तम। यह श्रीकृष्ण ही हैं, जिनका चरित्र मोर पंखों की मानिंद मनभावन रंगों से रंगा है। सब ओर से विरक्त। स्वयं अनासक्त। पर कर्षयति इति कृष्ण।" माने श्रीकृष्ण का अर्थ ही है, वह जो आकर्षित करे। इसीलिए तो उन पर हर कोई आसक्त हुआ जाता है। कोई उनकी बांसुरी की तान पर। तो कोई उनकी मधुर मुस्कान पर। कल्पना करता हूं...वे बसी बजाते होंगे, तो वन मे सभी भाव विभोर हो नर्तन ही तो करते होंगे। स्वयं श्रीकृष्ण नर्तक हैं। नृत्य सम्राट। आनंद, उमंग और उत्सवधर्मिता है उनका नाच। सबको रिझाते। हंसते-गाते। कहते हैं कृष्ण जब बंसी बजाते तो आठ राग और सोलह हजार उप राग बजाते। उनके रास अंतर्गत ब्रज में ही तो जन्मी थी सोलह हजार राग-रागिनियां। सच! श्रीकृष्ण हैं ही रागानुरागी। उनका रास सृजन है और जो बंसी वे बजाते हैं, उसकी धुन उस सृजन का गीत। उनका मनोहरी रूप हमें सदा मोहता है। उनकी मुस्कान मन में बसती है।
मीरा का यह गान सुनें- "थे तो पलक उघाड़ो दीनानाथ, मैं हाजिर-नाजिर कद री खड़ी।" स्मरण करें श्रीकृष्ण के मनोहारी रूप को। कौस्तुभादि आभूषण। गले में पुष्पहार। पीताम्बरादि वस्त्र। किरीट में मयूर पंख। अधरों पर मुरली। कला का समग्र बोध लिए हैं श्रीकृष्ण का यह रूप। इसीलिए तो यह मन में घर करता है। चाहकर भी इस मनोहारी छवि से हम कहां मुक्त हो पाते हैं! श्रीकृष्ण की छवि में प्रेम झर-झर झरता है। नेह में भीगता है मन। उन्हें पूजने का नहीं प्रेम करने का करता है मन। बस प्रेम करने का। शायद इसलिए कि श्रीकृष्ण न भूत, न भविष्य, न वर्तमान है। वे तो बस हैं। काल का अविरल प्रवाह है उनका होना। मेघ वर्ण। सांवले। सलोने। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार श्ृंगार का रंग भी सांवला है। और श्रीकृष्ण तो श्ृंगार के ही पर्याय हैं।

श्रीकृष्ण का जीवन कला के गहरे मर्म लिए हैं। कलाएं हमें मुक्त करती हंै, तमाम बंधनों से। जीवन जीना भी कला है और यह कला कोई श्रीकृष्ण से सीखे। विषमताओं में भी वे बंसी बजाते मिलते हैं। किसी भी परिस्थिति में अरूचिकर गंभीरता को उन्होंने कभी न ओढ़ा। पाने-खोने का गम वहां नहीं है। एक बार जहां से वे चले गए, फिर पीछे मुड़कर कहां देखा! गोकुल छोड़ दिया तो छोड़ दिया। मथुरा छोड़ दी तो बस छोड़ दी। मुझे लगता है, उनका समग्र जीवन निरंतरता का संदेश है। आगे बढ़ने का संदेश। उनका कर्म उपदेश वह है जिसमें आपके होने का मर्म हो। कर्म। चरम नहीं परम। गीता के श्रीकृष्ण कर्मयोग का संदेश देते हैं तो भागवत के मुरारी जीवन जीने का धर्म और कला सिखाते हैं। ऎसी कला जिसमें हंसते, मुस्कुराते कठिनाइयों झेलते हुए भी निर्णय लेने की प्रतिज्ञा है।

यह श्रीकृष्ण के जीवन की विडंबना ही है कि जन्म के समय उन्हें विष दिया, तो एक स्त्री ने और मृत्यु का कारण भी स्त्री ही बनी। जन्म लेते ही पूतना ने विष दिया। गांधारी ने उनके सपूर्ण परिजनों के सत्यानाश का शाप दिया। फिर भी स्त्री सम्मान के लिए ही ता उम्र वे लड़ते रहे। द्रोपदी का चीर बढ़ाया। आदिवासी कन्या जाम्बवती से विवाह किया। नारकासुर की नारकीय कैद से छुड़ाकर उन çस्त्रयों को अपनी पत्नी बनने का अधिकार दिया, जिन्हें समाज ने कुलटा, पतिता कहा। यह श्रीकृष्ण ही हैं, जिन्होंने राजसूय यज्ञ में आमंत्रितो के झूठे पात्र उठाए। सारथि दारूक, निर्धन सुदामा को मित्र का मान दिया। श्रीकृष्ण! माने युगंधर। युग प्रवर्तक। आखिर यूं ही तो नहीं कहा गया है, श्रीकृष्ण यदि भारतीय जीवन दर्शन में न रहे तो फिर बचेगा ही क्या! न साहित्य, न संगीत और न जीवन की उत्सवधर्मिता। जीवन जीने की कला के उत्तम पुरूष हंै भगवान श्रीकृष्ण! 

Monday, August 6, 2012

मोहन वीणा की सौन्दर्य रस सृष्टि



वीणा भारतीय संस्कृति का संवाहक वाद्य है। बाहर और भीतर सौन्दर्य से परिपूर्ण। वीणा का अर्थ ही है कल्याणी, शुभता, उत्कृष्टता और उदात्तता। नटराज षिव के विष्व नृत्य में सरस्वती वीणा बजाती है। भोले स्वयं भी तो वीणाधर है। दक्षिणामूर्ति। वैणिकों के राजा। षिव जब तांडव करते हैं तो पार्वती लास्य करती है। वह श्रेष्ठ नर्तकी ही नहीं वीणा वादिनी भी है। रामायण के सुंदर कांड में नौ तारों की विपंची वीणा का उल्लेख है। यह वीणा ही है जिसमें सूक्ष्म और जटिल ध्वनियों के जरिये स्वर का परिस्कार होता है। वादन में अध्यात्म के साथ सौन्दर्य रस की अनुभूति करनी हो तो वीणा सुनें। सुनेंगे तो लगेगा मन भी तरंगायित हो मौन में गाने लगा है।
बहरहाल, पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र में पंडित विष्वमोहन भट्ट की वीणा को सुना। सुना पहले भी है परन्तु इस बार न जाने क्यों सुना तो लगा उसे गुनूं। सो गुना। लगा सप्तकों में वह सुनने के जिस रस का सर्जन करते हैं, उसमें मन उल्लसित होता है। विष्वमोहन जो वीणा बजाते हैं उसका उल्लेख वीणा के इतिहास में कहीं नहीं मिलता। उसे उन्होंने अपने तई आविष्कृत किया है। हवाईयन गिटार में कुछ और तार जोड़ वीणा में उसे रूपान्तरित कर उन्होंने उसमें भारतीय रस की सृष्टि की। नाम दिया मोहन वीणा। अपने नाम के साथ मिला उन्होंने इस वाद्य को पारम्परिक भारतीय शास्त्रीय रागों के माधुर्य से जोड़ विष्वजनीन किया। मोहन वीणा गिटार का संषोधित शास्त्रीय रूप है। 
विष्वमोहन भट्ट ने संगीत की षिक्षा पं. रविषंकर से ग्रहण की। इसीलिये शास्त्रीय रागों की उनकी समझ गहरी है। रागों के मूल को बचाते वह समयानुरूप उनमें सुनने के तमाम रसों को मिलाते रहे हैं। जवाहर कला केन्द्र में मोहन वीणा के तारों पर उनकी उंगलियां मिंया मल्हार पर बज रही थी परन्तु झाला, विलम्बित में वह सुनने के अदभुत रस की ही जैसे वृष्टि कर रहे थे। मिंया मल्हार वर्षा ऋ़तु की राग है। वर्षा के मौसम में यह सर्वकालिक हो जाती है। पं. विष्वमोहन भट्ट ने अपनी वीणा में इस राग में बंद सभागार में वर्षा बूंदों से भिगने की अनुभूति करायी तो वर्षा जल के साथ बहती हवा में पत्तों की सरसराहट, कोयल, मोर, पपैये बोलने की अनुगूंज भी अनायास करायी। उनके वादन की बड़ी विषेषता यह भी है कि वह वीणा के तारों पर माधुर्य की बढ़त करते हैं। माने राग के तीव्रतम स्वरों में वह तारों को छेड़ उनके नैरन्तर्य का गजब का निभाव करते हैं। यही कारण है कि उनकी वीणा जब माधुर्य के चर्म पर होती है तो उसका असर वह तारों के दबाव से देर तक कराते हैं। उनके साथ बनारस के पंडित रामकुमार मिश्र ने तबले की भी अद्भुत संगत की। वीणा के तार जहां मंद पड़ते वहां तबले की उनकी थाप राग की समग्रता में अपने होने को गहरे से अनुभूत कराती। मुझे लगता है, पंडित विष्वमोहन भट्ट ने पाष्चात्य वाद्य गिटार का मोहन वीणा में रूपान्तरण कर उसे शास्त्रीय वाद्य जरूर बना दिया है परन्तु इसमंे शास्त्रीय रागों के माधुर्य में बहुतेरी बार खटका भी होता है। गिटार के तारों की बोझिल झनझनाहट राग माधुर्य में बाधा जो उत्पन्न करती है। 
बहरहाल, यह वाद्य संगीत ही है जो शब्दों के परे नाद की शुद्धता के जग में ले जाता है। वस्तु और व्यक्ति के बीच की संधी को विलिन करते हुए। सच! वीणा आंतरिक भावों, मन के उल्लास, उमंग की अनुभूतियों को संगीतात्मक ध्वनि लय तथा बोलों से प्रकट करने वाला उपकरण है। मोहन वीणा विष्वमोहन भट्ट का वह सर्जन है जिसे सुनते शास्त्रों में उल्लेखित विचित्र वीणा की अनुभूति भी अनायास होती है। जवाहर कला केन्द्र में हालंाकि पंडितजी ने उस्ताद गाजीखां मांगणियार और साथी कलाकारों के साथ अपनी वीणा से लोक सुर भी बिखेरे, सस्ते संगीत का भी कथित रस बिखेरा परन्तु उसमें वह बात कहां जो राग मिंया मल्हार में थी!


Saturday, July 28, 2012

रेखाओं में गूंथे जीवन बिम्ब

नई दिल्ली की गैलरी आर्ट शास्त्र ने कुछ समय पहले हिम्मतषाह के रेखांकनों की एक प्रदर्षनी का आयोजन किया था। प्रदर्शनी का शीर्षक रखा गया, ‘अवलोकिता’। झेन दर्षन में बुद्ध के एक नाम से अभिहित करते उनकी ड्राइंग का अंतरंग वहां था। प्रदर्शनी में प्रदर्शित चित्रों का आस्वाद करते मुझे लगा, यह हिम्मत शाह  ही हैं जो रेखांकनों में वस्तुओं और जीवों के सादृष्य का विचार किए बगैर शुद्ध आत्मिक अभिव्यक्ति करते है। भले इसे किसी दर्शन से जोड़ दिया गया हो परन्तु मूलतः वहां कोई विचार या दर्षन का आग्रह नहीं होकर रूपांकन की सहज स्फूर्त क्रियाषीलता है। 
वैसे भी कलाकृतियां अनुभूतियों से ही तो जुड़ी होती है। देखने की भी और उसे रचने की भी। किसी एक अर्थ से जोड़कर उन्हें चाहकर भी कहां व्याख्यायित किया जा सकतो है! यह इसलिए है कि बहुत सी दूसरी संभावनाएं वहां बार-बार जग रही होती है। कोई उसके बारे में कहे कि वह कैसी है तो शायद ठीक वैसे ही उसे व्यक्त किया ही नहीं जा सकता। वह उसी को होती है जो अनुभूत करता है।
बहरहाल, हिम्मत शाह के शिल्प पर तो बहुत कुछ लिखा गया है परन्तु न जाने क्यों उनके  रेखांकनों पर आलोचकों का ध्यान खास गया ही नही। मुझे लगता है, देश के वह उन विरले कलाकारों मंे से हैं जो अपने तई विचार संपन्न आकृतियों का सर्जन करते रेखाओं की अलौकिक सामर्थ्यता की अनुभूति कराते हैं। भले उनके रेखांकनों में स्वयं उनके बनाए स्कल्पचर देखे जाने का अहसास भी है वहां टैक्सचर की तमाम संभावनाएं भी हैं। उनके रेखांकन ऐसे भव में हमे ले जाते हैं जहां मानवाकृतियां जीव-जंतुआंे की प्रकृति में समाहित होती प्रतीत होती है तो बहुतेरी बार विभिन्न जीव-जंतुओं की मूल प्रकृति मानव आकृतियों में समाहित होती दृष्य का सर्वथा नया बोध कराती हैै। व्यक्ति के भीतर चल रहे द्वन्द, उससे संबद्ध तमाम विसंगतियां, आधुनिकता के बनावटीपन और यांत्रिकता में जकड़ते जा रहे विचारों के केन्द्र में हिम्मत शाह कला की जो दुनिया रचते हैं, उसमें भावपूर्ण रूपांकन यत्र-तत्र-सर्वत्र है। मसलन जापानीज इंक ऑन पेपर को ही लें। वहां रूप की स्पष्टता तो है परन्तु विचारों का सघन जंगल है। रेखाओं का अनूठा उजास है तो रेखांकनों में खंड-खंड रचित कोलाज में विस्मय के साथ गति का अनूठा प्रवाह है। लाईनों से उभारे टेढे-मेढे चार पैरों के साथ ऊपर उभरती ऊंट, घोड़े जैसी आकृतियों में पीछे पूंछ की बजाय दिखाई देते व्यक्ति के जरिए वह जैसे भीतर की अपनी संवेदनाओं का सब कुछ बाहर निकाल देना चाहते हैं। 
ऐसी ही ड्राइंग की उनकी एक आकृति में रेखाओं, रेखाओ के गोलों, बिन्दुओं के जरिए रोबोटनुमा आकृति का सर्जन किया गया है। एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था होती ऐसी आकृति में आकृति के भीतर से निकलती और आकृतियां मनुष्य की जटिलता, यांत्रिकता के बंधनों के साथ ही सभ्यता से उपजे तमाम विषादों को भी जैसे हमारे सामने रखती है। इसे देखते लगता है, हिम्मत शाह किसी एक आकृति में भी विचार की तमाम संभावनाओं को गहरे से जताने का सामर्थ्य रखते हैं। 
मुझे लगता है यह हिम्मतषाह ही हैं जिनकी ड्राइंग देखने का पूरा एक वातावरण निर्मित करती है। इस वातावरण के अंतर्गत देखे हुए दृष्यों की बहुत सारी  स्मृतियां औचक कौंधती है। इसीलिये उनकी ड्राइंग में बहुतेरी बार जॅक्सन पोलाक के बनाये चित्रों के व्यापक प्रभाव चित्रण की तरह वस्तुनिरपेक्षता और व्याकुलता का आभाष भी होता है तो रेखाओ में गंूथी शारीरिक बल्ष्ठिता से माइकिलेन्जलो का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। उनके चित्रों को देखते हुए दर्षक स्वयं को अनोखे वातावरण में परिवेष्टित अनुभव करता है और इसी से कलाकृति को चित्रकार की दृष्टि से नहीं बल्कि दर्षकीय दीठ से नया अर्थ अनायास ही मिल जाता है। 


Friday, July 20, 2012

कला का सिनेमाई रूपान्तरण


विद्यासागर उपाध्याय के रंग कोलाज 

विद्यासागर उपाध्याय रंगों के उत्सवधर्मी कलाकार हैं। कैनवस पर वह जो बनाते हैं, उनमें सीधे सपाट दृष्य नहीं मिलेंगे। मिलेंगे तो बिम्ब कोलाज। संकेतों में रंगों का अद्भुत रचाव। आरंभ के उनके रेखांकन और बाद के चित्रफलक पर विचारता हूं तो अनुभूत होता है कि उनकी कलाकृतियों में एक अजीब सी व्याकुलता रंगों के सांगीतिक आस्वाद के साथ देखने वाले में सदा ही जिज्ञासा जगाती रही है। कहें, अपने दौर से अलग कुछ करने के उनके कला चिंतन से उपजी कलाकृतियां रंगों का मनभावन रूपान्तरण है। भले अमूर्तन की उनकी रंग दृष्टि समकालीनता का अतिक्रमण करती रही है परन्तु संप्रेषण के नये आयामों में उसका आस्वाद लुभाता भी है। उनके रंग लोक में तैरती अनुभूतियों, स्मृतियां भीतर के हमारे रितेपन को जैसे भरती भी है।
बहरहाल, कुछ दिन पहले उपाध्याय के रंग सरोकारों पर ‘कलानेरी’ आर्ट गैलरी ने विनोद भारद्वाज और रोहित सूरी निर्मित फिल्म ‘कलर सिम्फनी’ के प्रदर्षन की पहल की। फिल्म के शीर्षक को देखकर जिज्ञासा हुई सो देखने जाना ही था परन्तु फिल्म देखकर निराषा हुई। इसलिये कि विद्यासागर उपाध्याय की कला में रंगों का अद्भुत रचाव है। रंगों के उनके सरोकार भी किस एक मुकाम की बजाय निरंतर बदलते रहे हैं। बंधी-बंधायी लीक की बजाय वहा समय का अपनापा हैं। माने वहां परम्परा भी है तो आधुनिकता के गहन सरोकार भी। चटख रंगों में झिलमिलाते उनके रंग कैनवस का पारदर्षीपन भी अलग से ध्यान खींचता है। बल्कि मुझे तो उनकी रंगधर्मिता में चलचित्रनुमा जो एप्रोच है, वह भी सदा से आकर्षित करती रही है। लगता है, उनके कैनवस का अर्मूतन पानी में तैरता है। उसमें गत्यात्मक प्रवाह जो है। कैनवस स्थिर है परन्तु रंग दृष्यों का चलायमान भाव वहां है। कलाकृतियां देखते हुए लगेगा कैनवस नहीं किसी फिल्म को हम देख रहे हैं। और इस पर सच में यदि फिल्म बने तो उसमें कुछ खास की गुजांईष तो रहती ही है परन्तु ‘कलर सिम्फनी’ से वह ‘खास’ गायब है। शायद इसलिये भी कि फिल्म अभिकल्पन में तात्कालिकता की प्रबलता है। लगता है, कुछेक पंेटिंग के इर्दगिर्द ही फिल्म का ताना-बाना बुन, दृष्य शूट कर लिये गये और बगैर किसी सोच, शोध के उन दृष्यों को रख दिया गया है। 
पूरी फिल्म में विद्यासागर उपाध्याय की कलाकृतियों के रंग सरोकारों की शास्त्रीयता को विनोद कहीं भी पकड़ नहीं पाये। इसीलिये फिल्म देखते समय जो अधुरेपन की शुरूआत होती है, वही इसके समाप्त होने के बाद भी बनी रहती है। कलाकार की बजाय कुछेक कलाकृतियों का चलचित्र बनकर रह गयी है,  बीस मिनट की यह पूरी फिल्म। आरंभ में कैनवस पर कलाकृति रचते, रंग बिखेरते कलाकार के कुछेक शाॅट इसमें है, अंतराल पश्चात चुनिन्दा कलाकृतियां पर कैमरा फोकस होता है। बीच में स्क्रिन पर उपाध्याय के जन्म और कलाधर्मिता पर कुछेक पंक्तियां उभरती है और फिर से पहले जो कलाकृतियां दिखाई गयी थी, उन्हीं पर कैमरा फोकस होता है। उनके स्टूडियों के पुराने दरवाजे की सांकल के पास खुद उनके खड़े होने के शाॅट की मुग्धता में कलाकार की कला यहां जैसे गौण हो गयी है। 
बहरहाल, सिनेमा चलायमान दृष्यों की विधा है और कैमरा उसकी भाषा है। यह इतनी शसक्त है कि थोड़े में भी बहुत कुछ कहा जा सकता है, बषर्ते कि आप उसमें रमें, उसे जियें। इस दीठ से ‘कलर सिम्फनी’ लगता है पूरी तरह से चूक गयी है। हाॅं, विद्यासागर उपाध्याय की कलाकृतियों के दृष्यों के पाष्र्व मंे राग बिहाग में पंडित विद्याधर व्यास का शास्त्रीयगान जरूर रंगों की उत्सवधर्मिता को बंया करता कुछ सुकून देता है।  

Friday, July 6, 2012

सौन्दर्य के कला देव शिव


शिव सौन्दर्य के कला देव हैं। मन के सौन्दर्य देवता। सौन्दर्य वह नहीं है, जिसके हम आदि हैं। सौन्दर्य वह जिसमें मन रमता है। कलात्मक सौन्दर्य। सोचता हूं, अकेले शिव ही ऐसे देवता हैं जो नंग-धड़ंग पूजे जाते हैं। और कुछ नही ंतो लंगोटी की जगह चमड़े का टुकड़ा ही लपेट लिया। गहनों के नाम पर गले में सांप धारण कर लिया। चिता की राख लपेटे भी वह हमें लुभाते हैं। आप खुद ही सोचिए! उनकी सवारी भी कोई और नहीं सांड है। आप-हम उसके पास जाते हुए भी डरें।
 भंग-धतुरा उनका भोजन है। कंठ में विष की भंयकर ज्वालाएं। भूतभावन। समुद्र मंथन में जब हलाहल निकला तो उसे कौन पिए। भोले भंडारी को ही आगे किया गया। कहा गया, आप ही हैं महादेव। अब पिएं यह हलाहल। शिव बोले, हां महादेव तो मैं ही हूं। दूषण हलाहल उनके कंठ में पहुंच भूषण बन गया। नीलकंठ। वाह रे कला देव! गंगा के प्रचण्ड वेग को कौन धारण करें। यहां भी शिव आगे। कर लिया अपनी जटाओं में उसे धारण। कलंकी चन्द्रमा किसके पास जाए! शिव ने उसे भी अपने सर पर स्थान दिया।...तो दूषण सारे शिव के पास पहुंच भूषण हो गये। इसी से तो है शिव का सौन्दर्य। कला का अद्भुत रूप! शिव लिंग जहां है वहां शिव की मूर्ति कहां है! माने वह मूर्त भी है और अमूर्त भी। जिस भी भेष में, रूप मंे हम दर्शन करना चाहें, प्रकट हो वह दर्शन दे देंगे। प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्ण रूप! आशुतोष जो हैं इसलिये प्रसन्न तो होंगे ही। 
श्रावण मास को ही लें। इस मास में शिव से संबंधित किसी भी लीला का वर्णन शास्त्र-पुराणों में नहीं है पर शिव को यही मास प्रिय है। हिमाचल की पुत्री के रूप में जब सती फिर से जन्मी तो श्रावण मास में ही शिव की विधिवत् पूजा-अर्चना की। शिव प्रसन्न हो पुनः पति रूप में उन्हें प्राप्त हो गये। फिर क्या था। श्रावण शिव का प्रिय मास हो गया। श्रावण में ही होती है, शिव भक्तों द्वारा कांवड़ की कला यात्रा। शिव के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन यात्रा। हरिद्वार के रास्ते भर में कंधे पर रंग-बिरंगे कांवड़ उठाकर पैदल जाते भक्त दिखेंगे। अकेले या समूह में। रंगीन कागजों से, मोम से, चमचमाते पोलिथिन से। मोर पंखों से कलात्मक सजे कांवड़। देखेंगे तो लगेगा रंग कोलाज हैं भांत भांत के कावड़। गंगाजल भरे ये पवित्र कांवड़ जमीन पर नहीं रखे जाते। कांवड़िये विश्राम करते हैं तो सड़क के किनारे पेड़ों की शाखाओं से बने तख्तों पर इन्हें रखा जाता है। 
बहरहाल, शिव का रूद्रावतार कला का पर्याय है। संगीत कला का पर्याय। कहते है। इसी अवतार में उन्होंने कभी नारद को संगीत कला का ज्ञान दिया था। नारद ने संगीत के पूर्ण ज्ञान के लिये भगवान शिव की तपस्या जो की थी। रूद्रप्रयाग जाएं। भगवान शिव के रूद्रावतार की मूर्ति के दर्शन होंगें। 
‘संगीत मकरंद’ में शिव की कला का गान है। शिव नृत्य करते हैं तो ब्रह्मा ताल देते हैं, विष्णु ढोल, सरस्वती वीणा, सूर्य-चन्द्र बांसूरी, अप्सराएं और गंधर्व तान देते हैं, नंदी और भृंगिरिडि मृद्दल बजाते हैं और नारद गाते हैं। महर्षि अरविन्द कहते हैं, दक्षिण में चिदम्बरम् स्थित मंदिर जाएं तो ध्यान दें। नटराज वहां पंचम प्राकार के अंदर है। यहां है उनका आकाश-स्वरूप। माने कहीं कोई अवकाश नहीं। यहां है संगीत के आद्य प्रवर्तक तुम्बुरू और देवकथा के गायक नारद। यह संगीत, व्याकरण और नृत्य की त्रिवेणीरूप साधनास्थली है। यह शिव ही हैं जो निर्गुण निराकार हैं तो माया की उपाधि से सगुण निराकार। उनका लिंगरूप निराकार और मूर्तिरूप साकार बोधक है। शिव। माने संपूर्णता। समग्रता। सत्यमं शिवं सुन्दरम्। 

Friday, June 29, 2012

स्वर और लय की रस सृष्टि


संगीत माने स्वर और लय की कला। रस की सृष्टि। सुनने के रस की सृष्टि। आंग्ल भाषा में संगीत के लिये ‘म्यूजिक’ शब्द प्रचलित है। ‘म्यूज’ से बना है म्यूजिक। ‘म्यूज’ दरअसल यूनानी शब्द है। शब्द कोश खंगालता हूं तो म्यूज का अर्थ ‘द इन्सपायरिंग गॉडेज ऑफ सॉंग’ पाता हूं। माने गान की प्रेरक देवी। म्यूज ज्यौस की कन्या है। ज्यौस माने स्वर्ग। यानी संगीत स्वर्ग की कन्या है। सोचता हूं, संगीत रस का पान जब कर रहे होते हैं तो मन में स्वर्गिक सुखानुभति ही तो होती है। संगीत के लिये अरबी और फारसी में मौसीकी शब्द है। सुनने में ही संगीत का आस्वाद नहंी होता! 
बहरहाल, हमारे यहां गान की प्रेरक देवी सरस्वती है। संगीत के आदिदेव शिव हैं। इसीलिये तो नटराज स्तुति में कहा है, ‘गंभीर नाद मृदंगना धबके उरे ब्रह्मंडना, नित होत नाद प्रचंडना, नटराज राज नमो नमः। मााने यह संपूर्ण विश्व आपके मृदंग की ध्वनि से ही संचालित होता है। इस संसार में व्याप्त प्रत्येक ध्वनि के श्रोत आप ही हैं। हे नटराज आपको नमन है! 
संगीत की उत्पति वेदों से मानी गयी है। सामवेद तो संगीत से ही संबद्ध है। ऋग्वेद की ऋचाएं सामवेद का आधार है। वहां शब्द ऋग्वेद से लिये गये हैं और स्वर स्वयं का है। इस अर्थ में साम का अर्थ है ऋचाओ के आधार पर किया गया गान। 
ध्वनि, स्वर और ताल संगीत के ही अंग है। जो संगीतोपयोगी नाद है, वही ‘स्वर’ है। इसीलिये संगीतज्ञों ने एक स्वर से उसमें दुगनी ध्वनि तक के क्षेत्र में ऐसे संगीतोपयोगी कुल बाईस नाद बताये हैं। यही श्रुतियां हैं। ध्वनि की प्रारंभिक अवस्था यह श्रुतियां हैं और इनका गुंजन स्वर। स्व वह नाद है जो स्वयं मधुर हो। संगीत ग्रंथ ‘संगीत दर्पण’ में कहा गया है, ‘श्रुति के पश्चात उत्पन्न होने वाला स्निग्ध, अनुरणनात्मक, स्वयं रंजक नाद ‘स्वर’ है।’ ...और सात शुद्ध स्वरों का समूह जब बन जाता है तो वह सप्तक हो जाता है। नाद से श्रुति, श्रुति से स्वर, स्वर से सप्तक और सप्तक से थाट। थाट हैं-बिलावल, यमन, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, भैरवी, तोड़ी आदि। इन्हीें के अंतर्गत वर्गीकृत हैं तमाम हमारे संगीत के राग। राग माने स्वर और वर्ण से विभूषित चित्त का रंजन करने वाली मधुर ध्वनि। रागों का उनके अंगों के अनुसार विभाजन करने वाले पहले भारतीय संगीतज्ञ हैं पं. विष्णु नारायण भातखंडे। राग वर्णन के लियें उन्होंने ही हमें उठाव, चलन, पकड़, आरोह, अवरोह आदि का प्रयोग दिया। कहें, रागों का थाटों में विभाजन करते उसका विवरण दिया। ऐसा विवरण जिसमें ख्याल, धु्रपद, धमार, साधरा, तराना आदि रचनाएं निबद्ध होती है। कहें हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति के वह पहले ऐसे गायक थे जिन्होंने राग में पकड़ अंग का निर्माण किया।  भारतीय संगीत की उन्नति और प्रचार का महत्ती कार्य भातखंडेजी ने ही अपने तई किया। लखनऊ में उन्होंने ही कभी ‘मैरिस म्यूजिक कॉलेज’ की स्थापना की। यही कॉलेज आज उनके नाम से ‘भातखंडे यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूजिक’ के नाम से विश्वभर में जाना जाता है। ग्वालियर का माधव संगीत विद्यालय और बड़ौदा का संगीत महाविद्यालय भी उन्हीं की देन है।
बहरहाल, हमेशा की तरह इस बार भी पिछले सप्ताह विश्व संगीत दिवस आया और परम्परा निभाते संगीत आयोजनों की धूम भी मची। इन आयोजनों में संगीत रस का आस्वाद करते ही पं. विष्णु नारायण भातखंडे बहुत याद आए। संगीत सुनते और गुनते भातखंडे जी के संगीत अवदान को ही याद कर रहा था। सोचता हूं, उन्होंने ही तो भारतीय संगीत को क्रमबद्ध किया, व्यवस्थित किया। वह नहीं होते तो संगीत की हमारी समृद्ध विरासत के बहुत से पहलुओं से क्या हम यूं रू-ब-रू हो पाते!

Sunday, June 17, 2012

चले भी आओ ...



मेंहदी हसन साहब के गान में अजीब तरह की एक बैचेनी और एक अनकहे खालीपन को अनुभूत किया है। गान में बोल के टूकड़े करते उसे अपने तई निभाते वह बहुतेरी बार चमत्कारिक अहसास भी कराते रहे है। उनके इस अहसास में न जाने क्यों हर बार गजल के शब्दों के भीतर के ओज से अपनापा भी हुआ है। वह गाते तो गजल के शब्दों को अपने तई आवाज का जैसे लिबास पहनाते। याद करता ह तो उनकी गायी ‘रफ्ता-रफ्ता वो मेरी हस्ती का सामां हो गये...’ गजल बहती हवा के सुरमय झोंको का अहसास कराती मन को अजीब सा सुकून देती है तो दूसरी तरफ ‘मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे हो...’ सुनकर जो अहसास होता है उसे बंया ही नहीं किया जा सकता। 
अभी बहुत समय नहीं हुआ फरहत शहजाद की लिखी गजल उनके स्वर में सुनी थी, ‘भूल भी जाओ पागल लोगों/क्या-क्या खोया, क्या क्या पाया है।’ सुनते हुए उनके गान के मखमलीपन और पुरकशिश अंदाज मंे जैसे खो सा गया। यह अंदाज उनका अपना है। गान की यही उनकी वह मौलिकता है जिसने उनकी आवाज के असंख्य दिवाने बनाए। मीर तकी मीर ने कभी एक गजल लिखी थी, ‘पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा, हाल हमारा जाने है’। बी.आर. ईशारा निर्देशित ‘एक नजर’ फिल्म में मजरूह ने इस गजल की शुरूआती पंक्तियां लेते हुए गीत लिखा और उसे गाया लता मंगेशकर और रफी ने। मीर तकी मीर की असल गजल को मेंहदी हसन ने अपने अंदाज में गाया है। इसे सुनते हैं तो फिल्मी गीत को भूलने का मन करता है। मीर तकी मीर के एक-एक शब्द को जैसे मेंहदी हसन ने इस गजल में जिया है। मुझे लगता है, यह मेंहदी हसन ही हैं जो गजल के शब्दों के उस अनकहे पर भी जाते हैं जिसमें संगीत का अवकाश होता है। माने जहां शब्द नहीं पहुंचते वहां मेंहदी हसन की आवाज पहुंच जाती है। संगीत और काव्य का यही तो वह मेल है जिसमें कोई कलाकार अपने होने का यूं अहसास कराता है।
प्रायः सभी गायी उनकी गजलें मकबूले-आम है परन्तु फैज अहमद फैज की लिखी ‘...चले भी आओ कि, गुलशन का कारोबार चले...’ सुनते जैसे उन्हंे गुनने का मन करता है। वह अपने गाये में लिखे हुए के भावों या रस को अक्षुण रखते हैं। गजल गान के उनके आलाप में स्वरों के उतार-चढ़ाव का जादू उनके गाये से हमें जुदा नहीं होने देता। इसीलिये उनके बहुत नहीं परन्तु थोड़े बहुत गाये को जैसे भी सुना है वह जेहन में बार-बार औचक उस सुर निभाव के साथ कौंधता है।  शब्द की स्थूल लौकिकता स्वरों में वहां तिरोहित जो हो जाती है। मेंहदी हसन साहब 20 के थे तब बंटवारे के दौरान पाकिस्तान के हो गये। उस मुल्क की नाकद्री देखिए शंहशाहे गजल का मोल उसने पहचाना ही नहीं। शायद यही कारण था कि वह भारत के लिये सदा बैचेन रहे। मुझे नहीं पता इसमें कितना सच है परन्तु कहते हैं मेंहदी हसन के गान को कभी लता ने ईश्वर की आवाज बताया था। हां, इसमें कोई शक नहीं कि यह मेंहदी हसन ही थे जिन्होंने उस दौर में अपनी पहचान अपने तई बनायी जब उस्ताद बरकत अली खान, बेगम अख्तर जैसे गायकों को सुनने के लिये अवाम टूट पड़ती थी।
बहरहाल, मेंहदी हसन ने अपने पिता उस्ताद अजीम खान साह और चाचाइस्माईल खान साहब से गान की तालिम ली थी। जगतीत उन्हें सुनकर ही कभी पाकिस्तान जा पहंुचे थे, उनसे मिलने। जगतीत तो बाद में जहां से ही चले गये परन्तु यह नहीं पता था कि उनके बाद अब इतना जल्दी मेंहदी हसन भी इस जग को छोड़कर यूं चले जाएंगे!


लहर-लहर सौन्दर्य की सर्जना


महेश शर्मा शिरा अपने चित्रों में प्रकृति सौन्दर्य का स्मृति रूपान्तरण करते हैं। ऐसा करते वह कैनवस को जो ओप देते हैं, उसमें प्रकृति के बहुविध रूप है। मसलन वहां ओस की बूंदों, सागर की लहरों, दूधिया झरनें, नभ मंे उड़ते खग, बर्फ से ढके पर्वत, पहाड़, और हरियाली की चादर ओढे धरित्री का अनूठा स्मृति भव है।

अभी बहुत समय नहीं हुआ, पहले मुम्बई के जहांगीर आर्ट गैलरी में उनके चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित हुई थी।

कुछ समय पहले दिल्ली में आईफा गैलरी में भी उनके चित्र देखे थे। सहज स्फूर्त क्रियाषीलता के अंतर्गत आत्मिक भावों के उनके ऐसे रूपांकन में सादृष्य से स्वतः अपनापा होता है। इसलिये कि रंग आच्छादकता का उनका यह लोक सांगीतिक आस्वाद कराता हमें देखे हुए को गुनने का अवसर देता है। प्रकृति जैसी है, उसका यथार्थ अंकन करने की बजाय वह उसमें स्मृतियों की संवेदनाओं को परोटते हैं।  कैनवस पर उनके दृष्य कोलाज कोहरा छंटाती धूप की मानिंद हमारे समक्ष जैसे-जैसे प्रकट होते हैं, हम उनमें प्रकृति और जीवन के अपने अनुभवों की तलाष करने लगते हैं। घना जंगल, कोहरा ढका आकाष, पहाड़ों पर इतराती धूप और जीव जंतुओं के उनके कैनवस चितराम अदृष्य से दृष्य की एक प्रकार से यात्रा है। आरंभ में कैनवस पर रंगों की पारदर्षी लेयर भर नजर आती है। झीने प्रकाष में आवृत फिर धीरे-धीरे कहीं कोई चिड़िया, कहीं कोई पहाड़, कहीं कोई झरना दिखाई देने लगता है। वस्तुओं, प्राणियों में सादृष्य का विचार किए बगैर वह रंगों, रेखाओं में आकारों की ऐसे ही अनूठी सौन्दर्य निर्मिति करते हैं।

बहरहाल, महेष शर्मा षिरा खैरागढ़ स्थित देष के एक मात्र इन्दिरा कला और संगीत विष्वविद्यालय में कला संकाय के अधीष्ठाता हैं। खैरागढ़ जाना हुआ तो उनके चित्रों से गहरे से रू-ब-रू हुआ। मुझे लगा, भीतर की अपनी कला संवेदनाओं का कैनवस रूपान्तरण करते वह प्रकृति और जीवन की अपने तई खोज करते हैं। कभी पिकासो ने कला को ‘खोज की यात्रा’ ही तो कहा था। इस दीठ से मुझे लगता है, महेष शर्मा के चित्र प्रकृति और जीवन की कैनवस खोज है। परछाईनुमा आकृतियों में वह रंगों के पारदर्षीपन में स्मृतियों का अनूठा निरूपण करते है। समुद्र की लहरें, उनमें बसती-तैरती मछलियां, पहाड़, पेड़, फूल-पत्तियां और अनंत नभ में उड़ते खग। इन सबका उनका कैनवस एक प्रकार से गान है। प्रकृति निनादित उनके इस कैनवस गान में सफेद में पीला, नीला, हरा, लाल रंग जैसे हमसे बतियाता है। रंगो से दीप्त एक चित्र में फूल-पत्तियों से औचक पक्षी की आकृति झांकती है तो दूसरे चित्र में ओस की बूंदो के पार्ष्व में हरियाली के अक्ष उभरते हैं। ऐसे चित्र और भी हैं। मसलन कहीं गुफा से झांकता आधा चांद नीले-काले में अद्भुत सौन्दर्य से साक्षात् कराता है तो कहीं धूंए में लिपटी जंगली जीव-जन्तुओं की आकृतियां गत्यात्मक प्रवाह में तेजी से भागती औचक आंखों से ओझल हो जाती है। प्रकृति और जीवन के ऐसे ही जीवन्त दृष्यों में महेष शर्मा षिरा नैसर्गिक रूप का अनुकरण करते कहीं गाढ़े तो कहीं हल्के रंगों में अंगीकृत छाया लोक का सृजन करते हैं। माने उनके तमाम चित्र छाया-आच्छादित हैं। इनमें देखे गये दृष्य नहीं बल्कि उनका प्रभाव हैं। रंग आच्छादकता मे कैनवस पर सफेद को प्राथमिकता है परन्तु तमाम रंगों का अपना अलग अस्तित्व भी है। इस अस्तित्व में कभी नीला प्रमुख हो जाता है तो कभी लाल तो कभी हरा तो कभी पीला। दृष्य में परिणामकारक प्रभाव लिये भी हैं उनके चित्र।

मुझे लगता है, प्रकृति को अपने तई रंग कैनवस में बरतते वह लहर-लहर सौन्दर्य की सर्जना करते हैं। रगों की अनूठी सांगीतिक लय है। धूंध से उभरती आकृतियों में पक्षियों के कलरव को वहां सुना जा सकता है तो मछलियों के तैरने को अनुभूत भी किया जा सकता है।


Friday, June 8, 2012

सहज मन के सुरों में प्रकृति की धुन



सम और गीत से बना शब्द है संगीत। सम माने सहित और गीत का अर्थ है गान। कोयल की कूक सुनते हैं तो मन में मीठी सी कोई हूक जगती है न! झरनों का झर-झर, नदियों का कल-कल, बरसात की बूंदों की रिम-झिम यह सभी सुनें तो मन करे अंदर से इन्हें गुनें। प्रकृति की यह धुनें ही तो हैं संगीत का आदिम स्त्रोत। आपने महसूस किया होगा, मन पाखी भी तो प्रकृति में विचरते बहुतेरी बार औचक गाने लगता है। कईं बार प्रकृति की कोई धुन मन के भीतर इस कदर उतरती है कि बार-बार उसे सुनने को, गुनने को मन करता है। प्रकृति की धुन माने वह सच्चे हृदय से उपजी हो। जिसमें कोई बनावट नहीं हो। सहज जो सुनायी दे।
बहरहाल, कुछ दिन पहले पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर द्वारा लिखी उनकी आत्मकथा ‘रस यात्रा’ का आस्वाद कर रहा था। इसमें वह लिखते हैं, ‘अच्छा संगीत श्रोताओं को भावों के उच्चासन पर पहुंचा देता है।’ सच ही तो है! यह संगीत ही है जिसमें मन सांसारिकता से दूर एक अलग दुनिया में चला जाता है। भौतिकता की उपस्थिति वहां नहीं रहती। हरिओम शरण को सुनते ऐसा ही लगता है। सांसारिकता में होते भी लगता है, मन उससे अलग अपने भीतर की तलाष में पहुंच गया है। भले वहां शास्त्रीयता की सौन्दर्य परिणति नहीं है परन्तु अंतर्मन संवेदनाओं के गान की गहन अनुभूती है। कहें, सहज, सरल शब्दो में आप-हम सबका मन वहां जैसे गाता है। मन करता है, बार-बार उन्हें सुनें। शायद इसलिये कि उनके सुरों मंे प्रकृति की धुन है। कहीं कोई बनावटीपन नहीं। अपने को संप्रेषित करने का कहीं कोई आग्रह नही। वहां प्रभु अर्चना है। मन की वेदना है। व्यर्थ किये का सच्चा पश्चाताप है। और है एक साधक की साधना। मुझे लगता है, संगीत की प्रकृति को सही से समझना है तो उन्हें सुनना ही चाहिए। इसलिये कि उन्हें सुनते एकरसता से परे हर बार नव आनंद की प्राप्ति होती है। संस्कृत में कहा गया है, ‘स्थाने-स्थाने यत नवतम् उपैति/तदैव रूपम रमणीयताया।’ नवीनता का सौन्दर्य निकष। क्षण-क्षण की रूप रमणीयता। सुर, राग, बोल सभी वही परन्तु सुनने में सदा नये की अनुभूति।
बहरहाल, भजन संगीत की हमारी समृद्ध परम्परा को हरिओम शरण ने अकेले अपने बूते संपन्न किया। वह ऐसे हैं जिन्हें आज भी उसी चाव से सुना जाता है। सादगी के उनके गान पर मन न्योछावर होता है। सच्चे अर्थों की सुर अभ्यर्थना वहां जो है। यह लिख रहा हूं और उनका गाया जेहन में गहरे से बस रहा है, ‘निर्मल वाणी पाकर तुझसे, नाम न तेरा गाया। नैन मूंदकर हे परमेष्वर, कभी न तुझको ध्याया।’ शब्द भर नहीं, शब्दों के भीतर का गान है यहां। बहुत छोटा था तब। अलसुबह घर में दादी को हरजस गाते सुनता था। न जाने कहां से आए थे उनके हरजस के वे बोल। मैंने बहुत से लिखे हुए भी है परन्तु उनका स्त्रोत अभी भी नही जान पाया परन्तु उनमें सच्चे अर्थों की अभिव्यंजना को आज भी अनुभूत करता हूं। दादी को संगीत का ज्ञान कहां था! वह तो हरि स्मरण करती थी। ऐसा करते बोलों के निभाव में वह अपने को भी जैसे तब भूल जाती। उनकी उस तंद्रा को याद करते लगता है, संगीत के सच्चे सुरों में अपने को भूलना जरूरी होता है। हरिओम शरण का गान ऐसा ही है जिसमें उन्होंने जो भी गया अपने को भूलकर गाया। ‘दाता एक राम’, ‘प्रभु हम पे दया करना’, ‘तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार’, ‘उद्धार करो भगवान’ जैसे गाये उनके भजन सुनते मन नहीं भरता। प्रार्थना। अर्चना। याचना। करूणा। और मनुष्य होने का मामूलीपन। अबोध और निर्दोष भाव। कहें, सच्चे मन की सुराजंलि। जो गाया अंतर्मन से। उनका गाया सांस और संगीत का मेल है। यही तो है प्रकृति के सुर। विष्वास नहीं हो तो उन्हें सुनें। मन करेगा उन्हें गुनें। 

Friday, June 1, 2012

लोक नाट्यों में है तमाम हमारी कलाओं का मेल


लोक विश्वास, परम्परा, मनोरंजन और जीवन की उत्सवधर्मिता का सांगोपांग चितराम कहीं हैं तो वह लोकनाट्यों में है। सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक कथानकों का सीधी सरल भाषा में रोचक रूप में सहज संप्रेषण वहां जो है। लोकनाट्यों की समृद्ध संस्कृति देशभर में रही है। महाराष्ट्र में यह तमाशा है तो उत्तरप्रदेश में रास-लीला, नौटंकी, भाण। मध्यप्रदेश में यह मांच है तो बंगाल में जात्रा और गंभीरा। दक्षिण भारत में यक्षगान और विथि नाटकम लोकनाट्य के ही रूप हैं। राजस्थान में यह ख्याल, रम्मत, नौटंकी, स्वांग के रूप में हैं। नाट्य के सभी तत्व इनमें मिलेंगे परन्तु ताम-झाम नगण्य।  

बहरहाल, पिछले दिनों राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष अर्जुनदेव चारण के आमंत्रण पर मेड़तारोड़ में कुचामणी ख्याल यात्रा आयोजन संगोष्ठी में भाग लेते लोकनाट्यों की हमारी परम्परा को गहरे से जिया। लगा, यह लोक नाट्य ही हैं जिनमें तमाम हमारी कलाओं का मेल है। किसी एक कला में नहीं बल्कि तमाम कलाओं में लोक कलाकार निष्णात होते हैं। निष्णात न भी कहें तो अभ्यासी कह सकते हैं। लम्बे-लम्बे संवाद भी सहज सांगीतिक रूप में अदा करते वह कहन की अपनी शैली से चमत्कृत करते हैं। मुझे लगता है, कलाओं के अंन्र्तसंबंधों को व्यवहार में यदि जानना है तो लोकनाट्य हमारी मदद कर सकते हैं। मित्र शैलेन्द्र उपाध्याय के साथ हमने दूरदर्शन के लिये ब्रह्माणी मंदिर परिसर में कुचामणी ख्याल राजा हरिष्चन्द्र को षूट किया। बगैर पूर्वाभ्यास के कलाकार लोकनाट्य विधा को जैसे अपने में आत्मसात किये थे। संवादों की अनूठी लय अदायगी। चरित्र को अपने में समाहित करने की गजब जीवंतता। ख्याल में भूमिका निभाने वाले कलाकार संगीतज्ञ होते हैं। अभिनेता होते हैं। नर्तक होते हैं और गायक भी होते हैं। माने तमाम कलाओं का मेल कहीं है तो वह इन लोक नाट्यों में ही हैं। विडम्बना देखिए, बावजूद इस समृद्धता के आधुनिकता की आंधी बहुत से लोकनाट्यों को उड़ा भी ले गयी है। शायद इसका कारण यह भी है कि लोकनाट्यों में समय सरोकार समाप्त से होते चले गये है।

बहरहाल, कभी देवीलाल सामर ने कुचामणी ख्याल में आधुनिक समय के संदर्भ डालते फिर से उन्हें रचा। मसलन मीरा को अपने तई ‘म्हाने चाकर राखोजी’ से उन्होंने पुनर्नवा किया। धुनें वही रखी। नाचने गाने की शैली वही रखी। यहां तक कि नगाड़े, ढोलक की तालें भी वहीं रखी गयी परन्तु कुछेक प्रतिकात्मक रंगमंचीय सामग्री का प्रयोग अधुनातन परिवेश के हिसाब से किया गया। देशभर में ख्याल की उनकी यह प्रस्तुति खासा लोकप्रिय हुई। देवीलाल जी ने इसी तरह के प्रयोग ढोलामारू, मूमल-महेन्द्र के नाम से राजस्थान की चिड़ावा शैली में भी किये और उनमें उनको अपार सफलता भी मिली। ख्याल, नोटंकी, स्वांग, रम्मतों आदि लोकनाट्यों को समय के हिसाब से इसी तरह से पुनर्नवा करना होगा। माने पारम्परिक कथानक के स्थान पर नवीन कथानक लिया जा सकता है। समाज की नवीन समस्याएं ली जा सकती है। परिवेश नया हो सकता है परन्तु कला का मूल वही रखें। इस से होगी लोकनाट्यों की हमारी समृद्ध परम्परा का सही में संरक्षण। 

संगीत नाटक अकादमी और दूसरी संस्थाओं को यह भी चाहिए कि लोकनाट्यों से जुड़े पारम्परिक कलाकारों में से कुछेक को चिन्हित करें। लोकनाट्य गुरूओं के रूप में। राज्य स्तर पर लोकनाट्य प्रशिक्षण के लिये उन्हें बुलाया जा सकता है। आधुनिक समय संदर्भों से यदि लोकनाट्य होते है तो लोग उन्हें पसंद भी करेंगे क्यांेकि लोक नाट्य में पद्यांशों की बंदिशें परम्परागत स्वरबद्ध होती है। ये बंदिशे गायी अवश्य जाती है परन्तु वे कुछ इस तरह से बंधी हुई होती है कि सीधे संवादो की तरह असर करती है। पात्रो को अपनी कल्पना के हिसाब से गद्य में भी पद्य़ की मानिंद वहां बहुत करने की छूट होती है। इसी से होती है दर्शकों की भागीदारी। 

Friday, May 25, 2012

बचा रहे शास्त्रीय कलाओं का हमारा मूल


कल आनंदकुमार स्वामी को पढ़ रहा था। वह स्थापित करते हैं, ‘नवीनता नवीन बनाने में नहीं, नवीन होने में है।’ इस समय जब भारतीय शास्त्रीय कलाओ पर विचारता हूं तो उनका यह कहा गहरे से घर करता है। शास्त्रीय नृत्य, चित्रकला का मूल वही है, शास्त्रीय गायन,वादन में मूल राग वही है जो बरसों से हम सुनते आए हैं फिर भी इन शास्त्रीयकलाओं में कलाकार सदा प्रस्तुति में नवीन करता है। इस नवीन में ही रसानुभूति हैं। फिर से कुछ सुनने, फिर से कुछ गुनने की। परन्तु अपसंस्कृति के इस समय में शास्त्रीय कलाओं का यह मूल हमसे जैसे निरंतर दूर भी हो रहा है।
बहरहाल, भारतीय दर्षन में कलाओं को शुद्ध रूप से जीवन से अभिहित किया गया है। ऐसा जब है तो फिर क्या यह विचारणीय नहीं है कि हम अपनी शास्त्रीय कलाओ के नवीनता के उस मूल को कितना बचाए रख पा रहे हैं? मुझे लगता है, कुछेक लोकप्रिय कलाओं को छोड़ हम बहुतेरी हमारी सांस्कृतिक कलाओं से लगातार दूर और दूर हुए जा रहे हैं। कभी राजस्थान के मांगणियारों, लंगो का लोक संगीत धोरों की अनूठी रेत राग से मेल कराता कानों में शहद घोलता था, उसे नवीन बनाने के चक्कर में सूफी संगीत लोक संगीत बन गया है। इसी तरह शास्त्रीय संगीत के स्वर भी बहुत से स्तरों पर फ्यूजन में कनफ्यूज हो रहे हैं। शास्त्रीय नृत्यों को कोरियोग्राफी के नाम बिगाड़ शारीरिक लयकारी में तब्दील किया जा रहा है। चित्रकला में इन्स्टालेषन के नाम पर मनमानी हो ही रही है। सोचता हूं, ऐसा ही होता रहा तो आने वाली पीढ़ी में कलाओं का हमारा मूल क्या कुछ बचा भी रहेगा! 
कुछ समय पहले अषोक वाजपेयी के नेतृत्व में पं. बिरजू महाराज, पं. हरिप्रसाद चौरसिया, उस्ताद जाकिर हुसैन, पं. राजन-साजन मिश्र, पं. षिवकुमार शर्मा, टी.एन. कृष्णन, सुधा रघुनाथन, यू.श्रीनिवासन आदि कलाकारो के एक दल ने मिलकर षास्त्रीय कलाओं के संरक्षण के लिये संसद भवन में प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। इसके तहत शास्त्रीय कलाओं को प्रोत्साहित करने के लिये बड़े व्यावसायिक घरानों की एक प्रतिषत आय को आयकर मुक्त कर उसे सांस्कृतिक गतिविधियों मंे लगाने, अलग से सांस्कृतिक टेलीविजन चैनल स्थापित करने आदि की मांग की गयी थी। इन मांगों पर सरकार ने क्या किया है और क्या कुछ करने जा रही है, कुछ कहा नहीं जा सकता परन्तु सोचने की बात यह भी है कि शास्त्रीय कलाओ के लिये खुद समाज क्या कर रहा है? स्पीक मैके, श्रुति मंडल और सरकारी संस्थाएं, अकादमियां अपने स्थायी आयोजनों में कलाओं का प्रदर्षन, प्रोत्साहन के उपक्रम करती भी हैं परन्तु शास्त्रीय कलाओं के आयोजन से ही क्या हम हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को मूल रूप में सहेज पाएंगे? शास्त्रीय कलाओं के अपसंस्कृतिकरण, अरूपीकरण को क्या इससे रोका जा सकता है? इन पर गहरे से विचारने की जरूरत है। 
यह सही है कि शास्त्रीय संगीत, नृत्य और लोक कलाओं के आयोजनों से इन कलाओं को प्रोत्साहन मिलता है परन्तु इतना ही सच यह भी है कि इनसे नया कोई श्रोता वर्ग, दर्षक वर्ग खड़ा नहीं किया जा रहा। वही है जिनकी रूचि शास्त्रीय कलाओं में है। फिर से गौर करें, रसिकता नया बनाने से नहीं नये होने से ही पैदा की जा सकती है। इसका अर्थ है, आयोजनों के पार्ष्व में भी इस ‘नये होने’ पर विचार करना होगा। सोचता हूं, अभिनेता आमीर खान ने ‘सत्यमेव जयते’ में वही कुछ कहा है, उसी पर ध्यान दिलाया है जिस पर अरसे से कहा, ध्यान दिलाया जाता रहा है परन्तु प्रस्तुति के और मंषा के उनके नयेपन से उनके शो ने अधिसंख्य लोगों का ध्यान खींचा है। शास्त्रीय कलाओं की प्रस्तुतियों के साथ कलाओं की सहज समझ, जानकारियां, रसिकता के लिये भी कुछ ऐसा ही नया करना होगा। 
उस्ताद अमीर खॉं, पं. भीमसेन जोषी, पं. जसराज ने वही राग गाए हैं जो उनसे पहले गायक गाते आए हैं, पं. बिरजू महाराज ने वह नृत्य किया जो पहले होता रहा परन्तु इन सबने अपने को मूल में साधा। पुनर्नवा किया। आनंद कुमार स्वामी इसीलिये फिर से याद आ रहे हैं, ‘नवीनता नवीन बनाने में नहीं नवीन होने में है।’ शास्त्रीय कलाओं को बचाने, उनके संरक्षण के लिये यही मूल मंत्र हो सकता है। 

Friday, May 18, 2012

परकोटों से झांकता अतीत

उपयोगिता में सौन्दर्य की सृष्टि का प्रयास माने कला। किले, गढ़ और महल रहने के लिये, सुरक्षा के लिये बनाये गये परन्तु वहां कलात्मकता का भी कोई ओर-छोर नहीं है। हवेलियों को ही लें। जैसलमेर और बीकानेर की हवेलियां सौन्दर्य में अप्रतिम है। आवासीय उपयोगिता और कलात्मकता का अद्भुत मेल जो वहां है।
 ‘स्थपतेः कर्म स्थापत्यम्’ यानी स्थापन का कार्य स्थापत्य है। नगरों की बसावट में स्थापत्य और वास्तु कला का योग ही तो रहा है। पुराने लगभग सभी नगर कलात्मक परकोटों से घिरे मिलेंगे। अलंकारयुक्त परकोटों से। भले बेतहाषा बढ़ती आबादी में परकोटों को तोड नगर अपनी सीमाएं बढ़ा रहे है परन्तु नगरों के भीतर के परकोटे द्वार आज भी निर्माण की कला की जैसे गवाही देते हैं।  
परकोटों से घिरा जयपुर  विष्व का कभी सर्वाधिक सुनियाजित षहर रहा है। कनक वृन्दावन स्थित मंदिरों में जब भी जाता हूं, आमेर घाटी से दूर तक दिखाई देने वाला षहर का सुन्दर से परकोटे का अंष मन मोह लेता है। औचक, मन में यह अहसास भी होता है कि किसी नगर का रक्षा कवच ही नहीं बल्कि सुन्दर वस्त्राभूषण परकोटा ही तो रहा है।
बहरहाल, परकोटे अब अतीत बन रहे हैं। जनसंख्या बढ़ी तो शहर की सुरक्षा के यह पहरेदार गिरा भी दिए गए। कहीं अभी भी परकोटे हैं परन्तु शहर से बाहर नहीं शहर के अंदर। यानी पुराना शहर। नया वह जो इस परकोटे से बाहर बसा है। जैसलमेर का सोनार किला विष्व में शायद पहला ऐसा दुर्ग है जहां आज भी किले में आबादी रहती है। घेरदार घाघरे की मानिंद परकोटे से घिरा विषाल दुर्ग और अंदर आबादी। बाहर से देखें तो किले के कलात्मक परकोटे से आभाष ही नहीं होता कि अंदर पूरी की पूरी एक सभ्यता वास कर रही होगी.. परन्तु सच यही है। 
परकोटों को ओढ़े षहरों में मेरा अपना षहर बीकानेर भी है। परकोटे के द्वारों से गुजरता हूं। कितने द्वार परकोटे के रहे हैं, शायद बता ही नहीं सकूं परन्तु कोटगेट के तीन द्वार, जस्सूसर गेट के तीन द्वार और नत्थूसर गेट और भी न जाने कितने द्वार अपने परकोटे सौन्दर्य से अभिभूत करते हैं। अब तो खैर सभी स्थानों पर आबादी भी इतनी हो चुकी है कि परकोटो वाले षहर और परकोटे के बाहर वाले शहर का भेद ही नहीं रहा। कभी पुराना और नया षहर कहकर जो अंतर परकोटे और परकोटे विहिन षहर का किया जाता था वह भी खत्म हो चुका है। हां, जोधपुर में परकोटे के भीतर एक षहर है और बाहर दूसरा। जालौरी गेट, सोजती गेट जैसे कितने ही गेट परकोटे से घिरे षहर में अभी भी प्रवेष कराते हैं।
भारत के साथ विष्व के दूसरे देष भी परकोटे की कला संजोए हैं। पुर्तगाल का ओबिडोस कस्बा पहाड़ी पर बसा है। परकोटे से घिरा। दूर से देखें तो किले का सा अहसास कराता। ऐसा ही इजरायल की राजधानी के साथ भी है। पवित्र नगरी जेरूषलम परकोटे से घिरा बेहद खूबसूरत ष्षहर है। हां, वहां भी परकोटे से बाहर बसावट हो चुकी है परन्तु परकोटे के भीतर अभी भी पुराना ष्षहर इतिहास की अपनी विरासत को संजोए है। यूनाईटेड किंगडम की यार्क सिटी भी परकोटे से घिरी है। यह षहर बारहवीं से चौदहवीं वीं सदी में चारों तरफ बनी लम्बी दीवार से घिरा है। चीन के झियान षहर के परकोटे का तो कहना ही क्या! परकोटे की दीवारें इतनी चौड़ी है कि आराम से वहां वाहन चल सकते हैं। ग्यारहवीं ष्षताब्दी के आस-पास बना पष्चिमी स्पेन का एविला षहर भी परकोटों की शान लिए है। इस षहर की प्राचीर में नौ द्वार बने हुए हैं और 88 टॉवर है। भूमध्य के पर्यटन स्थलों मे से एक क्रोएषिया का एतिहासिक नगर डबरोवनिक परकोटे के सौन्दर्य का अप्रतिम उदाहरण है। एड्र्यिाटिक सागर तट पर बने इस षहर को इसीलिये ‘एडियाटिक का मोती’ कहा जाता है।
जो हो, इस बात से इन्कार किया ही नहीं जा सकता कि हमारी जो प्राचीन सभ्यताएं रही हैं, उनमें सुरक्षा उपयोगिता में भी कला का अद्भुत मेल किय गया था। कला की यही तो सौन्दर्य सृष्टि है। इसीलिये तो हमारे यहां कला को जीवन से जुड़ा बताया गया है। 


Friday, May 11, 2012

कलाओं पर संवाद की राह खुले



रवीन्द्र जन्मषती वर्ष के अंतिम दौर में रवीन्द्रमंच सोसायटी और नाट्यकुलम ने जयपुर में रवीन्द्र प्रणति समारोह कर कलाओं पर चिंतन को जैसे नया आकाष दिया है। कहें, कविन्द्र रवीन्द्र की कलाओं की प्रस्तुति के साथ ही उन पर संवाद की यह सार्थक पहल थी। रवीन्द्रनाथ टैगौर की जन्मषती पर देषभर में आयोजन हुए। उनके कलाओं की प्रस्तुतियां हुई परन्तु उनकी कला दृष्टि पर चिंतन की नई राह कहीं खुलती नजर नहीं आयी। कह सकते हैं, इस दृष्टि से प्रणति समारोह आष जगाता नजर आया। 
टैगोर सम्पूर्ण कलापुरूष रहे हैं। उन्होंने कविताएं लिखी, नाटक लिखे, स्वयं अभिनय किया, रवीन्द्र संगीत रचा और तो और उम्र के उत्तरार्द्ध में चित्र भी बनाए। माने उनके पास भरपूर कला दीठ थी।  उनके लिखे नाटकों, चित्रों, संगीत में इस दीठ को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है परन्तु यह विडम्बना ही कहें कि उनकी कला दृष्टि पर जिस गहराई से चिंतन और विमर्ष होना चाहिए, वह नहीं हुआ। हां, उनके साहित्य पर फिर भी कहने लायक कार्य हुआ है परन्तु उनका कलाकर्म आलोचकीय दृष्टि से बहुत से स्तरों पर अछूता ही रहा है।
बहरहाल, प्रणति समारोह में रवीन्द्र मंच पर टैगोर की कला दीठ पर बोलते हुए खाकसार ने यह प्रस्तावित किया कि उनके चित्रों की एक प्रदर्षनी और उस पर संवाद की शुरूआत हो। यह भी कि उनके संगीत की प्रस्तुति के साथ ही उस पर अधुनातन सोच से चिंतन का भी अलग से अवकाष निकले। कला मर्मज्ञ मुकुन्द लाठ ने टैगौर के काव्य और संगीत के संतुलन की गहरे से विवेचना की। उनके इस कहे के आलोक में क्यों नहीं रवीन्द्र संगीत पर पर गहरे से मंथन की कोई राह निकाली जाए। रवीन्द्र मंच सोसायटी की प्रबंधक नीतू राजेष्वर कलाओं की गहरी समझ लिये उत्साही अधिकारी हैं। सोचता हूं, सरकार में कला-संस्कृति महकमे में ऐसे ही अधिकारी हों तो बात बन सकती है। मुझे लगता है, कला संसार की बड़ी विडम्बना यही है वहां संवाद नगण्य है। माने कला प्र्रस्तुतियां तो तमाम स्तरों पर हो रही है परन्तु कलाओं में निहित पर संवाद की परम्परा जैसे समाप्त सी होती जा रही है। संवाद हो भी रहा है तो वह अकादमिक ढर्रे में इस कदर बोझिल है कि उससे कलाओं के प्रति नई पीढ़ी में रूझान पैदा होगा, इसमें संदेह है।
रवीन्द्र नाथ टैगौर के कलाकर्म पर विचारते मन में आ रहा है, इस छोटे से जीवन में कितना कुछ उन्होंने किया।  हम जो हैं, उनके किये के बहाने ही कलाओं में कुछ नहीं करते।  अव्वल तो कलाओं पर आयोजन ही नहीं होते और जो होते है वह विष्वविद्यालयों, षिक्षण संस्थाओं या फिर अकादमियों के बजट संपूर्ति की औपचारिकता लिये होते हैं। वहां जो लोग बोलते हैं, वे परम्परा का ढोल बजाते हुए वही कुछ दोहराते हैं जो पाठ्यपुस्तकों में है या फिर दूसरे स्थानों पर उपलब्ध है। जो कुछ पहले से रचा है, जिस पर पहले से आलोचकीय दृष्टि उपलब्ध है, उसे आखिर कितनी बार हम प्रस्तुत करेंगे। रवीन्द्र ने 67 वें वर्ष में चित्रकला की शुरूआत की। इसलिये कि उन्हें लगा, जो उनका काव्य नहीं कर पा रहा है, जो उनका संगीत नहीं कर पा रहा है-हो सकता है वह चित्रकला कर जाए। नयेपन की इसी छटपटाहट से कलाएं संस्कारित होती है। अप्रकट का प्रगटन, अप्रत्यक्ष का दर्षन यही तो है। रवीन्द्र की तो तमाम कला दृष्टि यही है। रवीन्द्र संगीत में पारम्परिक राग-रागिनियां है परन्तु श्रवण में आनंद के अवरोधों की जकड़न नहीं है। स्वरानंद के साथ भावों का रस वहां है। बंधनों में निर्बन्ध। ऐसा ही उनके चित्रकर्म के साथ है। वहां दृष्य का पठन है। रेखाओं का उजास है और परम्परा की बजाय अव्यक्त का वह व्यक्त है जिसमें दृष्य हमारे जाने-पहचाने हैं परन्तु उनका संसार सर्वथा अलग है। ऐसा जिसे देखते हम स्वयं ही पुनर्नवा होते हैं। जो कुछ यथार्थ है, उसे हूबहू या फिर उसका आभास कराने का कार्य तो जादू भी कर सकता है, उसमें कला कहां है? इसीलिये कहें, रवीन्द्र ने जादू नहीं कला के गहन संस्कार हमें दिये हैं। इन संस्कारों के आलोक में ही उनकी कला दृष्टि पर आईए फिर से विचारें!

Saturday, May 5, 2012

सिनेमा में झांकता कला संसार


दृष्य से अदृष्य की सत्ता बड़ी होती है। दृष्य में यथार्थ की दीठ भर होती है परन्तु अदृष्य स्मृतियों, अनुभूतियों का अनंत आकाष जो लिये होता है। इसीलिये शायद कभी अज्ञेय ने कहा भी, ‘स्मृति ही वह गतिषील सर्जनात्मक तत्व है, जो काल, इतिहास, साहित्य और हां, भाषा के नये परिदृष्य रचती चलती है।’ यह स्मृतियां ही हैं जो सर्जना में काल के गाल विगत-वर्तमान का अंतर पाटती है। विनय शर्मा के चित्रों पर जब भी विचार करता हूं, कैनवस पर मूल कैलिग्राफी में झांकती स्मृतियां रोमांचित करती है। उनका कैनवस अतीत से जुड़ी चीजों का वस्तुगत यथार्थ नहीं होकर स्मृतियों के निजी संवेदन संज्ञान के रूप में हमारे समक्ष उद्घाटित होता है। मूल कैलिग्राफी में तड़कते कागजों की पुरानी बहियां, पोस्टकार्ड, स्टाम्प पेपर, जन्मपत्रियों आदि के साथ ही इस्तेमाल कुछ वैसे ही रंगो में भीतर के संवेदन को रूपायित करने की उनकी क्षमता अद्भुत है।
बहरहाल, हाल ही उनके कला के इस आयाम पर ख्यात फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज और रोहित सूरी ने लघु फिल्म ‘रिम्बेर्म्स ऑफ थिंग्स पास्ट: द वर्ल्ड ऑफ विनय शर्मा’ बनायी है। इसका आस्वाद करते चित्रकला, संगीत और सिनेमा के रिष्तों को गहरे से जिया जा सकता है। पंडित विद्याधर व्यास के स्वरों में राग बागेश्री के गान में संजोयी इस फिल्म की शुरूआत सांगानेर स्थित कागज के कारखाने से होती है। लुगदी से कागज बन रहा है। इस बन रहे कागज में चित्र सर्जन की तमाम संभावनाएं तलाषते स्वयं विनय कागज को अपने तई आकार देते मूल कैलिग्राफी में अतीत से जुड़ी वस्तुओं को सहेज रहे हैं। दृष्य बदलता है। विनय का जन्म स्थल लालसोट दिखाई देता है। कस्बाई गली, पुराना घर और उसके अंदर रखा बड़ा सा संदूक। पितामह आत्मानंद सरस्वती के बड़े से संदूक से पुराने ग्रंथ, पोस्टकार्ड, स्टाम्प पेपर, पुराने कागजाद निकालते विनय अपनी कला यात्रा की जैसे यहां गवाही दे रहे हैं। सर्जन की तलाष आगे बढ़ती है। रेखाओं के रंग आच्छादित कैनवस में संवाद करती स्मृतियां से अनायास अपनापा होने लगता है। गाढे रंगों में मूल कैलिग्राफी के अंतर्गत प्रकृति के चितराम हैं तो जीवनगत सरोकार भी हैं। फिल्म के एक दृष्य में विनय स्टूडियों में काम कर रहे हैं। कला मगन मुद्रा का रोहित सूरी का लॉन्ग शॉट और उसकी बारीकी मन को छूती है।  दृष्य और भी हैं जिनमें कैनवस अलंकरण करते कलाकार की भाव मुद्राएं हैं तो हाल का विनय का वह संस्थापन भी है जिसमें पुरानी लालटेन, कलम दवात और दूसरी अतीत की चीजें उनके कला संवेदन को गहरे से हमारे समक्ष रखता है। पूरी फिल्म में कहीं कोई संवाद नहीं है, दृष्य ही देखने वाले से जैसे संवाद करते हैं। 
विनय देष के संभवतः ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अतीत से जुड़ी चीजों को मूल कैलिग्राफी में सर्जन का हिस्सा बनाते स्मृतियॉं के अंकन का सर्वथा नया कला भव निर्मित किया है। वह अतीत से जुड़ी किसी एक वस्तु को उसकी पूर्णता में नही बल्कि उसके किसी आयाम को निकालकर भीतर के अपने भावों के अनुसार उसका रूपाकार गढ़ते हैं। ऐसा करते अंतर्मन संवेदना के संप्रेष्य के तमाम आयामों का भरपूर इस्तेमाल उनकी सर्जना में होता है। कहें, लघु फिल्म उनके सर्जन के इस आयाम को गहरे से उद्घाटित करती है।
सिनेमा और चित्रकर्म का आरंभ से ही गहरा रिष्ता रहा है। कभी गोपी गजवानी ने ‘द टाईम’ और ‘द एंड’ शीर्षक से कला फिल्में बनायी थी। हुसैन और विवान सुन्दरम निर्मित कला फिल्में कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कहती हैं। इनमंें कहीं कोई कथा नही थी परन्तु विषय का जो ट्रिटमेंट है, उसे गहरे से जिया गया है। कला और कलाकार पर फिल्म निर्मिती में दृष्य के साथ कलाकार की संवेदना के तमाम आयामों को बहुत कम समय में छूना ही तो होता है। इस दृष्टि से विनय के कला संसार पर निर्मित यह फिल्म कलाकार की भीतर की संवेदना से देखने की हमारी संवेदना को गहरे से जोड़ती है। उनकी कला से साक्षात्कार कराती है।


Sunday, April 29, 2012

अंतर्मन संवेदना जगाते चित्र



कला का यह वह दौर है जिसमें कैनवस पर प्रयोगधर्मिता  का ताना-बाना बुनने की होड़ मची है तो संस्थापन में अचम्भित करने की। मानव मन संवेदना के साथ कला की सहज सौन्दर्य सृष्टि इसी से बहुतेरे स्तरों पर तिरोहित भी हो रही है। माने संवेदना से स्वतः होने वाली अभिव्यक्ति की बजाय कला प्रयासों की यांत्रिकता में गुम हो रही है। सब ओर इसी एकरसता को जैसे जिया जा रहा है। 
बहरहाल, पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र में युवा कलाकार मालचन्द पारीक के चित्रों से रू-ब-रू होते सुखद लगा। बंधी-बंधायी चित्र परम्परा की बजाय वहां अंतर्मन संवेदना को सर्वथा नये ढंग से उजागर जो किया गया था। प्रयोगधर्मिता परन्तु खाली प्रयोग के लिये ही नहीं। विषय-वस्तु की संवेदना भी वहां थी। मिश्रित माध्यम के पारीक के चित्रकर्म में भीतर की उसकी संवेदना का उजास तो है ही अभिव्यक्ति व विषुद्ध सौन्दर्य की खोज के बीच का द्वन्द भी दिखाई दिया। इसी से रूपायित ‘क्रांकीट जंगल’ की उसकी चित्र श्रृंखला देखने के बाद भी जेहन में बसती है।
बढ़ती आबादी के साथ कटते जंगल और उस पर इमारतों का खड़ा होता क्रांकीट संसार इन चित्रों के केन्द्र में है। खास बात यह है कि मालचन्द ने आत्मिक अनुभूति में जीवन के बदलते ढर्रे और तेजी से आ रहे बदलाव को सर्जन में गहरे से सहेजा है। शहरों की मॉल और फ्लेट संस्कृति पर एक प्रकार से अपनी कला से प्रष्न भी खड़े किये है। प्रष्न यह कि किस किमत पर हम इस संस्कृति के रहनुमा बन रहे हैं? प्रष्न यह कि सुकून का हमारा मापदंड क्या आधुनिक सुख सुविधाएं ही हैं? प्रष्न यह कि जंगल साफ कर अदेखे आकाष में हम कौनसे सपने चुन रहे हैं? तमाम उसके चित्रों का आस्वाद करते ऐसे ही सवाल और जेहन में कौंधते हैं। मुझे लगता है, चित्र सर्जन की यही वह मुखरता होनी चाहिए जिसमें दृष्य हमसे संवाद करे, भीतर की हमारी संवेदना को जगाए।
मालचन्द के चित्राकाष में खूबसूरत इमारतों में एक के ऊपर दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी और भी बहुत सी और खड़ी मंजिलों में गुम होते आकाष में वस्तुनिरपेक्ष रूप में विचारों का अनूठा प्रवाह है। इस प्रवाह में भौतिकता की दौड़ में तेजी से आ रहे मूल्यों के बदलाव को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। बाह्य रूप के सादृष्य में प्रतीकात्मक रूप मंे सौन्दर्य की अनूठी सृष्टि यहां है तो प्रकृति के गुम होते मूल्यों का रूदन भी है। ‘क्रांकीट जंगल’ श्रृंखला का रंग लोक भी अनूठा है। गहरे, हल्के और धूसरित के रंग बिम्ब। जल रंग, तेलीय, एक्रेलिंग का मिश्र प्रयोग। ज्यामीतिय संरचना में विषय-वस्तु के सूक्ष्म चितराम के अंतर्गत अंतर्मन संवेदना को इनमें गहरे से जिया जो गया है।
बहरहाल, मालचन्द के इन चित्रों को देखते हुए जेहन में वस्तु चित्रकार शार्द की याद आती है तो पौल सेजान के बनाए चित्र भीं औचक कोंधने लगते हैं। इसलिये कि दृष्य प्रभाव के साथ ही रूप तत्व को भी उसके चित्रों में तीव्रता से अनुभूत किया जा सकता है। मसलन बहुमंजिला एक इमारत के चित्र में मरे हुए शेर की खाल केन्द्र में है, पार्ष्व में जंगली जीवों के सफाया किये जाने के तमाम औजार आधुनिकता की चकाचौंध से झांकते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे ही फिष एक्वेरियम, गोल्डन मेमरी, एडजस्टेबल हैप्पीनेस, चेंज द हाउस, इट्स एनफ आदि चित्रों में जंगल काट बनायी इमारतों, बिजली के बेतरतीब झुलते तारों, होर्डिंग्स के बहाने जीवन के उस सच को मुखरित किया गया है जिसमें प्रकृति से दूर जीवन में यांत्रिकता का अनायास वरण हो रहा है।  
इन चित्रों को देखते कहीं पढ़ा औचक याद आ रहा है, ‘कला वास्तव के नैसर्गिक दृष्य रूप व काल्पनिक प्रतिकात्मक रूप के बीच घड़ी के  लंगर के समान झूलती रहती है।’ 


Saturday, April 21, 2012

आलागीला और पक्षी चित्रण की नयी दीठ


आरायस , आलागीला, मोराकसी। आप सोच रहे होंगे ये शब्द मैं कहां से ले आया। हिन्दी में फ्रेस्को पेंटिंग के लिये यही शब्द प्रयुक्त होते हैं। भित्ति चित्रण पद्धति की इस परम्परा पर जब भी विचार करता हूं, देवकी नंदन शर्मा याद आते हैं। कहूं, यह शर्मा ही थे जिन्होंने फ्रेस्को का भारतीय दीठ से एक प्रकार से पुनराविष्कार किया। फ्रेस्को ही क्यों बातिक, पेपरमेषी और तमाम दूसरी परम्परागत कलाओं को जीवित करने, उनमे युगानुकूल  परिवर्ततन के साथ प्रयोगधर्मिता के जो तान-बाने उन्होंने बुने, उन्हीं से तो यह सब कलाएं फिर से सामयिक हुई।
बहरहाल, सात साल पहले इसी अप्रैल माह की 24 तारीख को वह चिरमौन हुए। कुछ दिन पहले जवाहर कला केन्द्र में ख्यात कलाकार नाथूलाल वर्मा के निर्देषन में फ्रेस्को पेंटिंग का षिविर आयोजित हुआ तो देवकी नंदनजी की यादें जेहन में कौंधने लगी थी। ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और उनकी परम्परा में बढ़त करने वाले कलाकार भवानीषंकर शर्मा से संवाद हुआ। मैंने सुझाव दिया कि देवकी नंदन शर्मा के कला आयामों पर अकादमी क्यों नहीं एक व्याख्यान माला ही आयोजित करे। आखिर जड़ों सींच कर ही तो कला का पेड़ हरा हो सकता है!
बहरहाल, देवकी नंदन शर्मा ने वह किया जो कोई ओर नहीं कर सका। अजन्ता के भित्ति चित्रों के साक्षात् में उनके मिटते अस्तित्व ने उन्हें जैसे उद्धेलित किया। उन्होंने जैसे तभी यह तय कर लिया कि भित्ति चित्रों की अतीत की विरासत को वह सहेजेंगे। यह वर्ष 1949 की बात है। वनस्थली के कच्चे भवनों का पक्के में उनके प्रयासों से ही रूपान्तरण हुआ। इनमें अजन्ता चित्रों की अनुकृतियां के साथ ही भित्ति चित्रण के सर्वथा नवीन प्रयोग हुए। शैलेन्द्रनाथ डे, बिनोद बिहारी मुखर्जी सरीखे कला आचार्यों को वनस्थली बुला भित्ति चित्रण की परम्परा का उनके हथूके पुनराविष्कार हुआ। 
वनस्थली में पचास के दषक से ही देवकी नंदन शर्मा ने फ्रेस्को के विधिवत् प्रषिक्षण षिविर भी आयोजित करवाने प्रारंभ किये। कला षिक्षण को इससे नये आयाम मिले। यही नहीं बातिक, पेपरमेषी जैसी पारम्परिक कलाओं की समृद्ध परम्परा में युगानुकूल परिवर्तन करते उन्होंने लुप्त होती इन कलाओं को एक प्रकार से जीवनदान दिया। जयपुर रेलवे स्टेषन पर फ्रेस्को तकनीक से बनायी उनकी ढोला-मारू कलाकृति बरसों तक यात्रियों को लुभाती रही। वनस्थली कला मंदिर की दीवारों पर राजा पुलकेषी दरबार, बोधिसत्व, पदमपाणी और अन्य जातक कथाओं पर बनाये उनके आरायष अपनी मौलिकता में भित्ति चित्रों की हमारी समृद्ध परम्परा के ही संवाहक हैं।
फ्रेस्को को जीवित करने के साथ ही पक्षी चित्रण का भी देवकी नंदनजी ने सर्वथा नया मुहावरा हमें दिया। उनके उकेरे कबूतर, मोर, भांत-भांत की चिड़ियाओं, कोव्वों को देखते दीठ संवेदना के सर्वथा नये बिम्बों से साक्षात्कार होता है। ऐसा है तभी तो कभी ब्रिटिष इन्फॉर्मेषन सर्विस ने उन्हें विष्व के 18 सर्वश्रेष्ठ पक्षी चित्रकारों की सूची में शुमार किया था। 
प्रकृति, लोक एवं पौराणिक आख्यानों को देवकी नंदन शर्मा ने अपने चित्रों में सर्वथा नयी दीठ दी। फ्रेस्को तकनीक को नयी पहचान दी। कला के विभिन्न माध्यमों में काम करते उनके चित्रों को जब भी देखता हूं, प्रकाष और छाया प्रभाव का भी लयात्मक नाद वहां पाता हूं। परम्परागत चित्रों में प्रयोगधर्मिता करते के साथ उन्हें सामयिक करने का महत्ती कार्य ही देवकी नंदन शर्मा ने नहीं किया बल्कि दैनिन्दिनी जीवन के अनुभवों को चित्रों में परोटते जीवन दर्षन की लय को बेहद षिद्दत से उन्होंने अपने चित्रों में पकड़ा है। मुझे लगता है, यह देवकी नंदन शर्मा ही हैं जिन्होंने पेड़ो ंपर चहचहाती चिड़िया, कबूतर, कौव्वे, मोर आदि की अपने तई वैयक्तिक पुनर्व्याख्या की है। मानवीय अनुभव अपने आस-पास के परिवेष को सिर्फ आंख से देखना भर ही तो नहीं है वह महसूस करना भी है जो आंख की पूतली की परिधि से परे भी दिखाई देता है। देवकी नंदन शर्मा का चित्रलोकयही तो महसूस कराता है। 


Friday, April 13, 2012

शताब्दी बिहार महोत्सव में मिट्टी की सौंधी महक


मानव सभ्यता की सहचरी कालजयी हैं तमाम हमारी कलाएं। माने काल पर उनका कोई वष नहीं है। युग की पीड़ा, हर्ष, प्रथा-गाथा, धर्म-संस्कार के तमाम स्वर एक साथ वहां है। लोक का आलोक लिये। नृत्य, संगीत, चित्रकला, नाट्य आदि में कलाओं की सौरम को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है।
हरहाल, जवाहर कला केन्द्र के मुक्ताकाष, रंगायन सभागार और कलादीर्घाओं में पिछले दिनों शताब्दी बिहार महोत्सव में कलाओं की इसी सौंधी महक में मन जैसे रम गया था। बिहारमय राजस्थान की मेरे लिये यह अलग दीठ थी। ऐसी जिसमें लोक नृत्य, नाट्य, गीत, संगीत, चित्रकला प्रदर्षनी के जरिये संस्कृति के अनूठे चितराम आंखे देख रही थी। लगा, यह कलाएं ही हैं जिनमें जीवन की उदात्ता है। आत्मीयता का अपनापा है। जीवन का रस है। संस्कृति की जीवंतता है। रंजना सरकार और अपूर्वा सृष्टि के कथक, नलिनी मिश्रा के कुचीपुड़ी, शारदा सिन्हा के लोकगीत माधुर्य के साथ ही लोक नाट्य फूल नौटंकी विलास देखे। हर प्रस्तुति में कला समृद्ध बिहार ही जैसे आंखों के समक्ष जीवंत हो रहा था।
षिल्पग्राम के खुले मंच पर देष की ख्यात लोकगायिका शारदा सिन्हा ‘अमवा महुअवा के झूमे डलिया, तनी ताक न बलमवा...’ गा रही थी। लगा, यह लोकमानस ही है जिसमें स्वतंत्रता और उन्मुक्ति की ऐसी उर्वरता है। सहजता का गान है। इस गान में मिट्टी की सौंधी महक है। फालतू के आदर्ष नहीं है और न ही शास्त्र बंधे नियम वहां है। ओढ़ी हुई दानषमंदी की बजाय वहां प्रकृति उपजे भावों का सहज स्पन्दन है। शारदा सिन्हा के स्वरों में लोक की अद्भुत मिठास है। स्वरों में खोते अनुभूत होता है जैसे बिहार का लोकजीवन आंखों के समक्ष साकार हो रहा है। दूसरे दिन मनोरंजन ओझा ने अपनी लोकगायकी में भी कुछ ऐसे ही रंग बिखेरे।
रंगायन सभागार में अपूर्वा सृष्टि का कथक भी उर में आनंद के भाव देने वाला था। उसके नृत्य से रू-ब-रू होते लगा सीखे हुए में वह अपने तई बढ़त करती है। नई नई परनों और नये नये टूकड़ों का अद्भुत रचाव वहां है। ताल को गहरे से जीते उसके घुंघरूओं की खनक और ‘ता थेई थेई...तत’ में चमत्कारिक पद संचालन। षिव स्तुति में नृत्य की उसकी मोहक छटा में ही मन जैसे रच-बस गया। अंग-प्रत्यंग उपांगों से अपूर्वा सृष्टि भावों की प्रस्तुति में नृत्य रस की समग्रता का आस्वाद करा रही थी। इससे ठीक पहले सभागार में कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के उत्तराधिकारी राजकुमार सिद्धार्थ की पत्नी ‘गोपा’ पर केन्द्रित नृत्य नाटिका में यषोधरा की अंतर्मन व्यथा, त्याग को कलाकारों ने अपने अभिनय से जीवंत किया। ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ के संगीत स्वरो के साथ ही पारिजात कलादीर्घा में मधुबनी, भागलपुर षिल्प और बिहार की दूसरी पारंपरिक चित्रकलाओं की समृद्ध परम्परा का आस्वाद भी अनूठा है।
बहरहाल, बिहार शताब्दी समारोह अनूठा आयोजन था। बिहार के कला संस्कृति विभाग के प्रमुख शासन सचिव अंजनी कुमार सिंह और राजस्थान के पुलिस आयुक्त बी.एल. सोनी शताब्दी समारोह की समापन सांझ में षिल्पग्राम के खुले मंच पर कलाकारों की प्रस्तुतियों से भाव विभोर थे। राजस्थान और बिहार की संस्कृति समानताओं पर उन्हें बतियाते देख लगा, कलाएं काल निरपेक्ष ही नहीं स्थान निरपेक्ष भी होती है। भीतर के आनंद का ओज जो वहां है! विष्व के पहले बड़े लोकतंत्र, भगवान बुद्ध और जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर की जन्मस्थली है बिहार। कहीं पढ़ी किवदंती याद हो आयी। रेगिस्तानी इलाकों से कभी बिहार पहुंचे ऊंट सवार वहां की हरियाली देख खुषी से चिल्ला उठे ‘बहार है बहार!’ कहते हैं यही बहार बाद में बिहार हो गया। यह कितना सच है, कह नहीं सकता परन्तु शताब्दी समारोह में बिहार की बहार अभी भी मन अनुभूत कर रहा है।