भारतीय कला की वैश्विक पहचान थे हिम्मत शाह
विदेश में आज भी भारतीय कलाओं की पहचान अमृता शेरगिल, हुसैन, रजा के साथ जिस प्रमुख कलाकार से जुड़ी है, वह हिम्मत शाह थे। मूलतः वह गुजरात के थे। पर पिछले कोई 25 सालों से वह यहीं, राजस्थान आकर बस गए थे। राजस्थान बसने के पीछे भी संभवत: 1989 में की गई उनकी यहां की वह यात्रा ही थी जिसमें उन्होंने गांव—गांव, ढाणी ढाणी घूमकर लोक कलाओं, आदिवासी और जन जातीय कलाओं से निकटता स्थापित की। राजस्थान यात्रा के इन अनुभवों को बाद में उन्होंने माटी शिल्प शृंखला 'होमेज टू राजस्थान' में रूपायित किया। इब्राहिम अल्काजी को यह इतनी भायी कि उन्होंने इन कलाकृतियों की प्रदर्शनी की, इन्हें खरीद लिया। हिम्मत जी को भी राजस्थान इतना पसंद आया कि वह यहीं जयपुर आकर बस गए। इस दौरान उनसे निकट का नाता स्थापित हुआ जो अंतिम समय तक कायम रहा। हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय का भवन जब बन रहा था तो इसके तत्कालीन कुलपति ओम थानवी जी चाहते थे, नव निर्मित भवन में हिम्मत शाह का शिल्प भी हो। ओमजी के आग्रह पर तब हिम्मत जी से मिलाने उन्हें उनके घर ले गया था। पर बात बनी नहीं। ठहरकर, कहीं कोई सुनियोजित वह नहीं करते थे। जो उन्होंने सिरजा अप्रत्याशित, अपनी मर्जी से और जब चाहा तभी सिरजा।
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पत्रिका, 3 मार्च 2025 |
ललित कला अकादेमी की पत्रिका 'समकालीन कला' का जब अतिथि सम्पादक बना तो आवरण कलाकृति हिम्मत शाह की ही प्रकाशित की। बाद में राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी से मेरी पुस्तक 'भारतीय कला' प्रकाशित हुई तो हिम्मत जी को मौजूद रहने को कहा। वह आए और मेरी कला पर बोले भी। जब वह 90 की उम्र के हुए तो एक सांझ उनका फोन आया। आदेशात्मक स्वर था, 'कल मेरी वर्षगांठ है। नया स्टूडियो बनवा रहा हूं। आपको आना ही है।' अचरज हुआ! इस उम्र में व्यक्ति घर बनाने से, निर्माण कार्य से निवृत होता है और हिम्मत शाह जो थे, कला का नया वास बनाने जा रहे थे। दिल्ली से किरण नादर म्यूजियम ऑफ आर्ट की रुबीना और मशहूर कलाकार इरन्ना आए हुए थे। नये बन रहे स्कल्पचर स्टूडियो में ले जाते वहां काम की भावी योजनाएं उन्होंने बताई। उन्होंने कहा, 'स्टील आई एम यंग।' वह एक आर्ट कॉलेज खोलना चाहते थे जिसमें बच्चों को याद करना नहीं भुलना सिखाया जाए। अक्सर संवाद में वह कहते, ' जिसने पक्षी को उड़ते नहीं देखा, वह हवाई जहाज के बारे में नहीं सोच सकता। बस देखो, सोचो मत।' उनके पास कला की अदम्य ऊर्जा थी। बानवे वर्ष की उम्र में भी नित नए माध्यमों में उन्हें काम करते देखता। वह मूर्ति में में रेखांकन करते रूपाकारों के भीतर की खोज करते। रूपाकारों में टैक्सचर, स्थापत्य और शिल्प को उन्होंने साधा। कभी उन्होंने यौन प्रसंगों से संबंधित रेखाकृतियों बनायी। पर जल्द ही वह इनसे मुक्त हो गए। उनके हैड्स विश्वभर में सराहे गए। पारम्परिक भारतीय स्थापत्य, पश्चिम की कला के साथ ही लोककलाओं की बहुतेरी छवियों की छटाएं उनकी कलाओं में सदा ही अनुभूत की। कोविड के दौर में उन्होंने 'अण्डर द मास्क' शृंखला से रेखांकन किए। संस्थापन कला के अंतर्गत 'बर्न पेपर कॉलाज' तो पचास के दशक में ही उन्होंने कर दिया था। टेराकोटा, कांस्य, सिरेमिक, संगमरमर, पेपर मैशी, लकड़ी जैसे माध्यमों में भी उन्होंने शिल्प सिरजे। अंत तक सिरजते रहे।
उनके भीतर एक मासूम बच्चा बसा हुआ था। कोई दो माह पहले घर आ गए। घंटो बातचीत करते रहे। कलाओं पर और उससे इतर साहित्य, संगीत, नृत्य पर भी। इधर बार—बार उनका फोन आता आता और अपने नए स्टूडियो में बुलाते। उनका मन था, नए स्टूडियों में ही शहर से दूर उनके साथ दो—तीन दिन रहता। ढेर सारे उनके अनुभव सुनता। पर यह संभव नहीं हो पाया। पर, एक सप्ताह पहले उनके आग्रह पर घर गया था तब घंटो बैठ बातें हुई। उन्होंने तभी 'नाइन्टी एण्ड आफ्टर' और 'हिम्मत शाह : इनोसेंस एण्ड क्रिएटिविटी' दो पुस्तकें भेंट की थी। कहा, तुम्हारा 'पत्रिका' में प्रकाशित कॉलम निरंतर पढ़ता हूं। अच्छा लगता है। 'नाइन्टी एण्ड आफ्टर' पुस्तक पर उन्होंने लिखकर दिया, 'विद लव : हि इज ए वन आफ बेस्ट राईटर आन आर्ट'। अनायास ही बहुत बड़ा पुरस्कार उन्होंने प्रदान कर दिया था। वह नहीं है, पर कला में और सृजन में अपने आपको भुलकर सिरजने की उनकी सीख रह—रह कर स्मृति में कौंध रही है। उनका होना हिम्मत देता था। यह भारतीय कला की एक सशक्त कड़ी से बिछुड़ना है। नमन, हिम्मत जी। नमन!